Saturday, January 22, 2022

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किसानों को लेकर ‘ट्वीट वार’ में कूदे क्रिकेटरों के बीच वसीम जाफर मामले में छाई मुर्दा शांति

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जाने-माने क्रिकेटर वसीम जाफर के साथ उत्तराखंड क्रिकेट संघ ने जो किया है वो इस देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत की इंतेहा है। इससे वसीम जाफर और उस समुदाय का कोई खास नुकसान नहीं होगा, लेकिन दुनिया में जो जग हंसाई होगी, उसे फर्जी देशभक्त क्रिकेट प्रेमी अभी भी समझ नहीं पाएंगे। उत्तराखंड क्रिकेट संघ ने वसीम जाफर को एक सत्र के लिए अपना मुख्य कोच नियुक्त किया था, लेकिन अब उन पर मजहबी गतिविधि करने और मुस्लिम खिलाड़ियों को उत्तराखंड में बढ़ावा देने का आरोप लगने पर जाफर ने मुख्य कोच पद से इस्तीफा दे दिया है, हालांकि उत्तराखंड क्रिकेट संघ के कुछ पदाधिकारियों का कहना है कि वसीम जाफर को हटाया गया है। यह घटना ऐसे समय में हुई, जब भारतीय और पाकिस्तान मूल के खिलाड़ी वेस्ट इंडीज से लेकर आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड में अपने खेल से धूम मचा रहे हैं।

क्रिकेट की राजनीति
भारतीय क्रिकेट में राजनीति हमेशा से रही है। सुनील गावस्कर के बेटे रोहन, सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन और लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव को भारतीय टीम में शामिल करने को लेकर तमाम विवाद सामने आते रहे हैं। इसी तरह भारतीय क्रिकेट में क्षेत्रवाद भी खूब चला और चल रहा है, लेकिन यह राजनीति इतने निचले स्तर पर पहुंच जाएगी, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। वसीम जाफर पर भाजपा नियंत्रित उत्तराखंड क्रिकेट संघ ने आरोप लगाया कि उन्होंने तीन बार क्रिकेट मैदान पर मौलवियों को बुलवाया।

खिलाड़ियों ने जब रामभक्त हनुमान की जय का नारा लगाना चाहा तो वसीम ने सिख और बाकी धर्म के खिलाड़ियों का हवाला देकर ऐसा नारा लगाने से रोक दिया। इसकी जगह उन्होंने गो उत्तराखंड, कम ऑन उत्तराखंड नारा लगाने को कहा। इसके अलावा वसीम जाफर ने तीन खिलाड़ियों जय बिष्ट, इकबाल अब्दुल्ला और समद सल्ला को राज्य की टीम में शामिल किया।

उत्तराखंड क्रिकेट संघ के आरोप इतने हास्यस्पद होंगे, इसकी उम्मीद नहीं थी। अगर खिलाड़ियों से कहा गया कि वो किसी धर्म विशेष का नारा न लगाकर उत्तराखंड पर नारा लगाएंगे तो इसमें बतौर मुख्य कोच वसीफ जाफर का क्या अपराध है। इसी तरह मौलवियों को मैदान पर बुलाने के आरोप की पुष्टि के जवाब में कोई सबूत पेश नहीं किया गया। भारतीय क्रिकेट टीम के खेलने के दौरान ड्रेसिंग रूप में नमाज पढ़ने, पूजा करने की घटना नई नहीं है।

अलबत्ता केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली में सेंट्रल विस्टा के नाम से नए संसद भवन की आधारशिला रखे जाने के दौरान किसी प्रधानमंत्री का पूजापाठ करके उसकी शुरुआत करना नई घटना है। फ्रांस से राफेल विमान लेते समय उस पर नींबू लटकाने, नारियल फोड़ने और पूजा करने की घटना नई है, 26 जनवरी को राजपथ पर राज्यों की झांकी में यूपी की ओर से राम मंदिर का प्रोटाइप मॉडल पेश करना नई तरह की घटना है। उसी झांकी में बंगाल ने लैपटॉप लेकर बैठी युवती की झांकी पेश कर खुद को प्रगतिशील बताने का संकेत दिया था।

कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना
बेहूदा किस्म के आरोप लगाकर वसीम जाफर को हटाने की घटना दरअसल उसी राजनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए देश की मुख्य समस्याओं से ध्यान भटका कर उसका ध्यान हमेशा मजहबी कट्टरता के मामलों में उलझाए रखना है। देश के किसी न किसी कोने से हर हफ्ते मजहबी कट्टरता खासकर अल्पसंख्यकों को टारगेट करने की घटनाओं को योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया जाता है।

उत्तराखंड में भयानक प्राकृतिक आपदा आई। उसी के साथ केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तमाम नाकामियां भी सामने आईं। किसानों का आंदोलन चल ही रहा है और आंदोलन को धार देने के लिए किसान संगठन तरह-तरह के आह्वान कर रहे हैं। उनकी तरफ सरकार के भोंपू बने चैनलों का ध्यान न जाए, उसे वसीम जाफर जैसे मुद्दे थमाए जाते हैं। ऐसी भयानक प्राकृतिक आपदा में उत्तराखंड की भाजपा सरकार केंद्र के भरोसे बैठी रही।

