सिविल सोसायटी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर की चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग

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नई दिल्ली। ईवीएम में छेड़छाड़, मतदाता सूची से लोगों के नाम गायब करने और राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में बढ़ती गोपनीयता के कारण देश की चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही है। लंबे समय से ईवीएम से मतदान कराने पर राजनीतिक दलों के साथ ही आम जनता भी उसकी विश्वसनीयता पर संदेह जताती रही है।

चुनाव प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने के लिए देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों, पूर्व नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे पत्र पर एम जी देवसहायम, वजाहत हबीबुल्लाह, जगदीप छोकर, अरुणा रॉय, मेधा पाटकर, मैक्सवेल परेरा, जस्टिस हरिपरन्थमन, प्रशांत भूषण, शबनम हाशमी, अंजलि भारद्वाज, ईएएस सरमा, जूलियो रिबेरो, अशोक कुमार शर्मा, सुंदर बुरा और फिरोज मीठीबोरवाला के हस्ताक्षर हैं।

चुनाव आयुक्त को भेजे पत्र में लिखा कि “आधुनिक भारत का सबसे बड़ा गौरव यह है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में, ईवीएम- वीवीपैट मतदान में जनता के विश्वास की कमी, मतदाता सूची में मनमाने ढंग से विलोपन की रिपोर्ट और राजनीतिक दलों के वित्तपोषण में बढ़ती गोपनीयता के कारण देश की चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं रही हैं।”

ईवीएम-वीवीपैट मतदान आवश्यक ‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों’ का अनुपालन नहीं करता है-कि प्रत्येक मतदाता को यह सत्यापित करने में सक्षम होना चाहिए कि उसका वोट इच्छानुसार डाला गया है और दर्ज किया गया है। हालांकि ईसीआई ने सभी ईवीएम के साथ वीवीपैट-डिवाइस की व्यवस्था की है, लेकिन “वोटर-वेरिफ़िएबल पेपर ट्रेल” को ‘बायोस्कोप’ के स्तर तक सीमित कर दिया गया है, जो सात सेकंड के लिए एक छोटी ‘पेपर स्लिप’ दिखाता है और फिर गायब हो जाता है। और गिना नहीं जाता।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में चुनाव पर नागरिक आयोग ने ईवीएम-वीवीपैट मतदान के जटिल मुद्दे पर शीर्ष राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों से परामर्श किया और निष्कर्ष निकाला कि “यह हैकिंग, छेड़छाड़ और नकली वोट इंजेक्शन के खिलाफ प्रमाणित गारंटी प्रदान नहीं करता है। वीवीपैट प्रणाली मतदाता को वोट डालने से पहले पर्ची को सत्यापित करने की अनुमति नहीं देती है।”

अल्पसंख्यक समुदायों और वंचित समूहों के मतदाताओं की मतदाता सूची में मनमाने ढंग से नाम हटाने और गायब होने की कई रिपोर्टें आई हैं। यह मतदाता सूची की अखंडता पर सवाल उठाता है जिसके आधार पर चुनाव कराए जाते हैं।

देश में चुनावी फंडिंग कई तरह से लोकतंत्र की अखंडता से समझौता करती है। चुनावी बांड की शुरूआत, जो दानदाताओं को गुमनाम रूप से राजनीतिक दलों को असीमित मात्रा में धन दान करने की अनुमति देती है, पारदर्शिता के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है और चुनावी प्रक्रिया पर पकड़ बनाने और नागरिकों की कीमत पर शासन करने के लिए विशेष हित समूहों, कॉर्पोरेट लॉबिस्टों और विदेशी संस्थाओं द्वारा दुरुपयोग करने के लिए रास्ते खोल देती है। 

मतदान एवं मतगणना की शुचिता सुनिश्चित करें

पत्र में मांग की गई है कि मतदान एवं मतगणना की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए वीवीपैट प्रणाली को पूरी तरह से मतदाता सत्यापन योग्य बनाने के लिए पुन: कैलिब्रेट किया जाना चाहिए। वोट को वैध बनाने के लिए वीवीपैट पर्ची मतदाता के हाथ में आनी चाहिए और मतदाता को उसे चिप-मुक्त मतपेटी में डालना चाहिए। परिणाम घोषित होने से पहले सभी निर्वाचन क्षेत्रों के लिए इन वीवीपैट पर्चियों की पूरी गिनती की जानी चाहिए। इस प्रयोजन के लिए, वीवीपैट पर्चियों का आकार बड़ा होना चाहिए और उन्हें इस तरह से मुद्रित किया जाना चाहिए कि उन्हें कम से कम पांच वर्षों तक संरक्षित किया जा सके।

इसके बाद, परिणाम घोषित होने से पहले वीवीपैट पर्चियों की गिनती के परिणामों को प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के ईवीएम के इलेक्ट्रॉनिक मिलान के साथ सत्यापित किया जाना चाहिए। किसी भी बेमेल मामले में, वीवीपैट पर्चियों की गिनती को अंतिम परिणाम माना जाना चाहिए जैसा कि चुनाव संचालन (संशोधन) नियम, 2013 के नियम 56 (डी) (4) (बी) में भी निर्धारित है। फॉर्म 17 ए (निर्वाचकों का रजिस्टर) और फॉर्म 17 सी (दर्ज किए गए वोटों का खाता) का मिलान किया जाना चाहिए और मतदान के दिन मतदान के अंत में सार्वजनिक रूप से खुलासा किया जाना चाहिए। नतीजों की घोषणा से पहले फॉर्म 17ए और 17सी का मिलान वीवीपैट पर्चियों की मैन्युअल गिनती से भी किया जाना चाहिए।

मतदाता सूची की अखंडता सुनिश्चित करें

मतदाता सूची की अखंडता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक मतदाता को पूर्व सूचना जारी की जाए जिसका नाम हटाया जाना प्रस्तावित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले दिनांक 4-8-2023 में भी यह निर्देशित किया है जिसमें कहा गया था कि “आरपी अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियमों, 1960, में निहित कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई भी विलोपन नहीं किया जाना चाहिए।” सभी मामलों में निर्वाचक को एक नोटिस जारी किया जाना चाहिए और उसे विधिवत तामील किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि कोई भी मतदाता छूट न जाए।

चुनाव आयोग को तुरंत मतदाता सूची के सामाजिक लेखा परीक्षा की एक पारदर्शी और सार्वजनिक प्रणाली लागू करनी चाहिए। मतदाता सूचियों को सार्वजनिक रूप से सबसे सुलभ तरीके से प्रदर्शित किया जाना चाहिए और ईसीआई वेबसाइट पर खोज योग्य डेटाबेस में भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। नागरिकों को अपनी जानकारी के साथ-साथ अपने क्षेत्र में फर्जी नामों और डुप्लिकेट की जांच करने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

चुनावी बांड का विरोध करें और धन-बल पर लगाम लगाएं

चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता की पुरजोर वकालत करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि धन-बल चुनावों और उनके नतीजों को प्रभावित न करे। इसे चुनावी बांडों का विरोध करना चाहिए जो राजनीतिक दलों को असीमित गुमनाम फंडिंग प्रदान करते हैं।

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