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इसरो जासूसी कांड: रहस्य ही रहेगा, किसके इशारे पर फंसाया गया वैज्ञानिकों को

उच्चतम न्यायालय ने इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन से जुड़े 1994 के जासूसी मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को मामले में आगे और जांच करने का भी निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सीबीआई समिति के निष्कर्षों को प्रारंभिक जांच का हिस्सा मान सकती है। न्यायालय ने एजेंसी को तीन माह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। यह मामला क्रायोजेनिक इंजन तकनीक से जुड़ा है, जिसका विकास वैज्ञानिक नंबी नारायणन के नेतृत्व में इसरो कर रहा था, जब हनीट्रैप का मामला बनाकर इसे पटरी से उतारने की कोशिश की गई।

इसरो जासूसी कांड पर अब सीबीआई जांच करेगी, लेकिन इस रहस्य का शायद कभी भी पर्दाफाश नहीं होगा कि इस फर्जी जासूसी प्रकरण का उद्देश्य क्या था? इसके पीछे कौन सी अंतरराष्ट्रीय साजिश थी? अब शक की गुंजाइश तो है पर ठोस सबूत के बिना किसी को कैसे कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। इसरो जासूसी कांड के बाद लगातार यह सवाल उठाया जाता रहा है कि यदि इन लोगों ने जासूसी नहीं की थी तो इन्हें फर्जी केस में क्यों फंसाया गया? क्या इसका मकसद इसरो की क्रायोजनिक परियोजना को असफल करना था? क्या यह अजब नहीं लगता की बिना किसी व्यक्तिगत आग्रह, दुराग्रह, दुश्मनी के केरल पुलिस ने इसरो के दो वैज्ञानिकों को इतने गंभीर मामले में फंसा दिया की एक ओर उनका करियर तबाह हो गया और क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक विकसित करने में लगभग 20 साल लग गए। 

दरअसल भारत 1990 के दशक से अपने रॉकेटों के लिए क्रायोजेनिक इंजन हासिल करना चाहता था। 1991 में दो क्रायोजेनिक इंजन और तकनीकी हस्तांतरण के लिए रूस के साथ भारत का करार हो गया, लेकिन अमेरिका ने यह कहते हुए इस पर आपत्ति जता दी कि यह मिसाइल तकनीक प्रसार के कानून का उल्लंघन है। आज रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम को खरीदने पर अमेरिका कई बार भारत पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दे चुका है। अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने भी भारत दौरे के समय कहा था कि हमारे दोस्तों को रूस से हथियारों की खरीद से बचना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी धमकी को नजरंदाज करके जहां भारत एस-400 मिसाइल सिस्टम को खरीदने पर अड़ा हुआ है वहीं रूस भी भारत को यह सिस्टम देने से पीछे नहीं हट रहा है।

इसी समय इसरो ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के विकास का फैसला लिया और इसके लिए एक परियोजना शुरू की गई।  नारायणन इस परियोजना के प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाए गए। नारायणन ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने पहली बार भारत में लिक्विड फ्यूल टेक्नॉलोजी का विकास किया था। इसरो के सफलतम रॉकेट पीएसएलवी (पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हिकल) में इसी तकनीक पर आधारित इंजन इस्तेमाल किया जाता है। उस समय नारायणन सेकंड स्टेज पीएसएलवी और फोर्थ स्टेज पीएसएलवी के भी प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे।

नंबी नारायणन की याचिका के मुताबिक केरल पुलिस के अधिकारियों सिबी मैथ्यू, केके जोशुआ और एस विजयन ने उन्हें जासूसी के फर्जी मामले में फंसाया था और इसकी वजह से उन्हें सालों तक शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। ये सभी अधिकारी रिटायर हो चुके हैं। इस मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने भी इन अधिकारियों को साजिश रचने के लिए जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन यह मामला नारायणन को फंसाने वाले अधिकारियों को दोषी ठहराने के साथ खत्म नहीं होता। यह सवाल तब भी बना रहेगा कि इस पूरी साजिश के पीछे की असली ताकत कौन थी और उसका मकसद क्या था? इसरो जासूसी प्रकरण को बारीकी से देखने-समझने पर कुछ इशारे और संकेत जरूर मिलते हैं, लेकिन इनके आधार पर भी यह गुत्थी पूरी तरह नहीं सुलझती।

इसरो जासूसी मामला 27 साल पुराना है। दरअसल 20 अक्टूबर, 1994 को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में जब मालदीव की नागरिक मरियम रशीदा को पुलिस ने हिरासत में लिया तब उनके ऊपर भारत में वीजा अवधि से ज्यादा रुकने का आरोप था, लेकिन अगले महीने केरल पुलिस ने इसरो के दो वैज्ञानिकों, एस नंबी नारायणन और डी शशि कुमार को गिरफ्तार किया और दावा किया कि इसरो में क्रायोजनिक इंजन विकास परियोजना के प्रमुख नारायणन व उनके सहयोगी शशि कुमार ने मरियम को परियोजना से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेज सौंपे थे। पुलिस का यह भी कहना था कि ये दोनों इसरो में जासूसी करके इंजन विकास से जुड़ी पूरी जानकारी इकट्ठा कर रहे थे ताकि वह विदेशी एजेंटों को सौंपी जा सके। केरल पुलिस ने जासूसी के साथ इसे हनीट्रैप का मामला बना दिया।

