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विदेशी खुदरा और ई-कॉमर्स के खिलाफ गठित संयुक्त कार्रवाई समिति ने भी किया किसानों के आंदोलन का समर्थन

(देशी बाजार पर विदेशी कंपनियों के कब्जे के खिलाफ देश में कई संगठन काम कर रहे हैं। इन्हीं सारे संगठनों ने मिलकर अपना एक साझा मंच तैयार किया है जिसका उन्होंने जेएसीएएफआरई नाम दिया है। यह संगठन देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे के खिलाफ धारावाहिक संघर्ष संचालित करने का काम करता है। पिछले दिनों जब रिटेल बाजार पर इस तरह का संकट आया था तो इस संगठन ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। आज जब देश के किसान कारपोरेट के हमले से दो चार हुए हैं तो इस संगठन ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उनके साथ खड़े होने का फैसला किया है। इसी कड़ी में संगठन ने किसानों के आंदोलन के समर्थन में अपना एक वक्तव्य जारी किया है। पेश है उसका पूरा बयान-संपादक।)

विदेशी खुदरा व्यापार और ई-कॉमर्स कॉरपोरेट्स के खिलाफ गठित की गई संयुक्त कार्रवाई समिति (जे.ए.सी.ए.एफ.आर.ई) का गठन भारत के ई-कॉमर्स बाजार में वॉलमार्ट और अमेज़न जैसे विदेशी कॉरपोरेट्स के प्रवेश का विरोध करने के लिए किया गया था। आज भी कुछ वैसी ही परिस्थिति बनती हुई दिख रही है जब भारत के रिलायंस जैसे बड़े औद्योगिक घराने, फेसबुक और गूगल जैसे वैश्विक तकनीकी कॉरपोरेट्स के साथ साझेदारी कर, छोटे व्यापारियों का शोषण, और बाजार से उन्हें निकाल बाहर, करने के लिए आगे बढ़ते हुए दिख रहे हैं। हम उनके इन

प्रयासों के विरोध में ठीक उसी तरह खड़े हैं जैसा कि हमने पहले किया था।


लाए गए नए कृषि कानून कृषि क्षेत्र एवं वैल्यू चेन के अनियंत्रित कॉर्पोरेटीकरण को बढ़ावा, और तमाम तरह की सुविधा, देने पर केन्द्रित हैं। इनके जरिए कृषि पर निर्भर आजीविका व्यापक तौर पर प्रभावित होगी। इस पूरी प्रक्रिया में, किसानों के साथ-साथ कृषि क्षेत्र से जुड़े छोटे व्यापारियों के हितों पर कुठाराघात होगा, और इन दोनों वर्गों का भविष्य कुछ चंद कृषि और ई कॉमर्स कॉरपोरेट्स पर पूरी तरह से निर्भर हो जाएगा। ऐसा सिर्फ उन व्यापारियों तक ही सीमित नहीं रहेगा जो प्रत्यक्ष तौर पर कृषि उपज मंडी समिति (.पी.एम.सी) की मंडियों में भाग लेते हैं। उदाहरण के लिए, भंडारण की सीमा पर प्रतिबंध हटाने का सीधा फायदा कुछ बड़े कॉरपोरेट्स को मिलेगा। इसके द्वारा छोटे और मध्यम व्यापारियों के हितों की कीमत पर इनकॉरपोरेट्स का कृषि उत्पादों की व्यापक खरीद और पूर्ण व्यापार श्रृंखला पर पूरी तरह से हावी होने की आशंका दिखाई देती है। इस कानून का यही उद्देश्य भी लगता है।


सरकार की मंशा एक ऐसे नए आर्थिक मॉडल को आगे बढ़ाने की लगती है, जहां कुछ गिने चुने कॉरपोरेट्स अपने डिजिटल या ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म के जरिए हर तरह के बाजार को, और इससे जुड़े सभी छोटी छोटी आर्थिक गतिविधियों में संलग्न वर्गों को, बारीकी से नियंत्रित करते हैं – चाहे वह प्राथमिक उत्पादक हों, जैसे किसान, या व्यापारी, एस.एम.एस.ई (यानी छोटे और मंझोले प्रतिष्ठान) और छोटे सेवा प्रदाता (उबेर के टैक्सी-चालकों की तरह)।

