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हाथरस कांडः सीबीआई ने दाखिल की गैंगरेप-हत्या और एसस-एसटी एक्ट की धाराओं में चार्जशीट

हाथरस गैंगरेप केस में सीबीआई ने शुक्रवार को चारों आरोपियों के खिलाफ स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी। आरोपी, 19 साल की दलित युवती के साथ गैंगरेप करने तथा बाद में उसकी हत्या कर देने के मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। जांच एजेंसी ने हाथरस की एक स्थानीय अदालत में संदीप, लवकुश, रवि और रामू के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। आरोपियों के खिलाफ गैंगरेप-हत्या की धाराओं के अलावा एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी लगाई गई हैं।

हाई कोर्ट में 16 दिसंबर को हुई सुनवाई के दौरान सीबीआई ने 18 दिसंबर तक जांच पूरी करने की बात कही थी। सीबीआई ने 22 सितंबर को मौत से पहले पीड़ित के आखिरी बयान को आधार बनाकर 2000 पेज की चार्जशीट फाइल की है।

सीबीआई ने इस मामले में आरोपी बनाए गए चार लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 325- एससी/एसटी एक्ट, 302 (हत्या), 354 (महिला पर दुष्कर्म की नीयत से हमला), 376 ए और 376 डी (रेप) के तहत चार्जशीट फाइल की है। वहीं पीड़ित के भाई ने कहा, “आज हमें पहली सीढ़ी पर न्याय मिला है। आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। हाथरस के डीएम को हटाया जाना चाहिए।”

हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर को सुनवाई की अगली तारीख 27 जनवरी तय कर दी है। हाई कोर्ट ने उस दिन हाथरस के डीएम प्रवीण कुमार और एसपी रहे विक्रांत वीर को तलब किया है। तब पीड़ित परिवार भी कोर्ट में मौजूद होगा। हालांकि, अभी तक हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार को मकान और नौकरी देने के बारे में कोई आदेश नहीं दिया है।

14 सितंबर को उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित लड़की के साथ कुछ युवकों ने कथित तौर पर गैंगरेप किया था। लड़की के साथ मारपीट भी की गई थी। गंभीर हालत में लड़की को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां 29 सितंबर को उसकी मौत हो गई। सफदरजंग अस्पताल में पीड़ित की मौत के बाद पुलिस ने रात में ही पीड़ित का शव गांव ले जाकर परिवार की गैरमौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया था। उत्तर प्रदेश सरकार पर सवाल उठने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी।

सीबीआई ने 11 अक्तूबर को हाथरस केस की जांच शुरू की थी। अब तक पीड़ित और आरोपियों के परिजन समेत 50 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की जा चुकी है। घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने का दावा करने वाले चश्मदीद छोटू से भी कई बार पूछताछ की गई है। सीन री-क्रिएशन के साथ घटनास्थल का नक्शा भी बनाया गया।

जब 14 सितंबर को हाथरस में दलित युवती के साथ गैंगरेप की घटना सामने आई तो शुरुआत में मुक़दमा दर्ज नहीं किया गया। पीड़िता के इलाज के उचित इंतज़ाम नहीं हुए। जब उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया तब तक देर हो गई और पीड़िता की मौत हो गई। चार सवर्णों पर गैंगरेप का आरोप लगा। पुलिस ने परिवार वालों की ग़ैर मौजूदगी में 30 सितंबर को रातोंरात उसका अंतिम संस्कार कर दिया। आरोप लगा कि परिवार वालों को चेहरा तक नहीं देखने दिया गया। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उस पर दबाव डाला गया।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक अक्तूबर को दावा किया था कि हाथरस की दलित पीड़िता के विसरा की फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट से यह पता चला है कि युवती के साथ बलात्कार या सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ है। तब यूपी पुलिस के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने कहा था कि रेप के बारे में एफ़एसएल की रिपोर्ट आ गई है और इससे पता चलता है कि बलात्कार के कोई सबूत नहीं हैं। पुलिस ने घटना के बाद उचित धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया और पीड़िता को चिकित्सा सुविधा दी गई। 25 तारीख़ को सारे सैंपल एफ़एसएल को भेजे गये। जो सैंपल इकट्ठे गए थे, उसमें किसी तरह का स्पर्म और शुक्राणु नहीं पाया गया है। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने कहा था कि सरकारी मेडिकल रिपोर्ट में लड़की के साथ दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई है।

इसके विपरीत सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो में दलित युवती ने कहा था कि उसके साथ गैंगरेप किया गया, जबरदस्ती की गई, गला दबाने की कोशिश भी की गई। बाद में यह तथ्य सामने आया कि जिस सैंपल के आधार पर यूपी पुलिस दुष्कर्म नहीं होने की बात कह रही थी, वह सैंपल इतने बाद में लिया गया था कि तब तक दुष्कर्म की पुष्टि होना बेहद मुश्किल था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने लिखा कि कोर्ट की यह बाध्यकारी ज़िम्मेदारी है कि संविधान के तहत मिले उनके अधिकारों की हर क़ीमत पर रक्षा करे और राज्य राजनीतिक या प्रशासनिक कारणों से अपनी सीमित शक्तियों को लांघ कर नागरिकों और ख़ासकर ग़रीबों और दलितों के अधिकारों को न रौंदे। आदेश में कहा गया था कि हम इस बात की जांच करना चाहेंगे कि क्या राज्य के अधिकारियों द्वारा मृतक के परिवार की आर्थिक और सामाजिक हैसियत का फ़ायदा उठाकर उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया गया है और उनका उत्पीड़न किया गया है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 18, 2020 7:41 pm

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