Thursday, December 9, 2021

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नॉर्थ ईस्ट डायरीः नागरिकता कानून पर गौहाटी उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

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पिछले दो वर्षों में कई रिपोर्टों ने असम के विदेशी ट्रिब्यूनलों (एफटी) के त्रुटिपूर्ण कामकाज को उजागर किया है, जहां ‘गैरकानूनी अप्रवासी’ होने का आरोप लगाने वाले व्यक्तियों को अपनी नागरिकता साबित करनी होती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि इन न्यायाधिकरणों ने मनमानी प्रक्रियाओं का पालन किया है, हाशिए पर रहने वाले व्यक्तियों पर व्यापक दस्तावेजी सबूत लाने का बोझ रखा गया है। एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में गौहाटी उच्च न्यायालय ने विदेशी ट्रिब्यूनल (एफटी) के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें असम में 1971 से पहले की मतदाता सूची में अपने सभी रिश्तेदारों के साथ संबंध स्थापित करने में विफल रहने के लिए एक व्यक्ति को विदेशी घोषित किया था।

अदालत ने दस्तावेजी साक्ष्य पर सावधानीपूर्वक विचार करने के अलावा, यह नोट किया कि विदेशी ट्रिब्यूनल की कार्यवाही की संरचना ऐसी थी कि विदेशी होने के आरोपियों को उन परिस्थितियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, जिनके तहत उन्हें ट्रिब्यूनल में भेजा गया था। अपने खिलाफ लगाए गए आरोप का कोई भी दस्तावेज या सबूत उनके पास नहीं था।

30 जनवरी, 2019 को एफटी-3, बरपेटा ने 12 नंबर, कवाईबारी गाँव, सरथेबारी के निवासी हैदर अली को ‘विदेशी’ घोषित किया था, जिसने 1971 के बाद असम में प्रवेश किया था। असम में नागरिकता को वंश द्वारा खोजा जाता है, जिसका अर्थ है कि राज्य में एक व्यक्ति को भारतीय नागरिक तभी माना जा सकता है, जब वह अपनी पहचान को 1971 के पूर्वज के साथ जोड़ते हैं। 1971 को कट-ऑफ के तौर पर 1985 के असम समझौते में निर्धारित किया गया था।

एक नोटिस प्राप्त करने के बाद, अली 11 जून, 2018 को एफटी के सामने पेश हुए, जिसमें उन्होंने अपने भारतीय नागरिकता को साबित करने के लिए अपना लिखित बयान और सहायक दस्तावेज प्रस्तुत किए। अली ने अपने दादा-दादी के नाम के साथ 1965 और 1970 की मतदाता सूची, अपने पिता के दादा-दादी के नाम के साथ 1988 की मतदाता सूची, उनके और उनके माता-पिता के नाम के साथ 1997 और 2010 की मतदाता सूची, जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल सर्टिफिकेट, गाँव बूरा (गाँव का मुखिया) सर्टिफिकेट- जिसने उनके पिता, हरमूज़ अली और उसके दादा-दादी नाना मिया और आयमोना नेसा से जोड़ा, जिनके दोनों नाम 1971 के पूर्व की मतदाता सूचियों (1965 और 1970) में दिखाई देते हैं। फिर भी, एफटी ने उनको ‘विदेशी’ घोषित किया, क्योंकि वह 1970 के मतदाता सूची में उल्लेखित पांच अन्य नामों (अपने दादा दादी के अलावा) को ‘उचित तरीके से लिंकेज’ स्थापित नहीं कर सके। इनमें तीन चाचा और दो बुआ के नाम शामिल थे।

30 मार्च, 2021 को, एक एकल न्यायाधीश की बेंच द्वारा एक आदेश जिसमें न्यायमूर्ति एन कोटिसवार सिंह शामिल थे, एफटी के आदेश को निरस्त कर दिया और घोषित किया कि अली एक भारतीय हैं, विदेशी नहीं।

