Friday, August 19, 2022

द्रौपदी मुर्मू देश की राष्ट्रपति या भाजपा की? 

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ओडिशा के आदिवासी समुदाय से आने वाली द्रौपदी मुर्मू देश की 15वीं राष्ट्रपति बन गई हैं। वे देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं। प्रतीकात्मक तौर पर यह पूरे देश के लिए गर्व और भारत के अपाहिज होते जा रहे लोकतंत्र के लिए सम्मान की बात है कि बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली सर्वाधिक वंचित समुदाय की एक महिला देश की प्रथम नागरिक बनी हैं। मगर इस गर्व और सम्मान की बात के साथ ही बेहद शर्मनाक बात यह है कि देश की इस प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति को दलीय राजनीति का मोहरा बनाने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है। इस सिलसिले में द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने की आधिकारिक घोषणा के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने उनकी जीत का जश्न मनाते हुए राजधानी दिल्ली सहित देश के कई शहरों में विजय जुलूस निकाले हैं और देश के आदिवासी बहुल इलाकों में उनकी जीत पर पूर्व नियोजित जलसे हो रहे हैं।

राष्ट्रपति के चुनाव में अपने उम्मीदवार की जीत पर भाजपा का विजय जुलूस निकालना कोई सामान्य घटना नहीं है, क्योंकि इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि राष्ट्रपति किसी पार्टी का नहीं बल्कि देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है। द्रौपदी मुर्मू जब तक चुनी नहीं गई थीं तब तक वे भाजपा और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन यानी एनडीए की उम्मीदवार थीं। फिर उन्हें तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों के अलावा कुछ विपक्षी पार्टियों ने भी घोषित रूप से समर्थन दिया था। यही नहीं, जिन विपक्षी पार्टियों ने उनके खिलाफ अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा था, उन पार्टियों के भी कुछ सांसदों और विधायकों ने पार्टी लाइन से हट कर विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के बजाय द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया था। ऐसे में उनकी जीत के बाद उन्हें किसी दल के दायरे में कैसे रखा जा सकता है? 

अपने देश में राष्ट्रपति का पद प्रधानमंत्री की तरह राजनीतिक नहीं होता है। प्रधानमंत्री देश का भी होता है और किसी दल का भी होता है, लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया व्यक्ति अपने निर्वाचन के बाद किसी दल का नहीं रह जाता। अलबत्ता उसकी निष्पक्षता का पलड़ा आम तौर पर सरकार की तरफ ही झुका रहता है। इसके बावजूद सैद्धांतिक रूप से वह दलीय सीमाओं से परे देश का राष्ट्रपति होता है। इस बुनियादी बात को भाजपा के नेता भी निश्चित रूप से जानते होंगे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने द्रौपदी मुर्मू की जीत पर जुलूस निकाले। आजाद भारत के इतिहास में इससे पहले राष्ट्रपति पद के 15 चुनाव हुए लेकिन किसी भी चुनाव के बाद विजय जुलूस नहीं निकला, चाहे केंद्र में किसी भी पार्टी या गठबंधन की सरकार रही हो या राष्ट्रपति किसी भी पार्टी से जुड़े रहे हों। 

पिछली बार यानी 2017 में भी केंद्र में भाजपा की सरकार थी और राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए रामनाथ कोविंद भाजपा के उम्मीदवार थे। वे भी बड़े अंतर से चुनाव जीते थे लेकिन उनकी जीत पर भी विजय जुलूस नहीं निकाला गया था। यह पहली बार हुआ कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद सत्तारूढ़ पार्टी ने अपने उम्मीदवार की जीत पर जुलूस निकाल कर वैसे ही जश्न मनाया जैसे नेताओं के सांसद, विधायक या निगम पार्षद चुने जाने पर उनके समर्थक जुलूस निकालते हैं।

द्रौपदी मुर्मू की जीत पर अगर भाजपा के सामान्य कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकाला होता तो उसे उत्साही कार्यकर्ताओं की फौरी प्रतिक्रिया मान कर नजरअंदाज किया जा सकता था लेकिन राजधानी दिल्ली में भाजपा के इस जुलूस की अगुवाई खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने की। दिल्ली सहित देश के कई शहरों में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए जिन पर नव-निर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें छपी थीं। जाहिर है कि जुलूस निकालने और व्यापक पैमाने पर जश्न मनाने की योजना पहले ही बन चुकी थी। यह कहना भी गैर जरूरी है कि यह योजना सत्ता शीर्ष के निर्देश पर या उसकी सहमति से ही बनी होगी।

