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जनता कर्फ्यू: कहीं यह निर्णय जनता का कहर न बन जाए?

कोरोना वायरस से संक्रमित हुए मरीज (या वह संदिग्ध मरीज/व्यक्ति जो विदेश में संक्रमित क्षेत्र से यात्रा करके लौटे हैं) जिस तरह देश के विभिन्न स्थानों में पहुंचकर संक्रमण की आशंका बढ़ा रहे हैं। वह जनता कर्फ्यू के पूरे औचित्य पर प्रश्न खड़ा कर दे रहा है।

यह प्रश्न पूछना आवश्यक हो गया है कि विदेशों में फैल रही बीमारी को भारत में प्रवेश नहीं करने देने के लिए हवाई अड्डों पर आवश्यक व्यवस्थाएं क्यों नहीं हैं, पहला मरीज 31 जनवरी को मिलने के 50 दिन बीतने के बाद भी हवाई अड्डों से बचकर वो सुदूर क्षेत्रों में क्यों पहुंच रहे हैं? क्यों अभी तक के असंक्रमित क्षेत्र को संकट में डाला गया है? इसके साथ ही दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों के संक्रमित क्षेत्रों मे रहने वाले प्रवासी कोरोना वायरस लेकर अपने गावों कस्बों में क्यों लौट रहे हैं?

उत्तराखण्ड के कुमाऊं डिवीजन से मिली रिपोर्ट के अनुसार यहां अनेक केस आ चुके हैं। कनिका कपूर कांड से चर्चित हुए पूर्व सांसद अकबर अहमद डम्पी भी अपने घर किच्छा (उधमसिंह नगर) पहुंचे हैं जहां स्थानीय प्रशासन ने उन्हें क्वैरंटाइन में रख दिया है। अनेक केस स्थानीय अस्पतालों में दर्ज हो चुके हैं। उत्तराखण्ड की तराई के हालात बता रहे हैं कि जिस तरह से यहां प्रवासी देशी-विदेशी हवाई अड्डों पर बिना चेक हुए वापस लौट रहे हैं वह खतरनाक हो सकता है।

यहां जैसा ही अगर प्रवासियों के लौटने पर भी हो रहा है तो इसका मतलब है कि हालात हर जगह बेहद नाजुक हैं। पिछले दो-तीन दिन में बढ़ी इन घटनाओं को देखकर लग रहा है कि कहीं यह कथित “जनता कर्फ्यू” नोवेल कोरोनावायरस COVID-19 का अखिल भारतीय फैलाव का कारण न बने।

इसी को देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी को हर महत्वपूर्ण निर्णय बिना तैयारी के जल्दबाजी और हड़बड़ी में लेने की आदत पड़ गई है, यह आशंका है कि कोरोना वायरस की बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए लिया गया जनता कर्फ्यू का निर्णय नोटबंदी की तरह जनता के लिए घातक न हो जाए।

देश में कोरोना वायरस से निपटने की मान्य चिकित्सकीय सुविधाओं की घोर कमी के बीच नोटबंदी की तरह इस निर्णय को लेने के पीछे मोदी जी या सरकार की कोई जमीनी तैयारी नहीं दिखी है और न अन्य देशों के अनुभव से सीख ली गई है।

19 मार्च को प्रधानमंत्री जी ने टीवी पर आकर पर 22 मार्च को जनता कर्फ्यू या जिसे योरोप में लाक डाउन कहा जाता है, करने की घोषणा की। इससे पहले सरकारी स्तर पर कोरोना वायरस से हो रही महामारी को रोकने के लिए कोई नीतिगत घोषणा नहीं की थी।

केरल जहां कोरोना का प्रभाव अपेक्षित अधिक था वहां की सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों के अलावा अन्य किसी राज्य में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुए थे। जबकि केरल के बाहर मुम्बई और दिल्ली में में कोरोना के वायरस का असर दिख रहा था। मार्च के आरम्भ में ही इसके लक्षण दिखने लगे थे। और लोग इसके बारे में आशंका प्रकट करने लगे थे।

मार्च के पहले पखवाड़े जब कोरोना रोकने के लिए सोशल मीडिया में गोमूत्र से लेकर मंत्र और धूप सेकने के अचूक नुस्खे धडल्ले से चल रहे थे, उसी बीच कोरोना का कहर अपने डैने फैलाने लगा था। उत्तर भारत में जब मुर्गे मछली की दुकानें बंद करके कोरोना रोकने के अचूक फार्मूले आजमाए जा रहे थे तभी कोरोना से पहली मौत की खबर आई (जो आज चार तक पहुंच गई है)।

