Wednesday, December 8, 2021

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किसानपुत्र प्रो.श्याम सुंदर ज्याणी ने दुनियाभर में लहराया भारत का परचम

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बेतरतीब औद्योगीकरण व इंसानी लालच ने प्रकृति के साथ बहुत खिलवाड़ किया है। सरकारें वनों को बचाने के लिए धरती के एक निश्चित हिस्से को वन क्षेत्र के लिए सरंक्षित कर देती हैं। जनसंख्या वृद्धि व अंतहीन मानवीय लालसा के कारण संरक्षित वन क्षेत्रों पर भी अतिक्रमण कर लिया जाता है। दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से जूझ रही है व दुनिया भर के वैज्ञानिक व पर्यावरणविद धरती बचाने के लिए विभिन्न तरीकों से संघर्ष कर रहे हैं।

विकास की अंधाधुंध दौड़ के बीच धरती को बचाने की समस्या खड़ी हो और चहुंओर अंधेरा नजर आता हो तो उजाले का चिराग ले कर कोई धरतीपुत्र सामने आता है। UNCCD (यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन) हर 2 साल बाद धरती बचाने को ले कर नवाचार देने वाले व्यक्ति/संस्था को “Land for life” पुरस्कार से सम्मानित करती है और अगले 2 साल तक उस को एम्बेसडर के रूप में नियुक्त करती है। यह पुरस्कार धरती की सब से बड़ी संस्था यानि UN प्रदान करती है।

कोस्टारिका में आयोजित निर्णायक मंडल के पास दुनियाभर से हजारों नॉमिनेशन आए, उस में से अंतिम रूप से चयनित 12 पर निर्णय करना था जिसमें भारत से 2 नॉमिनेशन थे। एक “Run for River” जिसे सदगुरु चलाते हैं व दूसरा “Familial Forestry” जो बीकानेर के डूंगर कॉलेज के प्रोफेसर श्याम सुंदर ज्याणी चलाते हैं व खुद समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष हैं। UNCCD ने अंतिम रूप से “Familial Forestry” को बेहतर नवाचार मान कर विजेता घोषित किया।

प्रो.श्याम सुंदर ज्याणी ने बंजर होती धरती को बचाने के लिए वर्तमान का विश्लेषण किया और विरासत के अनुभवों को उनके साथ जोड़ दिया। Legend of legacy का सफर शुरू हो गया। महाविद्यालय में तकरीबन 5 हेक्टेयर जमीन पर पेड़ पौधे लगा कर हरित सफर का प्रेरक मानक तय कर दिया और सामाजिक समारोहों के आपसी लेन देन से लेकर सम्मान/पुरस्कारों को हरित अभियान की तरफ मोड़ दिया।

शादी/बारात में 2-2 फलदार पौधों के लेन देन के लिए लोगों को प्रेरित किया, जन्मदिन की पार्टियों में सुखाड़ तोहफों की बजाय 2 फलदार पौधों के उपहार को बढ़ावा दिया। पुरस्कार समारोहों में प्रशस्ति पत्रों के साथ मोमेंटो के बजाय फलदार पौधे देने की मुहिम चलाई। धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया और हजारों लोग जुड़ते गए। सूखी बंजर धरती को हरित में बदलने का यह नवाचार बेहतरीन है।

वन हो या पशुपक्षी इन को बढ़ाने के लिए सरंक्षण से ज्यादा संवर्द्धन की जरूरत होती है। जब तक उपयोगी अर्थात लाभांश देने वाले रहेंगे तब तक इंसान इनको अपने बच्चों की भांति पालनपोषण करता रहेगा। गांवों व छोटे कस्बों में हर परिवार 4-5 फलदार पेड़ अपने घर में लगा सकता है। 

किसानों को खेतों की मेड़ पर उपयोगी पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जाए तो सूखी बंजर भूमि हरियाली से लहलहा उठेगी। मरुस्थल में भेड़-बकरी पालन की तरह घरों में फलदार पेड़ जीविकोपार्जन का विकल्प बन सकता है। इस तरह की संस्कृति समाज में पैदा करने की तरफ प्रोफेसर ज्याणी का “पारिवारिक वानिकी” की संकल्पना अतुलनीय है।

अगस्त अंत मे चीन में आयोजित होने वाले समारोह में प्रो. ज्याणी को विधिवत रूप से Legend of life award भेंट किया जाएगा। पुरस्कार विजेता को COP यानि कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज जिस मे 195 देशों के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति पर्यावरण मंत्री आदि प्रतिनिधि के रूप में मौजूद रहते हैं, को सम्बोधित करने का अवसर दिया जाता है। अगले 2 साल तक बतौर UNCCD एम्बेसडर उन को दुनियाभर में “पारिवारिक वानिकी” की संकल्पना को बढ़ाने के लिए मंच उपलब्ध होगा।

लाज़िम है प्रो.ज्याणी को बड़ा मंच अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिए मिलेगा। किसान परिवार से निकला एक छोटा सा “पारिवारिक वानिकी” का कार्यकर्ता दुनिया की नजर में एक सेलिब्रेटी होगा। जमीनी स्तर पर लगभग दो दशक तक यह कार्य करके दिखाने का अनुभव सामंजस्य बिठाने में जरूर काम आएगा। हम सभी को इस नवाचार से प्रेरणा ले कर इस मुहिम में शामिल होना चाहिए। प्रो.ज्याणी ने हमें दिशा दी है अब दुनिया को दिशा देने के इस अभियान का ज्यादा भार हमारे कंधों पर है।

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

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