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Wednesday, September 29, 2021

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फीस बढ़ाने वाले निजी स्कूलों पर लटकी दिल्ली सरकार के अधिग्रहण की तलवार

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पिछले वर्ष मई में, दिल्ली सरकार ने एपीजे स्कूल की दो शाखाओं साकेत और शेख सराय को शिक्षा विभाग के द्वारा जारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए बढ़ी हुई फीस वसूलने के आरोप में सील कर दिया था।

बुधवार को एक बार फिर से दिल्ली सरकार ने कहा है कि वह शेख सराय स्थित एपीजे स्कूल को शिक्षा विभाग के फीस में बढ़ोत्तरी को वापस लेने के आदेश का उल्लंघन करते हुए दो वर्षों के अकादमिक सत्र की फीस बढ़ोत्तरी को लगातार अनसुना करने पर कारण बताओ नोटिस भेजने जा रही है, और कहा है कि वह स्कूल प्रबंधन को अपने हाथ में लेने के लिए कदम उठा रही है।

शिक्षा मंत्री मनीष सिसौदिया के कार्यालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है “शिक्षा निदेशक ने एपीजे स्कूल, शेख सराय के प्रबंधन को हाथ में लेने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी करने का फैसला लिया है, क्योंकि स्कूल, दिल्ली सरकार के विभिन्न आदेशों का पालन करने में लगातार विफल रहा है, जिसमें इसके द्वारा अन्यायपूर्ण फीस बढ़ोत्तरी को वापस लेने के लिए कहा गया था। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने शिक्षा निदेशालय के स्कूल के प्रबंधन को हाथ में लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस फैसले को एलजी के पास भेज दिया गया है।” 

इसी प्रकार के एक अन्य मामले में, दिल्ली सरकार ने 27 जुलाई को घोषणा की थी कि वह पंजाबी बाग़ में, स्वामी सिवानन्द मेमोरियल स्कूल का अधिग्रहण करने जा रही है, जब इसके पास मनमानी अतिरिक्त फीस की शिकायतें मिली थीं।

इस नोटिस की प्रतिक्रिया में स्कूल ने इन आरोपों को पूर्वाग्रहग्रस्त और असत्य बताया है।

जैसा कि सारे देश को पता है कि कोविड-19 के कारण लॉकडाउन लगाये जाने के बाद से देश भर के तमाम शहरों और कस्बों में करोड़ों लोगों को अपने घरों में ही दो महीनों तक बंद रहना पड़ा था, जिसके चलते निजी क्षेत्र में कार्यरत लाखों लोगों की नौकरियां नहीं रहीं, छोटे एवं मझौले उद्यमों, दुकानदारों, स्वरोजगार से जुड़े लोगों की आजीविका खतरे में पड़ गई थी। इसे देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल निजी और गैर सहायता प्राप्त स्कूलों से सिर्फ ट्यूशन फीस ही वसूलने की इजाजत दी थी।

लेकिन देखने में आ रहा है कि कई राज्यों में न सिर्फ भवन निर्माण, डेवलपमेंट चार्ज जैसे अतिरिक्त शुल्क की वसूली की जा रही है, बल्कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में तो अभिभावकों से बसों के लिए भी मासिक शुल्क चार्ज करने के लिए नोटिस भेज दिए गए थे, जिस पर पंजाब उच्च न्यायालय ने रोक के आदेश दिए थे।

चूँकि देश भर में शहरी मध्य वर्ग को अपनी घटी आय के सहारे ऑनलाइन क्लासेज के लिए निजी स्कूलों द्वारा लगातार दबाव बनाया जा रहा है, कई स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाओं से बच्चों को वंचित रखा जा रहा है, स्कूलों की ओर से अभिभावकों को लगातार ऑनलाइन सेशन के जरिये दबाव डलवाकर फीस का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। और यह सब तब हो रहा है जब कई स्कूलों ने अपने शिक्षकों के स्टाफ में अभूतपूर्व कमी कर दी है। पिछले डेढ़ वर्षों से शिक्षिकाओं को कई जगहों पर आधे वेतन पर काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

ऐसे में कुछ राज्य जहाँ संवेदनशील आचरण दिखा रहे हैं, और बच्चों और अभिभावकों के अधिकारों के लिए स्कूल प्रशासन और न्यायालय की शरण में जा रहे हैं, ऐसे में देश की भाजपा सरकार ने लगातार रहस्यमयी चुप्पी धारण कर रखी है। उसकी निगाह में यदि लोग बढ़ी हुई दर पर पेट्रोल, डीजल, गैस खरीद सकते हैं तो भला बच्चों की फीस क्यों नहीं दे सकते।

