लोकपाल के सफेद हाथी बनने से नाराज उसके एक सदस्य जस्टिस भोसले ने दिया इस्तीफा

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नई दिल्ली। लोकपाल के नौ सदस्यों में से एक ने इस्तीफा दे दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और मौजूदा लोकपाल जस्टिस दिलीप बी भोसले ने इस्तीफा देने से पहले लोकपाल चेयरपर्सन जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष को तीन पत्र लिखे थे। जिसमें उन्होंने कई चीजों को लेकर शिकायत की थी। इसमें प्रमुख रूप से सरकारी काम करने के लिए दफ्तर समेत तमाम तरह की सुविधाएं शामिल थीं। इसके अलावा इस निकाय के अपनी भूमिका में न खड़े होने पर भी उन्होंने सवाल उठाया था।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जस्टिस भोसले ने इन पत्रों को पिछले साल नवंबर-दिसंबर में भेजा था। और इस्तीफा उन्होंने 6 जनवरी को दिया।

वह लोकपाल के चार न्यायिक सदस्यों में से एक थे। दूसरे तीन सदस्य हैं ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस प्रदीप कुमार मोहंती, मणिपुर हाईकोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस अभिलाषा कुमारी और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एके त्रिपाठी।

जस्टिस भोसले अपने इस्तीफे पर कुछ भी कहने से मना कर दिया। आप को बता दें कि चेयरपर्सन समेत अन्य सदस्यों को पिछले साल मार्च महीने में नियुक्त किया गया था। लेकिन उनसे संबंधित नियम अभी भी पेंडिंग हैं।

सूत्रों के मुताबिक जस्टिस घोष को 14 नवंबर को लिखे गए अपने पहले पत्र में भोसले ने कहा था कि क्योंकि वहां कोई काम नहीं है इसलिए इस समय को बुनियादी प्रक्रियाओं को तय करने में इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें शिकायतों के डिजिटाइजेशन, उनको हासिल करने फिर उनका निपटारा करने और उसके बाद उन पर पारित किए जाने वाले आदेश शामिल हैं।

इस पर भोसले द्वारा बार-बार सुझाव दिया गया। इसके साथ ही उनका कहना था कि प्रक्रियाओं में जैसे-जैसे कठिनाइयां सामने आएंगी और जब असल में शिकायतों को हल करने की कोशिश की जाएगी तब उनमें क्या रहना चाहिए क्या नहीं। उसको दुरुस्त कर लिया जाएगा।

लोकपाल एक्ट का सेक्शन-59 कहता है कि लोकपाल के लिए नियम केंद्र बनाएगा। नोडल डिपार्टमेंट और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने ड्राफ्ट रूल तैयार भी किया था और उसे कानून मंत्रालय को भेज भी दिया गया था लेकिन वे अभी भी पेंडिंग हैं। वास्तव में इस मुद्दे पर भी भोसले ने लाल झंडी दिखा दी थी और इसका जिक्र भी उन्होंने अपने पत्र में किया था। नवंबर के पत्र में उन्होंने कहा था कि “हमें लिए गए निर्णयों (मुख्य/नीतिगत) को प्रस्तावों के फार्म में रिकार्ड में दर्ज करा देना चाहिए। इसमें वो नियम भी शामिल हैं जो पिछले कुछ महीनों से विचार के लिए पेंडिंग हैं साथ ही प्रस्तावों पर संस्तुति देने के लिए उसकी प्रक्रिया को तेज करने के लिए सरकार के साथ किया गया आधिकारिक संचार भी शामिल है।”

पत्र में कहा गया है कि “ हमें प्रस्ताव के जरिये सरकार से इस बात का निवेदन करना चाहिए कि सक्षम अफसरों को लेकर जांच और वकालत की विंग को तैयार करने के काम को सबसे प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाना चाहिए। क्योंकि बगैर इसके हम लोग कारगर तरीके से काम नहीं कर सकेंगे। यहां तक कि अगर नियम की अधिसूचना भी जारी हो गयी हो तो भी।”

