नारदा मामले में हाईकोर्ट जज ने फोड़ा पत्र बम,पूरी न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह

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नारदा मामले की सुनवाई को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश ने पत्र बम फोड़ दिया है जिससे पूरी न्यायपालिका स्तब्ध है और किसी के मुंह से बोल नहीं निकल रही है। इस पत्र से पूरी विधिक और न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश जस्टिस अरिंदम सिन्हा ने नारदा स्टिंग मामले में हाईकोर्ट में पहले खंडपीठ फिर पांच जजों की पीठ द्वारा की जा रही सुनवाई के न्यायिक और विधिक औचित्य पर गम्भीर सवाल उठाया है और कहा है कि हम मजाक बनकर रह गए हैं।

जस्टिस सिन्हा ने कहा है कि नारदा केस को बंगाल के बाहर ट्रांसफर करने संबंधी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका को कलकत्ता हाईकोर्ट ने गलत तरीके से रिट याचिका के रूप में लिस्ट किया और इस कारण इसे सिंगल बेंच की जगह डिवीजन बेंच को सौंप दिया गया। हाईकोर्ट को एक साथ काम करने की जरूरत है। हमारा व्यवहार उच्च न्यायालय के आचरण के खिलाफ है।

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस अरिंदम सिन्हा ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों को पत्र लिखा है, जिसमें उच्च न्यायालय ने नारदा मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर स्थानांतरण याचिका को एक खंडपीठ के समक्ष एक रिट याचिका के रूप में सूचीबद्ध करने के तरीके पर गंभीर आपत्ति जताई है।

24 मई की तारीख वाला पत्र, सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच के आदेश को चुनौती देने के बाद लिखा गया है। इस आदेश में मंत्रियों सुब्रत मुखर्जी, फिरहाद हकीम, टीएमसी विधायक मदन मित्रा और कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी को हाउस अरेस्ट करने का निर्देश दिया गया था। पत्र में सीबीआई की याचिका को स्वीकार करने और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच को सौंपने को लेकर सवाल उठाए हैं।

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा-407 के तहत विचाराधीन स्थानांतरण याचिका को उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने 17 मई को सीबीआई द्वारा अदालत को भेजे गए एक ईमेल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वाईजे दस्तूर द्वारा किए गए एक उल्लेख के आधार पर लिया था।

पत्र में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के अपीलीय पक्ष नियम जो ऐसे मामलों में सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, के लिए यह आवश्यक है कि दीवानी या आपराधिक पक्ष में स्थानांतरण की मांग करने वाले प्रस्ताव को एकल-न्यायाधीश द्वारा सुना जाना चाहिए। उन्होंने कहा है कि हालांकि, पहली डिवीजन बेंच ने इसे एक रिट याचिका के रूप में मानते हुए मामले को उठाया। यहां तक कि संविधान के अनुच्छेद-228 के तहत एक रिट याचिका को भी दृढ़ संकल्प वाले एकल न्यायाधीश के पास जाना चाहिए था। उन्होंने कहा है कि सीबीआई द्वारा 17 मई को उच्च न्यायालय को भेजे गये कम्युनिकेशन को रिट याचिका के रूप में नहीं माना जा सकता था, क्योंकि कानून की व्याख्या के बारे में कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं उठाया गया था।

पत्र में कहा गया है कि भीड़ कारक प्रस्ताव के निर्णय के लिए योग्यता के आधार पर हो सकता है, लेकिन क्या प्रथम खंडपीठ इसे ले सकती है और इसे सुनना जारी रख सकती है क्योंकि एक रिट याचिका पहला सवाल है। पत्र में कहा गया है कि क्या किसी आपराधिक मामले के ट्रांसफर के मामले में शक्ति का इस्तेमाल करने वाला हाई कोर्ट, उस स्तर पर, अपनी पहल पर स्टे का आदेश जारी कर सकता था, यह दूसरा सवाल है। पत्र में उस तरीके पर भी सवाल उठाया उठाया गया है जिस तरह से डिवीजन बेंच ने 17 मई को विशेष अदालत द्वारा आरोपी को दी गई जमानत पर रोक लगा दी थी। डिवीजन बेंच के जजों के असहमत होने के बाद जज ने मामले को पांच जजों की बेंच को रेफर करने पर भी ऐतराज जताया।

जब किसी खंडपीठ के न्यायाधीश किसी बिंदु या मुद्दे पर भिन्न होते हैं, तो उसे राय के लिए तीसरे विद्वान न्यायाधीश के पास भेजा जाता है। परिसर में, अपीलीय पक्ष नियमों के अध्याय II में नियम 1 लागू नहीं होता अध्याय VII एक पूर्ण पीठ के संदर्भ के लिए प्रदान करता है। ऐसा संदर्भ तब उत्पन्न होता है जब एक डिवीजन बेंच द्वारा लिया गया विचार किसी अन्य डिवीजन बेंच द्वारा लिए गए विचार से असंगत होता है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय को मिलकर अपना काम करना चाहिए।

सीबीआई ने सीबीआई के दफ़्तर के बाहर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के धरने पर बैठने का जिक्र करते हुए माँग की थी कि इस मामले को बंगाल के बाहर ट्रांसफर किया जाए। सीबीआई ने यह भी आरोप लगाया कि जब अभियुक्त राजनेताओं को पेश किया जा रहा था तब राज्य के विधि मंत्री, भीड़ के साथ कोर्ट पहुँच गए थे।

इस पर जस्टिस सिन्हा ने कहा कि सीबीआई दफ़्तर के बाहर भीड़ का जमा होना एक कारण बन सकता है, लेकिन उन्होंने इस पर यह सवाल उठाया है कि ‘क्या इस आधार पर ही इसे रिट याचिका के रूप में देखा जाना चाहिए था। जस्टिस सिन्हा ने इस पर भी आपत्ति जताई है कि जब बेंच के जजों की एक राय नहीं हो सकी तो किसी तीसरे जज की राय लेने के बदले उसे बड़े बेंच के पास भेज दिया गया, यह ग़लत कदम है।

पत्र में अफ़सोस व्यक्त किया गया है कि हमारा आचरण उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ है। हम एक मजाक बन गए हैं।इसलिए मैं सबसे गुजारिश करता हूँ कि ज़रूरी कदम उठा कर स्थिति को संभाल लें, हमारे नियमों और अलिखित आचार संहिता की शुचिता को बरक़रार रखने के लिए जो मुमकिन हो करें, ज़रूरत पड़ने पर अदालत की फुल बेंच भी बुला लें।

17 मई को, चार टीएमसी नेताओं को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था, लेकिन उसी दिन सीबीआई की एक अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी।हालांकि, सीबीआई ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर जजों से विशेष सीबीआई अदालत से हाई कोर्ट में केस को ट्रांसफर करने, 17 मई को एजेंसी अदालत में हुई कार्यवाही को कानून की नजर में अमान्य घोषित करने और कार्यवाही को नए सिरे से शुरू करने का अनुरोध किया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह कानूनी मामलों के जानकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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