इशरत जहां एनकाउंटर केस में CBI कोर्ट ने क्राइम ब्रांच के 3 अफसरों को बरी किया

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अहमदाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने बुधवार को इशरत जहां, जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई और दो अन्य के साथ जून 2004 में हुए इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया। गुजरात सरकार द्वारा तीन आरोपी पुलिस अधिकारियों, आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल, सेवानिवृत्त  डिप्टी एसपी तरुण बरोत और एक सहायक उप-निरीक्षक अनाजू चौधरी पर मुठभेड़ मामले में मुकदमा चलाने से इनकार करने के बाद यह फैसला आया है। तीनों के खिलाफ कार्रवाई ना किये जाने के फैसले के बाद ट्रायल व्यवहारिक रूप से खत्म हो गया।

इसके पहले राज्य सरकार द्वारा अभियोजन स्वीकृति से इनकार करने के बाद 2019 में सेवानिवृत्त डीआईजी डीजी वंजारा और एसपी एनके अमीन को मामले में बरी किया था। इससे पहले अदालत ने इस मामले में पूर्व प्रभारी डीजीपी पीपी पांडे को बरी कर दिया था। केंद्र ने पूर्व विशेष निदेशक, राजिंदर कुमार सहित चार इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के लिए इस मामले में अभियोजन स्वीकृति की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद अदालत ने मंजूरी के अभाव का हवाला देते हुए उनके खिलाफ दायर पूरक आरोप पत्र को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

कोर्ट ने कहा कि इशरत जहां, लश्कर-ए-तैयबा की आंतकी थी, इस खुफिया रिपोर्ट को नकारा नहीं जा सकता। इसलिए तीनों अधिकारियों को निर्दोष मानते हुए बरी किया जाता है। बुधवार को इसी मामले में दायर अर्जी पर सुनवाई हुई। इस मामले में कोर्ट कहा कि इस बात के सबूत हैं कि इशरत जहां आतंकी थी और क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने अपनी ड्यूटी निभाई। कोर्ट ने कहा कि खुफिया रिपोर्ट को नकारा नहीं जा सकता यही कारण है कि तीनों अधिकारियों को बरी किया जाता है। बरी करते हुए कोर्ट ने कहा कि क्राइम ब्रांच के अधिकारी जी एल सिंघल, तरुण बारोट व अनाजों चौधरी ने आईबी से मिले इनपुट के आधार पर कार्रवाई की। इन अधिकारियों ने वैसा ही किया जैसा करना चाहिए था।

15 जून, 2004 को अहमदाबाद में कोतरपुर वाटरवर्क्स के पास पुलिस एनकाउंटर में इशरत जहां, जावेद शेख, अमजद राम और जीशान जौहर मारे गए थे। खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक ये सभी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से आए थे। इशरत जहां की मां समीमा कौसर और जावेद के पिता गोपीनाथ पिल्लई ने हाईकोर्ट में अर्जी दायर कर मामले की CBI जांच की मांग की थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए SIT बनाई थी। इस मामले में कई पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था।

15 जून 2014 को मुंबई के नजदीक मुम्ब्रा की रहने वाली 19 साल की इशरत जहां गुजरात पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारी गई थी। इस मुठभेड़ में जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई, अमजदअली अकबरअली राणा और जीशान जौहर भी मारे गए थे। पुलिस का दावा था कि मुठभेड़ में मारे गए चारों लोग आतंकवादी थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की योजना बना रहे थे। हालांकि, हाई कोर्ट की गठित विशेष जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मुठभेड़ फर्जी थी, जिसके बाद सीबीआई ने कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया। इशरत जहां मुठभेड़ मामला एक सत्र अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ किया गया था। अभियुक्त पुलिस और शिकायतकर्ता में से एक, जेजी परमार की की मामले की कार्रवाई के दौरान मृत्यु हो गई। सीबीआई द्वारा आरोप पत्र दायर किए जाने तक एक कमांडो मोहन कलासवा का भी निधन हो गया था।

सीबीआई की विशेष अदालत ने 2004 में इशरत जहां कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में न्यायाधीश वीआर रावल ने सिंघल, बरोत और चौधरी के आरोप मुक्त करने के आवेदन को मंजूरी दे दी। सीबीआई ने 20 मार्च को अदालत को सूचित किया था कि राज्य सरकार ने तीनों आरोपियों के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने अक्टूबर 2020 के आदेश में टिप्पणी की थी उन्होंने (आरोपी पुलिस कर्मियों) आधिकारिक कर्तव्य के तहत कार्य किया था, इसलिए एजेंसी को अभियोजन की मंजूरी लेने की जरूरत है।

यह अंतिम तीन पुलिसकर्मी थे जिन पर हत्या, आपराधिक साजिश, अपहरण और 19 साल की लड़की को अवैध हिरासत में रखने का आरोप लगा था। इस मामले में मुम्ब्रा की 19 वर्षीय लड़की इशरत जहां, उसके साथी जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई, जीशान जौहर और अमजद अली राणा को 15 जून 2004 को अहमदाबाद के बाहरी इलाके में एक पुलिस मुठभेड़ में गोली मार दी गई थी। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 20 मार्च को अदालत को सूचित किया था कि राज्य सरकार ने तीनों आरोपियों के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है।

सीबीआई के वकील आरसी कोडेकर ने शनिवार को विशेष सीबीआई जज वीआर रावल को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अभियोजन स्वीकृति ना देने की जानकारी दी। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा एक सीलबंद कवर में सीबीआई को भेजे गए पत्र भी अदालत के समक्ष रखा। यह मामला एक सत्र अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ दायर किया गया था।

पुलिस का दावा था कि मुठभेड़ में मारे गए चारो लोग आतंकवादी थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की योजना बना रहे थे। हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची की मुठभेड़ फर्जी थी, जिसके बाद सीबीआई ने कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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