इस तरह के नए प्रावधानों से छोटे स्तर पर आर्थिक गतिविधियों से जुड़े बहुसंख्य लोगों की आर्थिक भूमिका भले ही पूरी तरह से समाप्त न हो, लेकिन इनको पूर्ण तौर पर नियंत्रित करने और हाशिए पर पहुंचाने, व बाजार में टिके रहने के लिए संघर्ष करने की स्थिति तक ले जाने, की कवायद दिखाई देती है। बहुत सारे व्यापारियों और दुकानदारों को अपनी व्यापारिक गतिविधियों को इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि वे विशाल ई-कॉमर्स कंपनियों के एकतरफा प्रतिस्पर्धात्मक चुनौतियों का सामना नहीं कर सके। और कईयों को आमदनी में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा है।

डेटा पर नियंत्रण के जरिए इन बड़े डिजिटल कॉरपोरेट्स ने अपने साथ जुड़े सभी छोटे आर्थिक सेवा प्रदाताओं को धीरे-धीरे कमजोर करते हुए उन पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाया है। यह उनके भौतिक एवं सूचनासंबंधित आदानों, सभी अनुषंगी सेवाओं मसलन भंडारण, रसद और भुगतान, और क्रेडिट की महत्वपूर्ण आपूर्ति, को नियंत्रित करते हैं। डिजिटल और डेटा आधारित ‘360 डिग्री दृश्यता’ से सक्षम नए व्यापारिक मॉडल, जो सभी छोटी और आश्रित आर्थिक गतिविधियों से जुड़े वर्गों, जैसे कि व्यापारी, किसान, एम.एस.एम.ई और छोटे सेवा प्रदाता, को पूर्ण तौर पर नियंत्रित करते हैं, इनकी तत्काल जांच होनी चाहिए। किसानों के आंदोलन को इस बड़े परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। अगर कृषि कानूनों का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट होगा कि अनियंत्रित डिजिटलाइजेशन इनका प्रमुख हिस्सा है।


केंद्र में पहले की सरकारों, और कई राज्य सरकारों, द्वारा अपनायी सोच और प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए, दुर्भाग्यवश वर्तमान सरकार ने ई-कॉमर्स और कृषि बाजारों के बारे में नए प्रावधानों और कानूनों को औपचारिक रूप से लागू करने का काम किया है।


सरकार को अविलंब सभी हितधारकों – मसलन व्यापारियों, किसानों, एम.एस.एम.ई, और अन्य लोगों –- से परामर्श करना चाहिए ताकि एक समग्र नए आर्थिक मॉडल की ओर बढ़ा जा सके जहां सभी आर्थिक हितधारक, चाहे वो छोटे हों या बड़े, उनको उचित भागीदारी और उचित हिस्सेदारी देते हुए उनकी मूल्यवान भूमिका सुनिश्चित की जा सके। छोटे आर्थिक उपार्जन करने वाले वर्गों, जैसे किसान और व्यापारी, को कुछ चंद कॉरपोरेट्स के असहाय एजेंट के रूप में अपनी भूमिका निभाने तक सीमित रहने को विवश नहीं किया जाना चाहिए – जो कि डेटा और डिजिटल संसाधनों के जरिए इन पर अपना पुख्ता नियंत्रण स्थापित करते हैं। हमें इस दिशा में एक व्यापक और पूरी तरह से नई सोच की आवश्यकता है।

किसानों और व्यापारियों को इन बड़े कॉरपोरेट्स के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए, और इन्हें अपनी आर्थिक गतिविधियों के संचालन में मदद देने के लिए, सरकारों को तत्काल हस्तक्षेप करते हुए कुछ मजबूत कदम उठाने चाहिए।