निर्णय के अनुसार, “1970 के मतदाता सूची में अपने दादा-दादी के साथ जिनके नाम दिखाए गए थे, उनके साथ याचिकाकर्ता के संबंध की गैर-व्याख्या, 1970 की मतदाता सूची के रूप में अपने दादा-दादी के साथ याचिकाकर्ता के संबंध को दिखाने के लिए साक्ष्य की विश्वसनीयता या वास्तविकता को प्रभावित नहीं करती है।”

यह आगे जोड़ता है, “अगर याचिकाकर्ता वंश वृक्ष का अधिक विस्तार से खुलासा करता है, तो यह उसके दावे को मजबूत करेगा, लेकिन परिवार के सभी सदस्यों के नामों का खुलासा करने में विफलता उसके मामले को कमजोर नहीं कर सकती है और उसके सबूतों को अविश्वसनीय नहीं बना सकती है, न ही कम कर सकती है।”

एफटी ने यह भी कहा था कि अली के पिता ने अपने ‘लिखित बयान और सबूत’ में यह खुलासा नहीं किया था कि उनके तीन भाई और दो बहनें हैं, जो उनके गैर-खुलासे के लिए ‘गंभीर प्रतिकूल प्रभाव’ की ओर जाता है। एचसी का आदेश बताता है कि सिविल अदालतों और एफटी के ‘लिखित वक्तव्यों’ में अंतर है।

यह कहता है, “सीपीसी के तहत ‘लिखित बयान’ प्रतिवादी द्वारा वादी द्वारा दायर वादों, आरोपों और दावों के जवाब में प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत बचाव का एक बयान है।” दूसरे शब्दों में, व्यक्ति अपने खिलाफ आरोपों की एक सूची का जवाब देकर खुद का बचाव कर रहा है। हालांकि, एफटी के मामले में, केवल एक नोटिस जारी किया गया है, जिसमें कहा गया है, “वह असम और भारत के राज्य में एक निर्दिष्ट क्षेत्र और कुछ विशिष्ट अवधि के बिना, किसी भी अन्य तथ्यों के बिना, राज्य के लिए एक अवैध प्रवजनकारी है।” इसमें किसी अन्य आरोप का उल्लेख नहीं है।

गौहाटी स्थित वकील अमन वदूद ने कहा कि सभी एफटी नोटिस ‘सेट प्रारूप’ का पालन करते हैं। इसमें केवल नाम के साथ यह तथ्य रहता है कि वह एक विदेशी के रूप में आरोपी हो रहा है और यह कि उसको अपनी नागरिकता साबित करनी है। उन्होंने कहा, “एचसी जिस तथ्य को इंगित कर रहा है वह एफटी के कामकाज पर प्रकाश डालता है।” उन्होंने कहा कि अली के मामले में एचसी का आदेश भविष्य की नागरिकता के मामलों में एक मिसाल हो सकता है, क्योंकि इससे एफटी की विसंगतियों पर रोक लग सकती है। एचसी के अवलोकन से कि रिश्तेदारों के नाम (जैसे भाई, चाची, चाचा) के गैर-प्रकटीकरण से बचाव की विश्वसनीयता प्रभावित नहीं होती है, भविष्य में मदद मिलेगी, जब एनआरसी से बाहर रखे गए लोग एफटी में अपने बहिष्कार के खिलाफ अपील करेंगे। वंश वृक्ष का सत्यापन एनआरसी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

वदूद ने कहा कि अली का मामला पिछले 5-6 वर्षों में दुर्लभ मामलों में से एक है, जहां एचसी ने एफटी निर्णय को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। आमतौर पर, सबसे उदार निर्णयों में भी मामले को विचार के लिए एफटी को वापस भेजा जाता रहा है।

(दिनकर कुमार ‘द सेंटिनेल’ के संपादक रह चुके हैं।)

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