Wednesday, October 27, 2021

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विकास दुबे एनकाउंटर मामले में जांच आयोग ने दी पुलिस को क्लीन चिट

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जैसी की उम्मीद थी वैसी ही रिपोर्ट गैंगस्टर विकास दुबे मुठभेड़ मामले की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच आयोग ने दी है। जांच आयोग ने पुलिस को क्लीन चिट दे दी है और एनकाउंटर को सही पाया है। आयोग ने कहा है कि दुबे की मौत के इर्दगिर्द का घटनाक्रम जो पुलिस ने बताया है, उसके पक्ष में साक्ष्य मौजूद हैं। आयोग में जस्टिस (सेवानिवृत्त) बीएस चौहान, जस्टिस (सेवानिवृत्त) एसके अग्रवाल और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता शामिल थे। आयोग ने 21 अप्रैल को राज्य सरकार को 824 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी थी। आयोग के गठन के समय ही इसमें शामिल पूर्व पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता के नाम पर विवाद उठा था और उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े किये गए थे।  

एनकाउंटर की सच्चाई जानने के लिए उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यों का एक आयोग बनाया था। इसके अध्यक्षत सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज डॉ बीएस चौहान थे।इसके अन्य दो सदस्य इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज शशि कांत अग्रवाल और यूपी के पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता थे। आयोग ने रिपोर्ट में पुलिस और न्यायिक सुधार संबंधी कई सिफारिशें की हैं।आयोग की ये रिपोर्ट 19 अगस्त को यूपी विधानसभा में पेश की गयी। आयोग ने भले ही पुलिस को एनकाउंटर में क्लीन चिट दी है लेकिन इस बात को माना है कि विकास दुबे और उसके गैंग को लोकल पुलिस के साथ ही जिले के राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण मिला हुआ था।

कानपुर के बिकरू गांव में 2-3 जुलाई 2020 की रात को रेड मारने गए 8 पुलिसवालों की निर्ममता से हत्या कर दी गई थी। इसमें डिप्टी एसपी देवेंद्र मिश्रा भी शामिल थे।मामले में 21 लोगों के खिलाफ एफआईआर लिखाई गई, जिसमें से 6 को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया है। विकास दुबे को उज्जैन से कानपुर लाते वक्त पुलिस ने दावा किया था कि पुलिस की गाड़ी पलटी थी, जिसका फ़ायदा उठाकर विकास दुबे पुलिस पर हमला करके भागने लगा।पुलिस ने कहा कि जवाबी फ़ायरिंग में मुठभेड़ हुई और विकास दुबे की मौत हो गयी। हालाँकि उज्जैन से विकास दुबे को ला रही पुलिस टीम के पीछे पीछे आ रहे टीवी चैनलों के पत्रकारों की गाड़ियाँ मुठभेड़ स्थल से कई किलोमीटर पीछे ही पुलिस ने रोक दिया था। इससे मुठभेड़ की कहानी पर सवाल खड़े हो गये।

इसी कथित मुठभेड़ की जांच के लिए ही आयोग का गठन किया गया था। मामले की जांच के बाद आयोग ने कहा कि पुलिस पक्ष और घटना से संबंधित सबूतों के खंडन के लिए मीडिया और जनता में से कोई भी सामने नहीं आया है। आयोग ने कहा कि विकास दुबे की पत्नी ऋचा ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए एक एफिडेविट दिया था लेकिन वो आयोग के सामने पेश नहीं हुईं। इसीलिए पुलिस पर शक नहीं किया जा सकता। मजिस्ट्रेट जांच में भी यही निष्कर्ष सामने आया था।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पाया है कि विकास दुबे को ऐसी जगह पर गोली मारी गई है जो जानलेवा नहीं थी। ने मतलब पुलिस की मंशा उसे मारने की नहीं बल्कि घायल करके पकड़ने की थी। आयोग ने ऐसी ही क्लीन चिट एनकाउंटर में मारे गए अमर दुबे, प्रवीन कुमार पांडे और प्रभात मिश्रा के एनकाउंटर में दी है।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यूपी पुलिस और प्रशासन पर अपराधी के साथ मिली भगत को लेकर गंभीर बातें लिखी हैं। रिपोर्ट में लिखा गया है कि पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी विकास दुबे और उसके गैंग को संरक्षण देते थे। अगर कोई विकास दुबे या उसके सहयोगी के खिलाफ शिकायत करने जाता था तो पुलिस शिकायत करने वाले को अपमानित करती थी। यहां तक कि उच्चाधिकारियों के शिकायत दर्ज करने के निर्देशों को भी लोकल पुलिस अनसुना करती थी। रिपोर्ट कहती है कि विकास दुबे की पत्नी का जिला पंचायत सदस्य और उसके भाई की पत्नी का ग्राम प्रधान चुना जाना दिखाता है कि उसकी लोकल प्रशासन से कितनी मिली भगत थी।