इसी बीच महाराष्ट्र सरकार निजी स्कूलों से ट्यूशन फीस में 15% की कमी करने के लिए निर्देश जारी करने जा रही है। इसका अर्थ हुआ कि फीस में बढ़ोत्तरी के बजाय अभिभावकों को कुछ राहत मिल सकती है, जिसे निजी शिक्षण संस्थान चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। उनके अनुसार राज्य सरकार का इस मामले में दखलंदाजी करने का कोई क़ानूनी हक नहीं है।

जहाँ तक एपीजे स्कूल, शेख सराय का संबंध है तो शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, शिक्षा निदेशालय ने उक्त स्कूल का वर्ष 2012-13 से 2018-19 के बीच का वित्तीय बयानों की जाँच की। शिक्षा विभाग के बयान के मुताबिक, “विस्तृत अध्ययन के बाद विभाग ने पाया कि 2018-19 के लिए कुल मद 49 करोड़ 72 लाख 45 हजार 586 पाई गई, जिसमें से तकरीबन 18 करोड़, 87 लाख, 02 हजार, 422 रूपये खर्च हुए। जिसका अर्थ हुआ कि स्कूल के पास 30 करोड़, 85 लाख, 43 हजार, 164 रूपये का अधिशेष बचा हुआ था, जिस पर विभाग ने निष्कर्ष निकाला कि स्कूल को फीस वृद्धि की कोई वास्तविक जरूरत नहीं थी। इसके आधार पर निदेशालय ने 2018-19 एवं 2019-20 के लिए प्रस्तावित फीस वृद्धि ढांचे में बढ़ोत्तरी को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था।

इसी आधार पर पिछले वर्ष दिल्ली सरकार ने एपीजे स्कूल की दो शाखाओं साकेत और शेख सराय को शिक्षा विभाग के द्वारा जारी निर्देशों की अवहेलना करते हुए छात्रों से बढ़ी हुई फीस वसूलने के आरोप में सील कर दिया था। इस सिलसिले में स्कूल ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन कोर्ट ने डीओई के पक्ष को माना और स्कूल से बढ़ी हुई फीस को वापस करने के लिए कहा था।

ज्ञातव्य हो कि इसी विषय पर पिछले महीने उच्च न्यायालय की एक एकल बेंच ने पहली कोविड महामारी के दौरान वार्षिक शुल्क एवं अन्य शुल्क पर लगी रोक को यह कहते हुए हटा दिया था कि यदि दिल्ली सरकार को लगता है तो बच्चों की तरफ से वे स्कूलों को बकाया भुगतान अदा कर दे, जिस पर दिल्ली की आप सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में अपील दर्ज की थी। अपील पर सर्वोच्च न्यायलय ने सुझाव दिया था कि दिल्ली उच्च न्यायालय के पक्ष को ही बरकरार रखा जाए, लेकिन साथ ही इसके लिए अंतिम रूप से कोई फैसला नहीं हो सका है।

इससे पहले भी देश भर के अभिभावकों के संयुक्त याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने विभिन्न राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों के मद्देनजर फीस के मुद्दे का निर्धारण राज्य सरकारों के उपर ही छोड़ दिया था।

कुल मिलाकर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। स्कूलों को भी शायद ऐसा लगता है कि जब देश में सभी को लूट की छूट है तो वे ही पीछे क्यों रहें। आखिर शिक्षण संस्थान भी तो प्राइवेट अस्पतालों की तरह ही मुनाफा कमाने के आज सबसे बड़े औजार बन गए हैं, जिसमें आज बड़े-बड़े कॉर्पोरेट की निगाह है। देश में नौकरियों के अवसर लगातार खत्म हो रहे हैं, किन्तु अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के नाम पर लूट के आगे बिछ जाने के सिवाय रास्ता ही क्या है। ऐसे में कुछेक राज्यों द्वारा यदि इस विषय में कोई सकारात्मक पहलकदमी ली भी जाती है, तो परदे के पीछे संस्थागत विरोध की एक ऐसी लहर को उसे झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है कि कुछेक वर्ष बाद वह भी इस खेल में शामिल हो जाता है।

देखना है दिल्ली और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों के इस स्वागत योग्य कदम का देश के मध्यवर्ग के लिए क्या सकारात्मक असर पड़ता है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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