बात-बात पर इंटरनेट बंद करने वाले पीएम मोदी ने जी-7 के अभिव्यक्ति की आजादी के साझे बयान पर किया हस्ताक्षर

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भारत अपने इंटरनेट प्रतिबंधों और कठोर आईटी नियमों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के निशाने पर है। विशेषकर जम्मू कश्मीर से राज्य का दर्जा छीनने के बाद वहां साल भर से ज्यादा इंटरनेट बंद करने और नए आईटी नियमों द्वारा सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर कठोर नियंत्रण के कारण भारत की आलोचना वैश्विक स्तर पर राइट एक्टविस्टों ने की है। टेक जायंट ट्विटर ने अपने दिल्ली स्थित ऑफिस पर दिल्ली पुलिस के छापे के बाद उसे “अभिव्यक्ति की आजादी पर संभावित खतरा बताया था। इस पृष्ठभूमि के बीच भारत ने जी-7 समिट में गेस्ट देश के रूप में शामिल होते हुए रविवार को ‘खुले समाज’ (ओपेन सोसायटीज) की अवधारणा पर जी-7 और अतिथि देशों के एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए, जो ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों के मूल्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मजबूती के साथ पुष्टि और प्रोत्साहित करता है, एक स्वतंत्रता के रूप में जो लोकतंत्र की रक्षा करती है और लोगों को भय और दमन से मुक्त रहने में मदद करती है।

संयुक्त बयान में कहा गया है कि हम एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं जहां हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र को सत्तावाद, चुनावी हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार ,आर्थिक नियंत्रण ,सूचना के हेरफेर, दुष्प्रचार, ऑनलाइन नुकसान, राजनीति से प्रेरित इंटरनेट शटडाउन, मानवाधिकार का उल्लंघन और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। सभी के लिए मानवाधिकार, ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों, जैसा कि मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा और अन्य मानवाधिकार संस्थाओं द्वारा सुनिश्चित किया गया है। साथ ही किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध ताकि हर कोई समाज में पूरी तरह और समान रूप से भाग ले सके।

संयुक्त बयान में यह भी शामिल है कि प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव में हिस्सा लेने, शांतिपूर्ण इकट्ठा होने, संगठन बनाने और जवाबदेही तथा पारदर्शी शासन व्यवस्था का अधिकार है। सिविल स्पेस और मीडिया स्वतंत्रता की रक्षा करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना, सभा और संघ बनाने की स्वतंत्रता देना, धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता और नस्लवाद सहित सभी प्रकार के भेदभाव को दूर करके वैश्विक स्तर पर खुले समाजों को मजबूत करना।

इस संयुक्त बयान में जी 7 सहित चार गेस्ट देशों के इस डेमोक्रेसी 11 समूह ने अपने आप को ओपन सोसाइटी घोषित करते हुए इस बात पर जोर दिया कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों लोकतंत्र की रक्षा करती है और लोगों को डर और उत्पीड़न से मुक्त रहने में मदद करती है।इस समूह ने ‘ओपन सोसायटी स्टेटमेंट’ पर हस्ताक्षर ‘बिल्डिंग बैक टूगेदर-ओपन सोसायटी एंड इकोनॉमिक्स’ नामक आउटरीच सेशन के अंत में किया, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री मोदी को मुख्य प्रवक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया था।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ते हुए कहा कि “लोकतंत्र और आजादी भारतीय सभ्यता के आचरण का हिस्सा रहा है।हालांकि साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि “ओपन सोसायटी गलत जानकारियों और साइबर अटैक को लेकर विशेष रूप से खतरे में रहते हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय(पीएमओ) के अनुसार पीएम मोदी ने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया कि साइबर स्पेस लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक अवसर बना रहना चाहिए, उसे नष्ट करने का नहीं। जी 7 समिट के आउटरीच सेशन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री मोदी इसके अलावा “बिल्डिंग बैक ग्रीनर: क्लाइमेट एंड नेचर” नामक सेशन में शामिल हुए। इसमें उन्होंने संबंधित वैश्विक गवर्नेंस संस्थाओं के अलोकतांत्रिक तथा असमान प्रकृति को रेखांकित किया।