पुलिस ने इसे ‘सेक्स-जासूसी स्कैंडल’ की तरह पेश किया था यानी इसमें सबंधित महिलाएं वैज्ञानिकों के लिए ‘हनी ट्रैप’ थीं। उस समय क्रायोजेनिक इंजन का विकास इसरो की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना थी। ये इंजन लिक्विड ऑक्सीजन-हाइड्रोजन के ईंधन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं और इनसे भारी सेटलाइटों को अंतरिक्ष में छोड़ना संभव है। इंजन के लिए बेहद कम तापमान पर लिक्विड ऑक्सीजन-हाइड्रोजन से ऊर्जा प्राप्त करना एक जटिल तकनीक है और सबसे पहले 1970 के दशक में अमेरिका ने इसमें विशेषज्ञता हासिल की थी। इसके बाद जापान, फ्रांस, रूस और चीन ने अपने यहां इस तकनीक का विकास किया।

इस मामले में पुलिस ने कुल छह गिरफ्तारियां की थीं। इनमें मरियम की एक सहेली फौजिया हसन, इसरो को सामान सप्लाई करने वाली कंपनी का एक एजेंट और क्रायोजेनिक इंजन के क्षेत्र में काम करने वाली रूस की एक कंपनी का भारतीय एजेंट शामिल थे। इसरो जासूसी मामले के तार चूंकि विदेशी महिलाओं से जुड़े थे, इसलिए कुछ ही दिनों बाद सीबीआई को इसकी जांच सौंप दी गई। सीबीआई जांच की शुरुआत में ही यह स्पष्ट हो गया कि इन लोगों को फर्जी मामले में फंसाया गया है। नारायणन को 50 दिन बाद जमानत मिल गई। बाकी आरोपित भी एक साल पूरा होते-होते जेल से बाहर आ गए। मई, 1996 में सीबीआई ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। इसमें आईबी की जांच और उसके अधिकारियों की मंशा पर कई सवाल खड़े करते हुए सभी आरोपियों को निर्दोष बताया गया था। नारायणन और शशि कुमार के सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद इसरो में दोबारा नियुक्ति तो मिल गई थी लेकिन उन्हें रिटायर्ड होने तक क्रायोजनिक इंजन परियोजना के साथ-साथ दूसरे संवेदनशील कार्यक्रमों से भी दूर रखा गया।

इस कांड के पीछे अमेरिका की गुप्तचर संस्था सीआईए का हाथ होने की चर्चा थी। अमेरिका पहले ही इसके विरोध में था कि भारत क्रायोजेनिक इंजन का विकास करे। दरअसल ऐसा होते ही वह भारी सेटेलाइटों के प्रेक्षेपण के कारोबार में अमेरिका और फ्रांस का प्रतिद्वंदी बन जाता। नारायणन ने एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में सीआईए को इस पूरे कांड के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि यदि हमने क्रायोजनिक इंजन 2001 में लॉन्च कर दिया होता तो हम काफी समय पहले जियोसिक्रोनस लॉन्च व्हिकल के कारोबार में आ चुके होते। हमारी लागत अमेरिका की तुलना में आधी है। इसका हमें काफी फायदा मिलता और अब तक देश अरबों डॉलर का कारोबार कर चुका होता। इसरो वर्ष 2014 में जाकर अपने पहले क्रायोजनिक इंजन का परीक्षण कर पाया। नारायणन कई बार सरकार से मांग कर चुके हैं कि वह इसरो जासूसी कांड में विदेशी एजेंसियों की भूमिका की जांच करे लेकिन अभी तक सरकार इससे इनकार करती रही है।

इसरो जासूसी मामले में सीआईए का हाथ होने की धारणा को इस बात से भी बल मिलता है कि जब यह मामला उजागर हुआ उस समय रतन सहगल आईबी की काउंटर इंटेलीजेंस यूनिट के प्रमुख थे। वे भी इसरो जासूसी मामले की जांच में काफी सक्रिय थे, लेकिन सहगल को कुछ ही महीनों बाद संदिग्ध परिस्थितियों में आईबी से त्यागपत्र देना पड़ा। उन पर आरोप था कि उनके सीआईए से संबंध हैं। इसरो जासूसी मामले पर बीबीसी के पत्रकार ब्रायन हार्वी की ‘रशिया इन स्पेस, ए फेल्ड फ्रंटियर’ नाम से प्रकाशित किताब में कई दस्तावेजों के आधार पर दावा किया गया है कि सीआईए ने इसरो के क्रायोजनिक इंजन विकास कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाया था।

नारायणन कई बार सरकार से मांग कर चुके हैं वह इसरो जासूसी कांड में विदेशी एजेंसियों की भूमिका की जांच करे, लेकिन अभी तक सरकार इससे इनकार करती रही है। हालांकि इस मामले में सीबीआई ने भी 2015 में केरल हाईकोर्ट में कहा था कि सीआईए इस मामले के पीछे नहीं थी।

उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार 15 अप्रैल को सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इसरो जासूसी मामले के संबंध में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की गलत गिरफ्तारी की जांच करे। जस्टिस एएम खानविल्कर की अध्यक्षता वाली पीठ ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस डीके जैन द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लिया, जिन्हें नारायणन के खिलाफ केरल पुलिस के अधिकारियों द्वारा गलत कामों को देखने का काम सौंपा गया था। पीठ ने कहा कि रिपोर्ट की प्रति सार्वजनिक रूप से प्रकाशित या प्रसारित नहीं की जाएगी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on April 16, 2021 10:48 am

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