उत्तर प्रदेश के कानपुर का हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे की 1990 के पहले से शुरू हुई गांव की दबंगई हत्या, ज़मीनें हड़पना, हत्या की साज़िश रचने के आरोपों तक पहुंची। जांच आयोग ने पाया कि उसे किसी भी गंभीर आरोप में सजा न मिलने के पीछे पुलिस और प्रशासन की मिली भगत रही।विकास दुबे और सहयोगियों के खिलाफ दर्ज कराई गई किसी भी शिकायत की निष्पक्षता से जांच नहीं की गई। चार्जशीट फाइल करने से पहले ही गंभीर धाराएं हटा ली गईं। ट्रायल के दौरान ज्यादातर गवाह मुकर गए।  

विकास दुबे और उसके साथी कोर्ट से इतनी जल्दी बेल पा गए कि जैसे उनके सामने सरकार की तरफ से कोई गंभीर वकील है ही नहीं। सरकारी अथॉरिटीज़ ने कभी इस बात की जरूरत नहीं समझी कि उसके केस में किसी खास वकील से सलाह ली जाए। सरकार ने उसकी बेल ऐप्लिकेशन के खिलाफ न तो कोर्ट में कोई अर्जी दी और न ही ऊपर के कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रिपोर्ट में कहा गया है कि जब पुलिस बिकरू पहुंची तो पुलिस रेड की जानकारी पहले से ही विकास दुबे को हो गई थी।  

रिपोर्ट में कहा गया है कि कानपुर की इंटेलिजेंस यूनिट यह पता लगाने में पूरी तरह से फेल हो गई कि विकास दुबे के पास खतरनाक हथियार हैं। रेड करने से पहले किसी भी तरह की सावधानी नहीं बरती गई और कोई भी पुलिसवाला बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहने था। रेड डालने वालों में से सिर्फ 18 लोगों के पास हथियार थे, बाकी खाली हाथ थे या उनके पास सिर्फ डंडे थे।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश भी की है कि उन सरकारी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए जिन्होंने विकास दुबे की जांच से जुड़े कागजात गायब कर दिए। आयोग ने कहा कि कानपुर देहात में आठ पुलिसकर्मियों की घात लगाकर की गई हत्या पुलिस की खराब योजना’ का परिणाम थी,क्योंकि उन्होंने स्थिति का सही आकलन नहीं किया था। कानपुर की स्थानीय खुफिया इकाई को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी और वह पूरी तरह से नाकाम रही।

रिपोर्ट में कहा गया है कि विकास दुबे मुठभेड़ मामले में एकत्रित सबूत घटना के बारे में पुलिस के पक्ष का समर्थन करते हैं। पुलिसकर्मियों को लगी चोटें जानबूझकर या स्वयं नहीं लगाई जा सकती। डॉक्टरों के पैनल में शामिल डॉ आरएस मिश्रा ने पोस्टमार्टम किया और स्पष्ट किया कि उस व्यक्ति (दुबे) के शरीर पर पाई गई चोटें पुलिस पक्ष के बयान के अनुसार हो सकती हैं।

हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का थाने से लेकर कचहरी तक इस कदर रसूख था कि वह उसके खिलाफ साक्ष्यों को मिटाने के दस्तावेज तक गायब करा देता था। बिकरू कांड की न्यायिक जांच में ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं। न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुख्यात विकास दुबे के विरुद्ध दर्ज 65 में से 21 मुकदमों की फाइलें गायब हैं।आयोग के कई बार मांगने पर भी इन 21 मुकदमों से जुड़ी फाइलें उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं। आयोग ने इसकी विस्तृत जांच कराने व संबंधित विभाग के दोषी अधिकारियों व कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश भी की है। आयोग ने इसे गंभीर लापरवाही माना है। विकास दुबे के विरुद्ध दर्ज जिन मुकदमों की फाइलें गायब हैं, उनमें अधिकतर में वह कोर्ट से बरी हो गया था।

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार कानपुर पुलिस, जिला प्रशासन व राजस्व के अधिकारियों से विकास दुबे के विरुद्ध दर्ज 65 मुकदमों से जुड़े दस्तावेज मांगे गए थे। इनमें एफआईआर की प्रति, आरोप पत्र, गवाहों की सूची व उनके बयान से जुड़ी फाइलें शामिल थीं। लेकिन, अधिकारी इनमें 21 मुकदमों से जुड़ी फाइलें उपलब्ध नहीं करा सके। इनमें 11 मुकदमे कानपुर के शिवली थाने में दर्ज हुए थे। चार मुकदमे कल्याणपुर थाने में, पांच मुकदमे चौबेपुर थाने में व एक मुकदमा बिल्हौर थाने में दर्ज हुआ था। यह मुकदमे गुंडा एक्ट, मारपीट, बलवा, जान से मारने की धमकी, जानलेवा हमला, पुलिस से मुठभेड़ व अन्य धाराओं से जुड़े हैं।

इस बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने कानपुर के बहुचर्चित बिकरू कांड के मुख्य अभियुक्त विकास दुबे की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत को सही ठहराने वाली जांच आयोग की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर शुक्रवार को सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि बसपा की सरकार बनने पर इस कांड की फिर से विस्तृत जांच की जाएगी। उन्होंने न्यायिक आयोग की जांच रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि जांच समिति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अधीन है और उसकी रिपोर्ट की कोई विश्वसनीयता नहीं है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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