अभिव्यक्ति की आजादी के इस संयुक्त बयान पर जी 7 देशों (अमेरिका, यूके, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान) के अलावा चार गेस्ट देश- भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका ने हस्ताक्षर किया है। इस बार के जी 7 समिट का आयोजन कर रहे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉनसन बोरिस ने इस समूह को ‘डेमोक्रेसी 11’ का नाम दिया।

मई की शुरुआत में जी7 देशों के विदेश मंत्री लंदन में साथ आये थे और जी 7 समिट के एजेंडे पर बातचीत की थी। विदेश मंत्रियों के द्वारा 7 मई को जारी साझा बयान में ‘ओपन सोसायटी’ शीर्षक का अलग सेक्शन था जिसमें इंटरनेट शटडाउन की कड़ी आलोचना की गई थी और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण इकट्ठा होने के अधिकार के खिलाफ बताया गया था।

हालांकि भारत ने जी7 देशों के विदेश मंत्रियों के उस साझा बयान पर हस्ताक्षर नहीं किया था लेकिन भारत की तरफ से उसमें निमंत्रण पर शामिल हो रहे विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने ‘ओपन सोसायटी’ पर दिए अपने वक्तव्य में यह इशारा जरूर किया था कि भारत की राय जी 7 देशों के उस ड्राफ्ट स्टेटमेंट से अलग है। उन्होंने अपने वक्तव्य में फेक न्यूज़ और डिजिटल मैनिपुलेशन के खतरे पर जोर दिया।

जी7 समिट में रविवार को जारी संयुक्त बयान पर भी अंत समय तक बदलाव को लेकर सदस्य देशों और गेस्ट देशों के बीच बातचीत चलती रही। भारत की आपत्ति इंटरनेट शटडाउन को लेकर ड्राफ्ट स्टेटमेंट के कड़े रुख के लिए था क्योंकि भारत अमेरिका के उलट लॉ एंड ऑर्डर तथा सांप्रदायिक हिंसा के मामले में इंटरनेट प्रतिबंध को जरूरी मानता है।

एक ओर भारत ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किया दूसरी ओर किसी भी चुनी गई सरकार द्वारा सबसे लंबे समय के लिए (552 दिनों तक) जम्मू कश्मीर में 4जी इंटरनेट सेवाओं पर पांबदी लगाई गई थी। अगस्त 2019 में राज्य का विशेष दर्जा खत्म करने के बाद से पहली बार पूरे जम्मू कश्मीर में फरवरी 2021 में 4जी इंटरनेट सेवा बहाल की गई थी। नए आईटी नियमों को लेकर भारत सरकार और ट्विटर जैसी बड़ी टेक कंपनी आमने-सामने हैं। ट्विटर ने पिछले महीने भारत स्थित अपने कार्यालयों पर पुलिस की छापेमारी को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए संभावित खतरा माना है।

इस साल फरवरी से ही ट्विटर और केंद्र सरकार के बीच उस समय से खींचतान जारी है, जब केंद्रीय प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन पर देश में किसानों के विरोध से संबंधित आलोचना को चुप कराने का आरोप लगाने वाली सामग्री को ब्लॉक करने के लिए ट्विटर से कहा गया था। इतना ही नहीं साल 2021 के शुरुआती 40 दिनों के भीतर ही भारत में केंद्र या राज्य सरकार विभिन्न वजहों का हवाला देकर कम से कम 10 बार इंटरनेट पर पाबंदी लगा चुकी है।

वैश्विक वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) रीव्यू वेबसाइट ‘टॉप 10 वीपीएन डॉट कॉम’ द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 2019 और 2020 में ही भारत में 13,000 घंटे से अधिक समय तक इंटरनेट बंद रहा और इस दौरान कम से कम 164 बार इंटरनेट बंद किया गया। साल 2019 में भारत सरकार ने 4,196 घंटों के लिए इंटरनेट बैन किया, जिसके चलते 1.3 अरब डॉलर का आर्थिक प्रभाव पड़ा। साल 2020 में ये आंकड़ा दोगुना हो गया और इस दौरान सरकार ने 8,927 घंटों के लिए इंटरनेट पर पाबंदी लगाई।

 (वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

  

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