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काले कारनामों से भरा है कश्मीर में पकड़े गए डिप्टी एसपी देविंदर सिंह का इतिहास, साथी अफसर बुलाते थे ‘टॉर्चर सिंह’

नई दिल्ली। हिज्बुल आतंकियों के साथ श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर पकड़े गए जम्मू-कश्मीर पुलिस के डिप्टी एसपी देविंदर सिंह का कारनामा यहीं तक सीमित नहीं है। उसका एक पूरा लंबा काला इतिहास है। इसमें संसद पर हमले में उनकी संदिग्ध भूमिका का मामला सबसे बड़ा है। लेकिन इसी तरह की उनकी कई और कारस्तानियां हैं जो अभी तक जनता की निगाह में नहीं आ पायी हैं। हालांकि जम्मू-कश्मीर में चीजों पर नजर रखने वाले लोग उससे परिचित हैं लेकिन बाहर के लोग उनसे बिल्कुल अनजान हैं।

जनचौक ने कल देविंदर सिंह की गिरफ्तारी और अफजल गुरू के हवाले से आये संसद हमले में उनकी संदिग्ध भूमिका के बारे में विस्तार से बताया था। आज श्रीनगर आधारित कुछ खास सूत्रों से उनके बारे में कुछ और जानकारियां मिली हैं। जिसके मुताबिक 1992-93 के दौरान देविंदर सिंह ट्रैफिक पुलिस में काम करता था। और उसी समय अपने एक अफसर के साथ एक गाड़ी की तलाशी में उसने ब्राउन शुगर पकड़ा। बताया जाता है कि उस ब्राउन शुगर की कीमत उस समय 2 करोड़ रुपये थी। लेकिन देविंदर और उसके अफसर ने उसे सरकारी मालखाने में जमा करने की जगह बाजार में बेच दिया और उसके बदले आए पैसे का आपस में बंटवारा कर लिया। यानी अफसर और देविंदर सिंह मिलकर पूरा का पूरा माल हड़प गए।

बाद में यह बात मीडिया के जरिये बाहर आई तो पुलिस ने जांच बैठा दी। इस मामले में श्रीनगर के एक पुलिस स्टेशन में उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि जांच में यह साबित भी हो गया था कि माल जब्त करने के बाद उसे बाजार में बेच दिया गया था। और इस मामले में देविंदर सिंह के खिलाफ कार्रवाई बिल्कुल तय मानी जा रही थी। जिसमें उसकी गिरफ्तारी भी तय थी। लेकिन इसी बीच जम्मू-कश्मीर में काउंटर इंसरजेंसी फोर्स का गठन हो रहा था। जिसे पहले टास्क फोर्स और फिर स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) का नाम दिया गया। बताया जाता है कि कोई भी सही और ईमानदार पुलिस अफसर उसमें जाने के लिए राजी नहीं था। लिहाजा यह ऐसे पुलिसकर्मियों के लिए स्वर्ग बन गया जो किसी न किसी मामले में फंसे थे या फिर उन पर किसी तरह का दाग था।

सूत्रों का कहना कि उस समय के तत्कालीन आईजी ने देविंदर सिंह को बुलाया और उससे कहा कि अगर आपको बचना है तो एसओजी में आ जाइये। देविंदर के लिए भला इससे बेहतर बात और क्या हो सकती थी। उसने तुरंत आईजी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और इसके साथ ही उसके खिलाफ लगे सभी चार्जेज खत्म हो गए। या फिर उन पर कभी कोई अमल नहीं हुआ।

एसओजी में शामिल होने के बाद देविंदर सिंह का जो चेहरा सामने आया वह बेहद खूंखार था। कस्टडी में आए किसी कैदी को जब टार्चर करना होता था तो उसकी जिम्मेदारी देविंदर सिंह को दी जाती थी। शायद यही वजह है कि एसओजी में सारे अफसर उसे टार्चर सिंह के नाम से बुलाने लगे थे।

वह किस कदर खूंखार था उसकी झलक जम्मू-कश्मीर के एक मानवाधिकार संगठन “जम्मू-कश्मीर कोयलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी” की एक रिपोर्ट को देखकर भी समझा जा सकता है।

इस ह्यूमन राइट्स ग्रुप ने “स्ट्रक्चर ऑफ वायलेंस” के नाम से 2015 में एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें 972 ऐसे फौजी, पुलिस और पैरामिलिट्री अफसरों के नाम हैं जिन्होंने सूबे में जमकर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी नामों के साथ उनकी कारस्तानियों को भी दर्ज किया गया है। इस रिपोर्ट में देविंदर सिंह का भी नाम दर्ज है जो क्रम संख्या 129 पर आता है। खास बात यह है कि रिपोर्ट में केवल वही घटनाएं दी गयी हैं जो आधिकारिक रूप से सामने आयी हैं। या फिर पुलिस-प्रशासन और सरकार ने उन्हें माना है।

