Wednesday, October 27, 2021

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कर्नाटक हाईकोर्ट ने ख़ारिज किया ट्विटर के एमडी को यूपी पुलिस का नोटिस

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कर्नाटक हाईकोर्ट  ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा ट्विटर इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 41ए के तहत जारी नो‌टिस को रद्द कर दिया। कोर्ट ने उक्त नोटिस को “उत्पीड़न का उपकरण” करार दिया। हाईकोर्ट ने पुलिस की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि यूपी पुलिस की नोटिस दुर्भावनापूर्ण’ और ‘उत्पीड़न करने वाली’ और ‘दबाव डालने वाली है। हाईकोर्ट ने सिर्फ यूपी पुलिस के इस नोटिस को खारिज ही नहीं किया, बल्कि इसे दुर्भावनापूर्ण भी बताया। 

ग़ाज़ियाबाद में एक मुस्लिम व्यक्ति के हमले के बारे में ट्वीट को लेकर मनीष माहेश्वरी को नोटिस दिया गया था जिसमें यूपी में पुलिस के सामने उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा गया था। इसको लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा है कि उन्हें यूपी जाने की ज़रूरत नहीं है और यूपी पुलिस को वीडियो कॉन्फ़्रेंस से पूछताछ करनी चाहिए। मनीष माहेश्वरी को पहले तो नोटिस दिया गया था लेकिन बाद में उन पर दंगा करने के इरादे से, दुश्मनी को बढ़ावा देने और आपराधिक साज़िश रचने की एफ़आईआर दर्ज की गई।

जस्टिस जी नरेंदर की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा, “संविधान के प्रावधानों को उत्पीड़न के औजार बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। प्रतिवादी ने रत्ती भर भी ऐसी सामग्री पेश नहीं कि जिससे प्रथम दृष्ट्या याचिकाकर्ता की भागीदारी दिखाई दे। इस बिंदु पर ही याचिकाकर्ता ने मामला बनाया है। धारा 41ए तहत जारी किया गया नोटिस दुर्भावनापूर्ण है और याचिका सुनवाई योग्य है। अनुलग्नक ए 1 नोटिस को रद्द किया जाता है। एकल पीठ ने कहा कि धारा 41ए का नोटिस- जिसमें गिरफ्तारी की धमकी होती है जिसे धारा 160 सीआरपीसी के तहत एक नोटिस के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, जिसे गवाह से बयान मांगने के लिए जारी किया जाता है।

एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश पुलिस के नोटिस को रद्द करते हुए पुलिस से कहा कि यदि आवश्यक हो तो उनसे वर्चुअल माध्यम से पूछताछ करें। हाईकोर्ट ने कहा कि माहेश्वरी द्वारा प्रारंभिक नोटिस का जवाब नहीं देने के बाद धारा 41ए का सहारा लिया गया था। क़ानूनी प्रावधानों को उत्पीड़न का साधन बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। अदालत ने साफ़ तौर पर कहा कि ग़ाज़ियाबाद पुलिस ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा पाई है जो इस घटना में ट्विटर इंडिया के अधिकारी की संलिप्तता को दिखाए, जबकि पिछले कई दिनों से सुनवाई चल रही है।

इसी महीने पहले की सुनवाई में माहेश्वरी ने कर्नाटक हाईकोर्ट से यहाँ तक कहा था कि यदि पुलिस यह लिखकर दे कि वे गिरफ़्तार नहीं करेंगे तो वह पूछताछ के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस के समक्ष पेश होने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी साफ़ तौर पर कहा कि वह वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से यूपी पुलिस की पूछताछ के लिए उपलब्ध थे लेकिन पुलिस ने इसे खारिज कर दिया और उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा।

जून महीने में सुनवाई के दौरान कर्नाटक हाईकोर्ट ने मनीष माहेश्वरी को गिरफ़्तारी से अंतरिम राहत दी थी। तब उन्होंने अदालत में सुनवाई के दौरान कहा था कि वह ट्विटर के सिर्फ़ एक कर्मचारी हैं और उनका उस ‘अपराध’ से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा था कि कुछ आरोपियों ने वीडियो अपलोड किया लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है। उन्होंने कोर्ट से कहा था कि दो दिन में दो नोटिसों में गवाह से बदलकर उनको आरोपी बना दिया गया जिसमें आरोपी की गिरफ़्तारी भी हो सकती है।

दरअसल ग़ाज़ियाबाद के लोनी में अब्दुल समद सैफ़ी नाम के बुजुर्ग शख़्स के साथ हुई मारपीट के मामले में ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने मनीष माहेश्वरी को भी नोटिस भेजा था। नोटिस भेजने का कारण सांप्रदायिक अशांति को भड़काना बताया गया। माहेश्वरी से कहा गया था कि वे सात दिन के अंदर लोनी बॉर्डर के थाने में आएँ और अपना बयान दर्ज कराएँ। उससे कुछ दिन पहले ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने ट्विटर के ख़िलाफ़ भी एफ़आईआर दर्ज की थी।

इस मामले में पहले ट्विटर इंडिया के अलावा, कई पत्रकार और कांग्रेस नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई थी। पत्रकार राणा अय्यूब, सबा नक़वी, कांग्रेस नेता सलमान निज़ामी, शमा मुहम्मद, मसकूर उसमानी के ख़िलाफ़ कथित तौर पर ग़लत ट्वीट और वीडियो को ट्वीट करने और सांप्रदायिक भावना को भड़काने का आरोप लगाया गया था। घटना में पिटाई के शिकार हुए बुजुर्ग अब्दुल समद सैफ़ी का कहना था कि उनसे कथित तौर पर ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए गए और दाढ़ी काट दी गई थी।

एकल पीठ का निष्कर्ष है  कि धारा 41 ए के तहत जारी किया गया नोटिस “दुर्भावानापूर्ण”, “हा‌थ मरोड़ने का तरीका” और “उत्पीड़न का उपकरण” है। अदालत ने यूपी पुलिस की ओर से क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार की कमी और याचिका सुनवाई योग्य ना होने की आप‌त्तियों को भी खा‌रिज कर दिया। गाजियाबाद वीडियो मुद्दे पर जांच के संबंध में यूपी पुलिस ने माहेश्वरी से लोनी बॉर्डर थाने में पेश होने को कहा था। उन्हें सीआरपीसी की धारा 160 के तहत 17 जून को जारी नोटिस के बाद धारा 41 ए के तहत नोटिस जारी की गई ‌थी और मामले में गवाह के रूप में बयान दर्ज करने के लिए कहा गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट)

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