वहां के लोग जब राज्य सरकार को लेकर तमाम सवाल उठा रहे थे, उसी समय उन्हें बताया जा रहा है कि एक मुसलमान उत्तराखंड में क्रिकेट जेहाद कर रहा है। गुरुवार 11 फरवरी को ट्विटर पर बाकायदा क्रिकेट जेहाद हैशटैग के नाम से अभियान चलाया गया, जिसमें वसीम जाफर को जमकर गालियां दी गईं। रामभक्त से पलभर में क्रिकेटभक्त बने इन फर्जी राष्ट्रवादियों को चंद पलों में उन तमाम मुस्लिम क्रिकेटरों के नाम भूल गए जिनका योगदान अनगिनत भारतीय जीत में शामिल रहा है।

यह घटना मुसलमानों को सिलसिलेवार तरीके से हाशिए पर ढकेलने की भी साजिश है। याद कीजिए जब यूपीएससी में ज्यादा संख्या में मुस्लिम बच्चे (हालांकि राष्ट्रीय अनुपात के मुकाबले नगण्य) आए तो संघी मीडिया ने यूपीएससी जिहाद अभियान चलाया, फिर जमीन जिहाद अभियान चला, उसके बाद लव जिहाद आया। अब इसे क्रिकेट जिहाद नाम दिया गया। बहुत साफ है कि जीवन के हर क्षेत्र को किसी न किसी जिहाद शब्द से जोड़कर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत के माहौल को जिंदा रखना है।

बड़े क्रिकेटरों की चुप्पी
यह लेख लिखे जाने के समय तक एक भी भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी वसीम जाफर के समर्थन में नहीं आया। किसान आंदोलन को नजरअंदाज करके मोदी सरकार के लिए ट्वीट करने वाले इन बड़े नाम वाले खिलाड़ियों में से किसी ने भी वसीम जाफर के लिए आवाज नहीं उठाई, हालांकि इनमें से लगभग सारे मौजूदा नामी खिलाड़ी किसी न किसी समय वसीम जाफर के साथ खेल चुके हैं, क्योंकि सबसे ज्यादा रणजी मैच खेलने का रेकॉर्ड वसीम जाफर के नाम ही है। खिलाड़ियों के हितों का दम भरने वाले भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) तक ने वसीफ जाफर के लिए दो शब्द नहीं कहे।

भारतीय क्रिकेट राजनीति से कभी अछूती नहीं रही। कांग्रेस के राजीव शुक्ल से लेकर भाजपा के स्व. अरुण जेटली, अनुराग शर्मा और अब गृह मंत्री और देश के सबसे पावरफुल माने जाने वाले अमित शाह का बेटा जय शाह क्रिकेट में राजनीति के रास्ते ही आए हैं। यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन वसीम जाफर की घटना देश में प्रदूषित मानसिक कट्टरता को बढ़ाने में खाद-पानी का काम करेगी। कहां हैं विराट कोहली एंड कंपनी जो मामूली बातों के लिए भी ट्वीट कर देती है, लेकिन इस घटना पर उनका दिल तक नहीं पसीजा।

संघी मीडिया की सक्रियता
वसीम जाफर का मामला सामने आने के बाद संघी मीडिया भी निचली हरकतों पर उतर आया है। आर्गनाइजर डॉट आर्ग नामक वेबसाइट ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें फर्जी वीडियो के सहारे बेहूदे आरोप लगाए गए हैं। इस साइट की रिपोर्ट में पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इंजाममुल हक के हवाले से कहा गया है कि मैंने, सकलैन मुश्ताक और वसीम जाफर ने इंग्लैंड में गैर मुस्लिम खिलाड़ियों को इस्लाम अपनाने की दावत दी थी, हालांकि उस जहरीली रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि आखिर वो गैर मुस्लिम खिलाड़ी कौन-कौन थे और उन्होंने इस्लाम अपनाया या नहीं, इस पर वो रिपोर्ट मौन है। इसी तरह भाजपा आईटी सेल के लिए दिहाड़ी पर काम करने वालों की आर्मी इसी तरह की वाहियात रिपोर्ट का हवाला देकर नफरत की आग को और भड़का रही है।

अमेरिका में ब्लैक नागरिक जॉर्ज फ्लायड की हत्या पर भारत में जब सारे लोग मानवाधिकार कार्यकर्ता बनकर ट्वीट कर रहे थे और वही लोग कड़कड़ाती ठंड में किसानों पर बरसती लाठियों पर चुप थे, तो क्रिकेटर इरफान खान ने उस मुद्दे को उठाया था। संघी मीडिया हाथ धोकर इरफान पठान के पीछे पड़ गया।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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