उन्हीं में लाल चौक के पास स्थित मंदिरबाग हबाकदल के 19 वर्षीय एक छात्र एजाज अहमद बज़ाज़ की हिरासत में हत्या किए जाने का जिक्र है। इसमें बताया गया है कि बज़ाज़ को उसके घर से उठाया गया था। और फिर पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी गयी थी।

देविंदर से जुड़ी दूसरी घटना ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट सलमान युसूफ की है। युसूफ नार्थ कश्मीर के रहने वाले हैं। देविंदर ने उनको बुरी तरह से टार्चर किया था।

खास बात यह है कि दोनों घटनाएं आफिसियल डाक्यूमेंट से ली गयी हैं। इसके अलावा उसके ऊपर ढेर सारे आरोप हैं जो अभी तक साबित नहीं हो पाए हैं। उनकी तादाद इतनी ज्यादा हैं कि उन्हें उंगलियों पर नहीं गिना जा सकता है।

वैसे तो देविंदर पुलवामा जिले में भी डिप्टी एसपी डीआर के पद पर तैनात था लेकिन यह तैनाती 2009-10 के दौरान थी। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि पुलवामा उसका पैतृक जिला है। वह पुलवामा जिले के ट्राल का रहने वाला है।

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आज ही इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर में एक अफसर के हवाले से कहा है कि “उसकी (देविंदर सिंह की) कारस्तानियों ने आखिर उसे पकड़वा ही दिया। इस बार मैं नहीं जानता कि कोई उसे बचा पाएगा।”

उसके आगे उन्होंने कहा कि “उससे बहुत सारे सवाल पूछे जाएंगे। वह दोनों आतंकियों को लेकर कहां जा रहा था? वो घाटी छोड़कर जा रहे थे जैसा कि उन्हें जम्मू के रास्ते में पकड़ा गया है। उनके पास क्या योजना थी? ”

उन्होंने कहा कि “उसके नेतृत्व में जितने भी आपरेशन संचालित किए गए हैं या फिर उसके सहयोगी शामिल रहे हैं वे सभी अब संदेह के घेरे में आ गए हैं।”

उन्होंने कहा कि वह पुलवामा में भी डिप्टी एसपी डीआर के पद पर तैनात था। एक बार उसने अगर मुंह खोला तो साजिशों की झड़ी सामने आ जाएगी।

दिलचस्प और बेहद खौफनाक बात यह है कि अभी बाहर से गए विदेशी डिप्लोमैट्स का न केवल उसने स्वागत किया बल्कि उनकी सुरक्षा में भी उसको तैनात किया गया था। इससे समझा जा सकता है कि उसको शामिल कर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कितना बड़ा खतरा मोल लिया था। एक तरह से डिप्लोमैट आतंकियों की निगहबानी में घूम रहे थे।

आईजीपी (कश्मीर) विजय कुमार ने कल प्रेस कांफ्रेंस में उसे आतंकी करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि उसके साथ उसी तरह से व्यवहार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि “जैसा कि आप जानते हैं वह वरिष्ठ पुलिस अफसर हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी कई कार्रवाइयों में हिस्सा लिया है। लेकिन कल जिस तरह से वह पकड़े गए हैं…..जम्मू के रास्ते में दो-तीन आतंकियों के साथ एक कार में….वह एक घृणित अपराध है। और इसीलिए हम लोग उनके साथ एक आतंकवादी जैसा व्यवहार कर रहे हैं।”

सूत्रों के मुताबिक आतंकियों को चंडीगढ़ ले जाया जा रहा था। और वहां सिखों को मारकर पाकिस्तान के खिलाफ रोष भड़काने की साजिश रची गयी थी। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि अभी तक नहीं हो पायी है।

गाड़ी से पकड़े गए हथियार-एक एके 47, एक पिस्टल, तीन मैगजीन, छह राउंड 174, पांच ग्रेनेड, नकद में 32270 रुपये। एफआईआर नंबर 5/22 सेक्शन 7/20, आर्म्स एक्ट तथा 18,19,20 अनलाफुल एक्टिविटी आदि आईपीसी की तमाम धाराओं के साथ काजीगुंडा थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही देविंदर सिंह के घर पर मिले हथियारों और बरामद सामान पर श्रीनगर स्थित राम मुंशीबाग थाने में अलग से एफआईआर दर्ज की गयी है।

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