ऐसा मानने या समझने की वजह यह है कि भाजपा ने देश के एक लाख तीस हजार ऐसे गांव चिन्हित किए हैं जो या तो आदिवासी बहुल हैं या जहां आदिवासी आबादी खासी संख्या में है। इन गांवों में द्रौपदी मुर्मू की जीत का जश्न मनाने की योजना है, जिसकी तैयारी पार्टी ने पहले से कर रखी है। भाजपा की स्थानीय शाखाएं जश्न के आयोजन कर रही हैं। यह सही है कि भाजपा ने देश का पहला आदिवासी राष्ट्रपति बनाने की पहल की और बेहद साधारण परिवार की द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया। उसकी इस पहल का देश-दुनिया में भरपूर प्रचार भी हुआ है, अभी हो भी रहा है और आगे भी होता रहेगा।

कोई चाहे या न चाहे, उसकी यह पहल इतिहास में दर्ज हो गई है। फिर भी इसका श्रेय लेने के लिए जुलूस और जश्न का फूहड़ प्रदर्शन क्यों? कोई भी इसे अच्छी या स्वस्थ नजीर नहीं कह सकता। चूंकि भाजपा में वाजपेयी-आडवाणी युग की समाप्ति और मोदी-शाह युग की शुरुआत के बाद हर काम चुनावी मकसद से होता है या उसका चुनावी फायदा बटोरा जाता है, इसलिए चुनावी राजनीति की बिसात पर आदिवासी राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू को भी मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। 

पिछली बार भाजपा ने ही रामनाथ कोविंद के रूप में एक दलित को राष्ट्रपति बनाया था लेकिन तब उनकी जीत पर कोई जुलूस नहीं निकाला गया था और न ही किसी तरह का जश्न मनाया गया था। तब उसने ऐसा इसलिए नहीं किया था, क्योंकि रामनाथ कोविंद पहले दलित राष्ट्रपति नहीं थे। उनसे पहले केआर नारायणन दलित राष्ट्रपति हो चुके थे, जिन्हें संयुक्त मोर्चा सरकार ने बनाने की पहल की थी और कांग्रेस व भाजपा सहित लगभग सभी दलों ने उनका समर्थन किया था। चाहती तो संयुक्त मोर्चा की पार्टियां भी देश को पहला दलित राष्ट्रपति मिलने का श्रेय लेने के लिए जुलूस निकाल सकती थीं, विज्ञापनों और होर्डिंग्स के जरिए ढिंढोरा पीट सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

इसके बावजूद भाजपा चाहती तो कोविंद के राष्ट्रपति बनने पर भी जुलूस निकाल सकती थी लेकिन तब उसने ऐसा नहीं किया। इसीलिए सवाल है कि इस बार ऐसा क्या हो गया कि द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने का देश भर में इतने प्रचार हो रहा है? सरकार और भाजपा के प्रचार तंत्र का हिस्सा बन चुके टीवी चैनलों पर मुर्मू की संघर्ष गाथा का अखंड पाठ हो रहा है और उनके बहाने प्रधानमंत्री मोदी को आदिवासियों के मसीहा के तौर पर पेश किया जा रहा है। जाहिर है कि मोदी और भाजपा की नजरें 2024 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर टिकी हैं। 

देश के दो आदिवासी बहुल राज्यों छत्तीसगढ़ और झारखंड में भाजपा बुरी तरह हारी है। इसके अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान भी अच्छी खासी आदिवासी आबादी वाले राज्य हैं, जहां भाजपा पिछले चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई थी। इनमें से झारखंड को छोड़ कर बाकी तीन राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। झारखंड में भी सरकार कभी भी गिर सकती है और मध्यावधि चुनाव की नौबत आ सकती है। इसके अलावा द्रौपदी मुर्मू के गृह राज्य आदिवासी बहुल ओडिशा में भी सत्ता पर काबिज होना भाजपा की प्राथमिकताओं में है। इसीलिए वह आदिवासी राष्ट्रपति बनाने का ढिंढोरा पीटते हुए पूरी निर्लज्जता के साथ देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद को भी दलीय राजनीति में घसीटने की क्षुद्रता दिखा रही है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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