लोकपाल वेबसाइट से हासिल सबसे हाल के डाटा के मुताबिक पिछले साल की 30 सितंबर तक 1065 शिकायतें हासिल हुई थीं। जिनमें 1000 की सुनवाई हुई थी और उन्हें हल कर दिया गया था। एक वरिष्ठ अफसर ने एक्सप्रेस को बताया कि “इनमें से ज्यादातर शिकायतें छोटी थीं और लोकपाल एक्ट के तहत उसके दायरे में नहीं आती थीं। जिन शिकायतों को फाइलों में रखा गया है। एक बार रूल संबंधी अधिसूचना जारी होने के बाद हम उन पर विचार करेंगे।”

मौजूदा समय में लोकपाल दिल्ली के अशोका होटल में किराए पर लिए गए कमरों से संचालित होता है। इसका स्थाई दफ्तर वसंत कुंज में निश्चित किया गया है जहां यह कुछ दिनों में स्थानांतरित हो जाएगा।

जस्टिस भोसले ने अपने पत्र में कहा था कि उन्होंने अपने पत्र में जल्द उस पर कार्यवाही की अपील की थी और उन्होंने पत्र इसलिए लिखा था जिससे उसे रिकार्ड में दर्ज किया जा सके। उन्होंने कहा कि वो इस बात को लेकर बेहद प्रसन्न होंगे अगर उनके पत्र पर बातचीत करने के लिए कोई आधिकारिक बैठक होती है।

उसके बाद लोकपाल भोसले ने चेयरपर्सन को 21 नवंबर को दूसरा पत्र लिखा जिसमें उन्होंने प्रशासनिक, इंफ्रास्ट्रक्चर, खर्च, विजिलेंस आदि के लिए कमेटी गठित करने की मांग की थी। इनमें एक या दो सदस्यों को शामिल होना था। ऐसा उन्होंने लोकपाल के संचालन में पारदर्शिता लाने के मकसद से किया था। उन्होंने पत्र में लिखा था कि “यह इन सभी कमेटियों से जु़ड़े निर्णयों को लेने में हम लोगों की मदद करेगा। आगे यह हम लोगों के काम में भी पारदर्शिता लाने में मददगार साबित होगा। साथ ही हर सदस्य इसमें अपनी भागीदारी महसूस करेगा। प्रशासनिक क्षेत्र में क्या कुछ हो रहा है उसकी भी  जानकारी रहेगी।”

इसके साथ ही उन्होंने इस पत्र को बैठक में बातचीत के लिए आधिकारिक तौर पर रखने की गुजारिश की थी।

जस्टिस भोसले ने तीसरा पत्र 11 दिसंबर को लिखा। अपने इस्तीफे से एक महीने पहले। इसमें 26 नवंबर को हुई बैठक के मिनट्स को आधे-अधूरे तरीके से पेश किए जाने पर नाराजगी जाहिर की गयी थी। इस पत्र में उन्होंने जस्टिस घोष को लिखा कि “सर्व सहमति से लाइब्रेरी कमेटी गठित करने का फैसला हुआ था। और इसको आप के ऊपर छोड़ दिया गया था। इस तरह की कमेटी गठित करने के लिए।”

हालांकि मिनट्स में कहा गया है कि लाइब्रेरी के लिए किताबें खरीदने की जहां तक बात है यह आम सहमति से तय हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मामलों से जुड़े खरीद के आदेश ऑन लाइन दे दिए जाएं…..। सदस्य और लोकपाल के अफसर किताबों और दूसरे जर्नलों की सूची दे सकते हैं। जिनको वह चाहते हैं कि लाइब्रेरी के लिए खरीदा जाना जरूरी है। भोसले ने जस्टिस घोष से निवेदन किया कि या तो मिनट्स को दुरुस्त कर दिया जाए या फिर बातचीत के लिए अगले फुल हाउस मीटिंग में पेश किया जाए।

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