बड़े शहरों में इसके बारे में गम्भीर खबरें आने लगीं। बंगलुरू मुम्बई सहित सभी बड़े और औद्यौगिक शहरों/क्षेत्रों में सभी सामाजिक गतिविधियों के बंद होने और बड़ी कम्पनियों के घर से काम करने की सुविधा देनी आरम्भ कर दी। यह सब बातें स्थिति की गम्भीरता को बढ़ा रही थीं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई एक्शन होता नहीं दिख रहा था। विदेशों से फ्लाइट्स लगातार आ रहीं थीं, और सभी हवाई अड्डों पर आने वाले यात्रियों की की कोरोना की जांच की पक्की व्यवस्था नहीं थी, विशेषकर कोरोना प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की निगरानी सख्ती से नहीं हुई, संदिग्ध मरीजों को क्वैरंटाइन की व्यवस्था भी नहीं हुई थी।

कोरोना बीमारी फैलने का अगर चार्ट देखें तो पाएंगे कि यह बीमारी हवाई अड्डों वाले शहरों से आरम्भ हुई और वहीं से फैली। सभी संदिग्ध मरीज विदेश से आए, यदि बीमारी कि आहट सुनते ही हवाई अड्डों पर जांच की जाती तो यह हालत नहीं होती। बीमारी शहरों में फैलती रही, और इसके साथ इसकी दहशत फैलती रही।

प्रधानमंत्री की घोषणा से कुछ पहले ही हवाई अड्डों पर जांच बढ़ाई गई जिसका एक परिणाम विदेश से आए एक संदिग्ध मरीज की सफदरजंग अस्पताल की छत से कूदकर खुदकुशी करने के रूप में दिखा। सभी बड़े शहरों में कोरोना बीमारी का अच्छा खासा प्रचार हो गया था, राज्य सरकारों/स्थानीय प्रशासन ने इस बीमारी को लेकर दिशा-निर्देश जारी करने आरम्भ कर दिए थे।

19 को अचानक प्रधानमंत्री के इस विषय में संदेश देने की घोषणा होती है। उनकी घोषणा और घोषणा करने के बीच दहशत और बढ़ती है। और जैसे ही प्रधानमंत्री 22 को जनता कर्फ्यू के “आयोजन” की घोषणा करते हैं, तब असुरक्षित हो गए हैं यह सिद्ध हो जाता है। दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों के बाजार तीन दिन बंद करने और संस्थानों को 31 मार्च तक बंद करने की घोषणा होती है। रूकी हुई दहशत का एक विस्फोट होता है, और देश में अफरा-तफरी बढ़ जाती है।

फिर इसी बीच लखनऊ का कनिका कपूर का काण्ड हो गया जिसने हवाईअड्डों पर बाहर से आने वाले संदिग्ध मरीजों की जांच व्यवस्था की पोलपट्टी खोल दी।

मीडिया से जुड़े होने के कारण इस मामले में जैसे जैसे खुलासे होते गए वैसे वैसे इसकी दहशत कई गुना बढ़ती गई।

पंजाब सहित अनेक क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन सेवाओं व ट्रेनों के बंद करने की घोषणा से यह बात तो पुख्ता होती गई कि छोटे शहर भी खतरे में आ गए हैं।

इसके साथ ही छोटे शहरों और गांव से बड़े शहरों में रहकर रोजी-रोटी से जुड़े लोगों के लिए शहर एकदम असुरक्षित लगने लगे, और वह बहुत तेजी से शहर छोड़कर अपने-अपने इलाकों में लौटने लगे।

शहर से निकलने वाले लोग जिनमें संदिग्ध कोरोना संक्रमित भी होंगे जैसे तैसे शहरों से भागने लगे ठीक इटली और स्पेन की तरह। यूरोप में तो लोगों के पास व्यक्तिगत गाड़ियां होती हैं। जब उनके फैलने से बीमारी का इतना बड़ा विस्फोट हो गया है, तो कल्पना करें देश में शहरों से गांव की ओर ट्रेनों और बसों में ठूंस ठूंस कर भाग रहे लोग अपने साथ कितनी बड़ी मात्रा में इस बीमारी को देशभर में फैला रहे हैं। यह सोचकर सिहरन हो रही है।

जिस जनता कर्फ्यू को बीमारी के संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए लागू किया जा रहा है अब उससे पूरे देश को संक्रमित होने की आशंका हो गई है। दिल्ली मुम्बई व अन्य शहरों से देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाने वाली ट्रेनों का जो हाल दिखाई दे रहा है वह चेतावनी दे रहा है कि संक्रमण के फैलाव को रोकने के नाम पर लागू किए गए जनता कर्फ्यू से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ने की आशंका है।

