Monday, October 18, 2021

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एनएपीएम ने पत्रकारों के दमन के खिलाफ उठाई आवाज

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(जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) ने जनपत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और मीडिया संस्थाओं पर बढ़ते सत्ता के दमन का निंदा करते हुए मांग की है कि गिरफ्तार किये गये पत्रकारों को तुरंत रिहा किया जाये। एनएपीएम ने कहा है कि सत्ता का यह कर्तव्य है कि जनहित में पत्रकारिता कर रहे सभी मीडियाकर्मियों और समूहों के संविधान में गारंटीशुदा अधिकारों का पालन सुनिश्चित हो। इस संदर्भ में जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ने एक बयान जारी किया है। पेश है उसका पूरा बयान-संपादक) 

14 फरवरी, 2021: सत्ताधारी वर्ग के लोगों से मिल रही धमकियों के बावजूद न झुकने वाले और जनहित में सच को सामने लाने वाली पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और समाचार संस्थानों को सत्ता की तरफ से निशाना बनाये जाने की बढ़ती घटनाओं से एन.ए.पी.एम आक्रोशित है। धमकियां या तो सीधे सत्ता से आ रही हैं या फिर उसकी एजेंसियों से या फिर उन लोगों की तरफ से जिनकी पीठ पर निष्पक्ष व निडर पत्रकारिता को दबाने के लिए परोक्ष रूप से सत्ता का हाथ है।

बयान में आगे कहा गया है कि विभिन्न रिपोर्ट दर्शाती हैं कि पिछले एक दशक में देश में 150 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई, उन्हें हिरासत में लिया गया, पूछताछ की गई, ‘आतंकवाद‘, राजद्रोह या गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यू.ए.पी.ए) के तहत आरोप लगाये गये और कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत के बाद आपदा प्रबंधन अधिनियम और महामारी बीमारी अधिनियम के तहत भी आरोप लगाये गये। ऐसे मामलों के 20 फीसदी मामले केवल वर्ष 2020 में हुए और अधिकतर यह भाजपा शासित प्रदेशों में हुए। ऐसे समय जब कई पत्रकार छंटनियों औैर आजीविका की असुरक्षा का सामना कर रहे हों, इस शासन में अपना काम करने के साथ उठाये जाने वाले खतरे स्थिति को और बुरा बनाते हैं।

यह साफ दिख रहा है कि मुख्यधारा के मीडिया का बड़ा हिस्सा केवल केंद्र की आवाज दर्शाती, झूठ, नफरत फैलाने वाली विषैली दुष्प्रचार मशीन बन चुका है। ऐसे में पत्रकार जो अपने पेशे के मूल्यों के साथ अडिग खड़े रहेने की कोशिश करते हैं, उन्हें धमकाया जा रहा है, हिंसा का सामना करना पड़ रहा है और 2014 से लेकर 2019 के बीच ही 200 हमलों की घटनाएं हो चुकी है जिनमें कई पत्रकार मारे भी जा चुके हैं।

2021 शुरू हुए डेढ़ महीना ही हुआ है, पत्रकारों को निशाना बनाने व हिंसा की घटनाएं गिनती से बाहर हैं। सबसे ताज़ा उदाहरणों में से एक है, एक स्वतंत्र ऑनलाइन समाचार संस्थान, न्यूज़क्लिक पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा हाल ही में छापा। 9 फरवरी से, 8 से अधिक परिसरों में, न्यूज़क्लिक के कार्यालय सहित, इसके कुछ पत्रकारों और वरिष्ठ प्रबंधन के कार्यालयों व घरों पर छापे मारे गए। एक मैराथन 113 घंटे से अधिक के लिए, ईडी ने प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और लेखिका गीता हरिहरन के घर पर डेरा डाला, और उन्हें 5 दिनों के लिए घर की नजरबंदी में रखा था। न्यूज़क्लिक लगातार किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग कर रहा है और ऐसे अन्य जनांदोलनों व मुद्दों पर भी जिन्हें ‘मुख्यधारा के मीडिया’ का बड़ा हिस्सा अनदेखी कर देता है।

