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Monday, September 27, 2021

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लापरवाही के जिम्मेदार अफसरों पर हो एससी-एसटी एक्ट में मुकदमाः एआईपीएफ

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लखनऊ। पीड़िता के परिवार के लोगों का राज्य और केंद्र की सरकार में कतई विश्वास नहीं है, इसलिए वे किसी सरकारी एजेंसी से जांच कराने को तैयार नहीं है। यह बातें हाथरस के बूलगढ़ी गांव में बर्बर हमले का शिकार हुई पीड़िता के परिवारजनों ने आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की जांच टीम से कही हैं।

एआईपीएफ के नेता दिनकर कपूर, मजदूर किसान मंच के महासचिव डॉ. बृज बिहारी, वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर दुर्गा प्रसाद, युवा मंच के नागेश गौतम की टीम ने 5 अक्टूबर को हाथरस घटना की जांच की थी। टीम ने पीड़िता के परिवारजनों से अपनी संवेदना व्यक्त की और उनके माता, पिता, दोनों भाईयों और परिवार के अन्य सदस्यों से बातचीत की। इसकी रिपोर्ट एआईपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व आईजी एसआर दारापुरी को सौंपी गई।

टीम की रिपोर्ट के आधार पर प्रेस को जारी अपने बयान में दारापुरी ने कहा कि मरने से पहले मजिस्ट्रेट के सामने पीड़िता का यह बयान कि उसके साथ रेप हुआ है, स्वतः प्रमाणित करता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के उच्चस्तरीय अधिकारी पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने और अपराधियों को दंडित कराने की जगह पीड़िता के साथ रेप नहीं हुआ है, ऐसा कह कर पूरे मामले की हो रही जांच की दिशा को ही भटका रहे हैं।

जांच टीम की रिपोर्ट के आधार पर एआईपीएफ का यह मानना है कि जांच अब इस बात की होनी चाहिए कि रेप जैसे आपराधिक कृत्य करने वाले लोगों को कौन संरक्षण दे रहा है और अभी भी पीड़ित परिवार की सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है। जांच रिपोर्ट के आधार पर एआईपीएफ ने पुनः यह तथ्य रेखांकित किया है कि बलात्कार के दोषियों के पक्ष में भारतीय जनता पार्टी से संबद्ध लोग जातीय उन्माद पैदा कर रहे हैं और प्रदेश सरकार और मीडिया का एक हिस्सा भी पूरे घटनाक्रम को सांप्रदायिक दिशा देने में लगा हुआ है, जो लोकतंत्र के लिए कतई शुभ नहीं है।

जांच टीम ने पुनः यह नोट किया कि सामंती अवशेष और विकास मदों की लूट से बनी माफिया पूंजी का गठजोड़ दलित समेत समाज के सभी शोषित, दमित लोगों का उत्पीड़न करती है। योगी सरकार में जिसका मनोबल बहुत बढ़ा हुआ है। यही वह ताकतें हैं जो सोनभद्र के उभ्भा से लेकर हाथरस के बूलगढ़ी तक हमले करवाती हैं। यह ताकतें निचले स्तर पर राजनीतिक दलों के पक्ष में काम करती हैं और समाज के जनवादी विकास को रोकती हैं और सामाजिक तनाव को बढ़ाती है।

उन्होंने कहा कि बूलगढ़ी में दमन झेलते हुए विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को इन ताकतों के प्रति अपना रुख साफ करना चाहिए। साथ ही टीम ने यह भी नोट किया कि दलितों के नाम पर बन रही सेनाओं से दलितों का भला नहीं होने जा रहा है, क्योंकि उनके पास दलित मुक्ति की न तो नीति है और न ही नियत। दारापुरी ने हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा हाथरस की पीड़िता के मामले पर स्वतः संज्ञान लेने का स्वागत करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह माना है कि यदि आवश्यकता हुई तो वह अपनी निगरानी में जांच कराएगा, इसलिए हमें उम्मीद है कि हाई कोर्ट की निगरानी में पूरे घटनाक्रम की जांच होगी और पीड़िता के साथ न्याय होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि 14 सितंबर को पीड़िता के भाई की तहरीर पर थाने में लिखी गई एफआईआर में आईपीसी धारा 354 (सी) तक का दर्ज न करना एससी-एसटी एक्ट की धारा 4(2)(ख) के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इसी प्रकार पीड़िता को पुलिस द्वारा अस्पताल जाने के लिए वाहन न देना एससी-एसटी एक्ट की धारा 4 (1) के तहत दंडनीय अपराध है, इसलिए इन धाराओं में तत्कालीन थानाध्यक्ष पर मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई होनी चाहिए।

पीड़िता के परिवारजनों को धमकाना, उनका फोन रखना, उन्हें घर में बंद रखना एससी-एसटी एक्ट की धारा 4 (2) (ध) के तहत दंडनीय अपराध है और मृतका की लाश परिवारजनों को न देकर रात में ही जबरन उसका दाह संस्कार कर देना मौलिक अधिकार का उल्लंधन तो है ही साथ ही एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 (द) के तहत दंडनीय अपराध भी है, इसलिए इससे संबंधित पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर भी एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

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