जनता कर्फ्यू की की घोषणा से पहले, व इस तरह के लॉक डाउन की घोषणा की आशंका को “सूंघने वाले पढ़े लिखे” सुविधा सम्पन्न लोग पहले ही संक्रमित क्षेत्र छोड़कर दूसरे सुरक्षित शहरों को निकल पड़े थे। फिर जैसे ही यह घोषणा हुई कि प्रधानमंत्री जी घोषणा करने वाले हैं ऐसे लोग भाग निकले, फिर जब घोषणा हो गई तो उसके कुछ घंटे बाद ही लोग सुरक्षित क्षेत्रों को भागने लगे।

इस ट्रेंड को जल्दी ही नोटिस किया गया लेकिन तब तक स्मार्ट लोग अपने-अपने खोजे गए स्थानों की ओर निकल गए। सबसे पहले हिमाचल सरकार ने इसे नोटिस करते हुए अपने राज्य में बाहरी लोगों/पर्यटकों का प्रवेश बंद कर दिया। यह आदेश जारी होते होते शाम हो गई। तब तक बहुत लोग घुस चुके थे, इसलिए दिल्ली पंजाब से हिमाचल को जोड़ने वाली सड़कों पर ट्रैफिक बेहद बढ गया। शाम बैन होने की खबर जब पुलिस नाकों तक पहुंची तो नाके बंद होने लगे, कुल्लू मनाली रोहतांग दर्रे व पार्वती वैली का प्रवेश द्वार भुन्तर का नाका जब बंद हुआ तो सैकड़ों वाहन फंस गए। लेकिन नाका बंद होने से पहले बहुत से लोग कुल्लू मनाली और आगे पहुंच चुके थे।

यही हाल उत्तराखण्ड का हुआ।

उत्तराखण्ड के अधिकारियों को अकल एक दिन बाद आई तब तक लोग बद्रीनाथ तक पहुंच गए थे। 19 की रात से 21 की शाम तक जब तक उत्तराखण्ड में टूरिस्ट एंट्री बैन का आर्डर निचले स्तर तक पहुंचा तब तक लोग बड़ी संख्या में धड़ाधड़ घुस चुके थे। अब यहां सुनते हैं हर तरह की यात्रा पर बैन का आर्डर होने जा रहा है लेकिन जो होना था हो चुका। खतरा मुम्बई, दिल्ली से होता हुआ मनाली, रोहतांग बद्रीनाथ तक पहुंच चुका है।

इस तरस संक्रमित लोगों/संक्रमित क्षेत्रों के लोगों ने कई चरणों में देश भर में इस जानलेवा कोरोनो वायरस का फैलाव किया है।

लेकिन संक्रमित सुविधा सम्पन्न लोगों अथवा संक्रमित क्षेत्रों में काम करने वाले प्रवासियों के गांव छोटे शहरों में एंट्री/ वापसी और फैलाव से सबसे अधिक खतरा भी इन्हीं छोटे शहरों और गांवों को होने की आशंका है। घनी आबादी और छोटे घरों के कारण यहां संक्रमण तेजी से फैलने की आशंका है। फिर छोटे शहरों/गांव में मेलजोल और सामाजिकता के कारण इसको फैलने में बहुत मदद मिलती है, और सबसे खतरनाक यह है कि ऐसे इलाकों में इलाज की छोटी भी सुविधाएं नहीं हैं।

उत्तराखण्ड और हिमाचल की ठंडी जलवायु में संक्रमित लोगों का वायरस कब तक पलता रहेगा यह भविष्य का एक और बड़ा खतरा है। क्योंकि मैदानी क्षेत्रों में अगले 15-20 दिनों में तापमान बढ़ने लगेगा लेकिन पर्वतीय इलाकों में नोवेल कोरोनावायरस COVID-19 को पलने, पनपने और फैलने लायक मौसम पूरे वर्ष रहने वाला है।

अब यह कहना बेकार है कि यह बीमारी के वाहक अधिकांश सुविधा सम्पन्न लोग रहे हैं। संक्रमित देशों की यात्रा करने वाले, या वहां काम करने वाले हवाई जहाज से आकर जगह जगह संक्रमण फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।

आज मोदी जी स्वयं यह आशंका प्रकट कर रहे हैं कि वाहनों में भर कर यात्रा करना खतरनाक हो सकता है। जबकि तीर हाथ से निकल चुका है।

ऐसे में बिना सोचे समझे और बिना तैयारी के लागू किए गए इस जनता कर्फ्यू से जो अचानक संक्रमित लोगों का अखिल भारतीय फैलाव हुआ है, वह क्या कहर बरपाएगा यह आने वाले दिन बताएंगे।

(इस्लाम हुसैन स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और उत्तराखंड में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 22, 2020 7:04 pm

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