कारवां और जनपथ में लिखने वाले एक स्वतंत्र पत्रकार मंदीप पुनिया को सिंघु बॉर्डर पर 30 जनवरी को रिपोर्टिंग करते समय दिल्ली पुलिस ने बैरीकेड से खींचकर हिरासत में लिया। पुनिया किसान आंदोलन की पहले दिन से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उनकी गिरफ्तारी सत्ता को सच का आईना दिखाने वाले पत्रकारों के उत्पीड़न का सबसे ताज़ा और भयावह उदाहरण है। उनके खिलाफ अलीपुर पुलिस स्टेशन में आधी रात के बाद 1.21 बजे ‘एक पुलिसकर्मी पर शाम साढ़े छह बजे हमला करने‘ का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की गई। जबकि एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें दिख रहा है कि पुलिस उसे घसीटते ले जा रही है। उनका मामला हाल के समय में एक दुर्लभ मामला था जिसमें किसी गिरफ्तार पत्रकार को जमानत मिल गई जो मजिस्ट्रेट की स्पष्ट स्वीकारोक्ति थी कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’|

राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडे, जफर आगा, कारवां पत्रिका के संपादक व संस्थापक परेश नाथ, संपादक अनंत नाथ और इसके कार्यकारी संपादक विनोद के.जोस जैसे प्रमुख पत्रकारों के खिलाफ पांच प्राथमिकियां दर्ज की गई हैं। प्राथमिकियों का आधार कथित रूप से ‘विभिन्न समूहों में विद्वेष बढ़ाना, शांति भंग करने के उद्देश्य से किसी को भड़काना व आपराधिक षड्यंत्र‘ है। यह प्राथमिकियां उन ट्वीट व रिपोर्ट पर की गई हैं जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि 26 जनवरी को किसान परेड के दौरान एक किसान को गोली लगी थी। 30 फरवरी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ उस रिपोर्ट के लिए प्राथमिकी दाखिल की जो मृत किसान के परिवार के आरोपों पर आधारित थी।

उससे पूर्व 25 जनवरी को कानपुर के तीन टीवी पत्रकारों मोहित कश्यप, अमित सिंह और यासीन अली पर एक मामला दर्ज किया, जिसका आधार वह रिपोर्ट थी जिसमें दिखाया गया था कि कैसे एक सरकारी स्कूल में सर्दी में खुले में योगा कर रहे बच्चे कांप रहे हैं। रिपोर्ट एक सरकारी कार्यक्रम की थी जिसमें उत्तर प्रदेश के प्रौद्योगिकी मंत्री अजित सिंह पाल मौजूद थे। 

20 जनवरी को गुजरात में एक निचली अदालत ने 2017 में द वायर पर प्रकाशित खबरों को लेकर अडानी की तरफ से दायर मानहानि के मामले में वरिष्ठ पत्रकार प्रंजोय गुहा ठाकुर्ता के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया। बाद में गुजरात उच्च न्यायालय ने वारंट को निलंबित किया और उन्हें मामले में निचली अदालत के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।

जनवरी में द फ्रंटियर मणिपुर में एक लेख के लिए मणिपुर में धीरेन सदाकपम, पोजेल चाओबा और एम जॉय लुवांग को गिरफ्तार किया गया था। उन पर राजद्रोह और यू.ए.पी.ए के तहत आरोप लगाये गये, जिनका पिछले कुछ सालों में देश भर में कार्यकर्ताओं व पत्रकारों के खिलाफ अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है। 

यह मामले देश भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों का प्रमाण हैं। यह अपने नागरिकों के अधिकारों के हनन के लिए सरकारों के अत्याचारों की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के खिलाफ राज्यसत्ता के उत्पीड़न की निरंतरता को दर्शाते हैं। सिद्दीक कप्पन की गिरफ्तारी व असंवैधानिक कैद इस अत्याचार का नमूना है। वह उत्तर प्रदेश में हाथरस मामले की रिपोर्टिंग के लिए जा रहे थे जब उन्हें व तीन अन्य को गिरफ्तार किया गया व उन पर यू.ए.पी.ए लगाया गया। वह अक्तूबर 2020 से जेल में हैं और न उन्हें जमानत मिली है, न मुकदमा शुरू हुआ है। यहां तक कि उन्हें अपनी 90 वर्षीय बीमार मां से भी मिलने की इजाजत नहीं दी गई है।

22 नवंबर 2020 को टीवी पत्रकार पोंगी नगन्ना को विशाखापत्तनम से गिरफ्तार किया गया था। उन पर माओवादियों के लिए ‘कोरियर’ का कार्य करने का आरोप था। इस गिरफ्तारी के बाद कई कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां यू.ए.पी.ए के तहत हुईं। पत्रकारों के उत्पीड़न के अन्य प्रमुख मामलों में उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर प्रशांत कनौजिया को बार-बार कई महीनों तक गिरफ्तार करना और जेल में बंद करना शामिल है। 