  1. उन्हें इनको संरक्षण देने के लिए सहायक संस्थान खड़े करने की जरूरत है, मसलन ए.पी.एम.सी मंडियां और सरकार समर्थित ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, जैसे ई-नाम, और ‘डिजिटल व्यापार के लिए खुला नेटवर्क’।
  2. इसके साथ ही सुरक्षात्मक प्रावधानों की भी जरूरत है, उदाहरण:, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर खुद ही ट्रेडिंग पर प्रतिबंध लगाना, और कृषि उपज के भंडारण की सीमा को निर्धारित करना।
  3. मूल्य निर्धारण और लाभ के बंटवारे में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी आवश्यक है, जैसे कि परभक्षी मूल्य और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर जबरन छूट रोक लगाना, कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी) प्रदान करना, और परिवहन कंपनियों (उबेर, ओला आदि) का मनमानी वाला हिस्सा लेने को नियंत्रित करना।

    सरकार के स्तर पर किये जा रहे इस तरह के सभी हस्तक्षेप हमारी आर्थिक व्यवस्था को सभी हितग्राहियों के अनुकूल बनाये रखने, व डिजिटल स्तर पर बहुत प्रभावी व सक्षम बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा इनके हितों पर कुठाराघात किये जाने से बचाने, के लिए बहुत आवश्यक है। हालांकि सरकार द्वारा पहले से ही इनमें से कई कदम उठाए गये हैं, लेकिन इन प्रयासों को सतत रूप से जारी रखते हुए सुसंगत बनाया जाना चाहिए और एक समग्र आर्थिक मॉडल के तहत लाया जाना चाहिए।


हम सरकार से अपील करते हैं कि वह किसानों द्वारा उठाए गए मुद्दों का तत्काल समाधान करे। कम से कम नए कृषि कानूनों के कार्यान्वयन को उस वक्त तक के लिए रोक दे जब तक इन पर पूरी तरह से विचार नहीं कर लिया जाता, और किसानों द्वारा उठाए गये सवालों का पूरा समाधान नहीं ढूंढा जाता। विशेष रूप से व्यापारियों के दृष्टिकोण से कृषि उपज मूल्य श्रृंखला में सभी छोटे और मध्यम व्यापारियों की भूमिका को संरक्षित किया जाना चाहिए, और अनियंत्रित कॉरपोरेटीकरण की प्रक्रिया को विराम देते हुए इसे मजबूत किया जाना चाहिए। सरकार को न सिर्फ ए.पी.एम.सी को मजबूत करना चाहिए बल्कि ए.पी.एम.सी मंडियों में किए गए व्यापार पर आरोपित कर को हटा देना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि समय बीतने के साथ ए.पी.एम.सी मंडियों के काम करने के तरीके में काफी विकृति आई है, लेकिन समय की जरूरत है कि उनके काम को बेहतर करें, बजाय उन्हें अस्थिर करने के।

वास्तव में सरकार को इस अवसर का उपयोग पूरे आर्थिक मॉडल पर पुर्नविचार के लिए करना चाहिए जहां गिने चुने डिजिटली मजबूत बड़े कॉरपोरेट्स सभी आर्थिक गतिविधियों व प्रक्षेत्रों पर पूर्ण नियंत्रण करते हैं। लेकिन सरकार सक्रिय आर्थिक विनियमन, संरक्षण और संवर्धन की अपनी भूमिका से पीछे हटती दिख रही है। सभी हितधारकों को वैकल्पिक आर्थिक मॉडल पर सामूहिक विचार करने की जरूरत है जहां आर्थिक मूल्य श्रृंखला में संलग्न सभी हितधारकों की अपने विशिष्ट क्षेत्र में पर्याप्त भागीदारी और योगदान हो, तथा उसका उचित मूल्य लगे। सरकार द्वारा आर्थिक लेन-देन की व्यवस्था ऐसी बनाई जानी चाहिए जहां सभी के हितों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके, और जो सबको स्वीकार्य हो।

हम अपनी तरफ से किसी भी ऐसे सकारात्मक प्रयास में योगदान देने की पेशकश करते हैं, जिसे जितना जल्द संभव हो शुरू किये जाने की जरूरत है। इस तरह की कवायद सही मायने में वैसा भारत बनाने में योगदान देगी जो आत्मनिर्भर हो और महान हो।

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This post was last modified on January 12, 2021 11:22 am

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