2020 को देखने पर पता चलता है कि यह चलन नया नहीं है। नवंबर 2020 में ही मेघालय उच्च न्यायालय ने शिलांग टाइम्स की संपादक पैट्रिशिया मुकीम के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इंकार किया, जो कथित रूप् से ‘समुदायों के बीच दुर्भावना’ पैदा करने वाली एक फेसबुक पोस्ट पर आधारित थी। 2019 में प्रगतिशील तेलुगु पत्रिका विकशणम के संपादक एन.वेणुगोपाल पर यू.ए.पी.ए और तेलंगाना जन सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था|

26 सितंबर 2020 को वरिष्ठ पत्रकार और भूमकाल समुत्रा पत्रिका के संपादक और पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति के प्रमुख कमल शुक्ला पर कांकेर (उत्तरी बस्तर, छत्तीसगढ़) में हमला किया गया था। स्थानीय पत्रकारों के अनुसार घटना दोपहर में घटी जब शुक्ला एक पत्रकार सतीश यादव पर सत्तारूढ़ कांग्रेस के पार्षदों के हमले के बारे में सुनकर स्थानीय पुलिस थाने में गये थे। सितंबर 2020 में ही पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम को मणिपुर पुलिस ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया था, बाद में उन्हें दिसंबर में जमानत मिली।

कश्मीरी पत्रकार आसिफ सुल्तान की दो साल से अधिक समय से कैद (उन पर यू.ए.पी.ए के तहत आरोप हैं जो कथित रूप से उनकी पत्रकारिता से असंबद्ध हैं) कश्मीर में पत्रकारों की स्थिति दर्शाती है जो निगाहबीनी व हिंसा के बीच रिपोर्टिंग कर रहे हैं, खासकर अनुच्छेद 370 रद्द करने के बाद। यह हमारे लोकतंत्र का दु:खद पहलू ही है कि मीडिया व इंटरनेट बंदी जैसे गंभीर, संवैधानिक मामले पर उच्चतम न्यायालय में समुचित तेज़ी नहीं दिखाई जाती।

पत्रकारों के प्रति राज्यसत्ता का रवैया और अपनाई जाने वाली उत्पीड़न की कई रणनीतियों में खासकर महिला पत्रकारों पर लक्षित हमलों को बढ़ावा देना है। पत्रकार नेहा दीक्षित, जो सत्ता के अत्याचारों की असुविधाजनक सच्चाईयों को बेनकाब करती रही हैं, ने हाल में बताया कि कोई उनके घर में घुसा, उनका पीछा कर रहा था और उन्हें जान से मारने व बलात्कार की धमकियां दी गईं। पहले तो पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से मना किया, जबकि वह उन्हें फोन नंबर दे रही थीं। काफ़ी प्रयास के बाद ही एफ.आई.आर दर्ज की गई थी, हालांकि इस मामले में कोई बात ठोस रूप से आगे नहीं बढ़ी है। 

हाल में नेटवर्क ऑफ वीमन इन मीडिया, इंडिया (NWMI) ने पुष्पा रोकड़े को उनके पत्रकारीय व अल्पकालीन गैर-पत्रकारीय कार्य के संदर्भ में कथित ‘माओइस्ट साऊथ बस्तर पामेद एरिया कमेटी’ की तरफ से मिली चेतावनियों व जान से मारने की धमकियों पर चिंता जताई थी। बयान में कहा गया कि सरकारी हिंसा व ग्रामीण इलाकों में आदिवासियों के मुद्दों पर उनकी पत्रकारिता को ध्यान में रखते हुए हालांकि यह कल्पना करना आसान नहीं है कि उन पर माओवादी क्यों ‘पुलिस मुखबिर‘ होने का आरोप लगाएंगे।

ऊपर बताये गये मामले पिछले दशक में हुए हमलों की व्यापकता का प्रतिनिधित्व नहीं करते। संघर्ष जोन, गैर महानगरीय क्षेत्रों में कार्य करने वाले पत्रकारों को जिन चुनौतियों व अत्याचारों का सामना करना पड़ता है, अक्सर उनकी खबरें भी नहीं आतीं। इसीलिए हमें उन लोगों के हितों की सुरक्षा के प्रति और सजग रहना होगा जो मुश्किल हालात में रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

इस संदर्भ में हमारी चिंता बढ़ जाती है जब कथित ‘राष्ट्र समर्थक‘ नागरिक और समूह पत्रकारों व मीडिया समूहों के प्रति सार्वजनिक धमकियां जारी करते हैं और उन पर षड्यंत्र रचने के आरोप लगाते हैं और दर्शकों को उनके खिलाफ हिंसा के लिए उकसाते हैं व कभी-कभी तो यह मांग भी करते हैं कि सरकार उन्हें फांसी पर लटका दे। ऐसे तत्वों के खिलाफ न सिर्फ कोई कार्रवाई नहीं की जाती बल्कि उनकी आवाज को सत्ताधारी पार्टी व उनके सहयोगी दलों के बीच समर्थन व मंच मिलता है जबकि जिन्हें धमकाया जा रहा है, उन पर सरकारी निगाहबानी की जाती है, उन्हें गिरफ्तार किया जाता है और उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है।

एक ताजा घटना की ओर मुड़ें तो एक यूट्यूबर के लॉकडाऊन के दौरान सरकार से सवाल करने और किसान आंदोलन की रिपोर्टिं के लिए प्रमुख स्वतंत्र पत्रकारों को ‘फांसी पर लटकाये जाने‘ की मांग का कपिल मिश्रा, तजिंदर बग्गा, सीजी सूर्या, पूर्व शिवसेना सदस्य रमेश सोलंकी, 2014 में भाजपा की सोशल मीडिया कैंपेन के प्रमुख व आर.एस.एस कार्यकर्ता विकास पांडे जैसे नेताओं ने सराहना की। दूसरी तरफ, भाजपा सरकार सोशल मीडिया मंचों को लगातार चेतावनियां जारी करती है और जिसे वह ‘भड़काऊ सामग्री व दुष्प्रचार‘ मानती है, ऐसी पोस्ट पर अंकुश लगाने के लिए सच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व पत्रकारिता के प्रति पूरी निष्ठुरता दर्शाते हुए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत लेखन, मुद्रण, तस्वीरों व इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण व मीडिया के जरिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है और यह लोकतंत्र के विचार का मूल भी है। सूचना एवं समाचार पर केंद्र सरकार व राज्य सरकारों का क्रूर उपायों से नियंत्रण औैर कुछ नहीं बल्कि फासीवाद है और भारतीय संविधान के लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ जाता है। एक तरफ जहां पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी फ्रेमवर्क की जरूरत है वहीं दूसरी तरफ कुछ राज्यों में जैसे महाराष्ट्र मीडिया पर्सन एंड मीडिया इंस्टीट्यूशंस बिल (2017) और छत्तीसगढ़ प्रोटेक्शन ऑफ मीडिया पर्संस एक्ट (2020) के सुझाये उपाय अपर्याप्त हैं, खासकर ऐसे मामलों में जहां रिपोर्टिंग सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जाती है जबकि पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उन्हीं की बनती है।

जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम) प्रेस एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघनों और ऐसा मुख्यधारा का मीडिया बनाये जाने, जो पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में हो, के प्रयासों की निंदा करता है। उच्चतम न्यायालय के हाल के निर्देशों कि भड़काऊ सामग्री पर अंकुश लगे, वर्तमान शासन की तरफ से कुछ मीडिया संस्थानों को मिला संरक्षण उन्हें कार्पोरेट, बहुसंख्यक हितों को साधने वाली सरकार के किसी भी प्रकार के विरोध को बदनाम करने व लोगों के भावनात्मक उकसावे के उपकरणों के रूप में ढाल रहा है।

बयान के आखिर में एनएपीएम ने मांग की है कि पत्रकारों के खिलाफ प्राथमिकियां खारिज की जाएं और जो इस समय हिरासत में हैं, तुरंत रिहा किया जाए। सत्ता पत्रकारों के अधिकारों, खासकर लैंगिक हिंसा व धमकियों का सामना करने वाली महिला पत्रकारों, का हनन करने के बजाय, अधिकारों की रक्षा करे।

हम अल्पसंख्यकों, किसानों, कर्मचारियों, महिलाओं, कार्यकर्ताओं, सदियों से प्रताड़ित समुदायों के समर्थन में और कार्पोरेट, पर्यावरणीय अपराधों या जनविरोधी नीतियों की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया संस्थानों और पत्रकारों का ‘खलनायिकीकरण’ करने के सत्ता के प्रयासों की निंदा करते हैं। हम मांग करते हैं कि कानूनी सुरक्षा दिलाने की मीडिया कर्मियों की पुरानी मांग को पी.यू.सी.एल के मसौदा कानून के अनुसार दी जाए और मानवाधिकार मानदंडों की बहाली की जाए।

हम केंद्र सरकार या राज्य सरकारों की जनविरोधी नीतियों को बेनकाब करने वाले मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले उन सभी पत्रकारों और छोटे शहरों से लेकर महानगरों में समाज का सच दिखाने वाले मीडिया संस्थानों के साथ खड़े हैं।

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