Tuesday, January 18, 2022

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आयुर्वेद पढ़ने वाले छात्रों को पुलिस से पिटवाकर बनेगा आयुष प्रदेश!

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देहारादून के परेड ग्राउंड स्थित धरना स्थल पर पुलिस ने 19 अक्टूबर की शाम को एकाएक धावा बोल दिया। यहां बीते कई दिनों से विभिन्न आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का धरना और आमरण अनशन चल रहा था। घोषित तौर पर उद्देश्य था 7-8 दिन से आमरण अनशन पर बैठे एक छात्र को उठाना। छात्र-छात्राओं का कहना है कि पुलिस ने उन पर लात-घूंसों से प्रहार किया।

प्रदेश के विभिन्न प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों के छात्र-छात्राएं धरना-प्रदर्शन क्यूं कर रहे हैं? 14 अक्टूबर 2015 को यानि हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्व काल में तत्कालीन प्रमुख सचिव ओमप्रकाश ने एक शासनादेश जारी करके निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में बीएएमएस की फीस 80 हजार रुपये प्रतिवर्ष और छात्रावास शुल्क 18 हजार रुपये से बढ़ा कर दो लाख 15 हजार रुपये प्रतिवर्ष कर दिया गया। बीएचएमएस पाठ्यक्रम के लिए यह फीस 73 हजार 600 रुपये प्रति वर्ष और छात्रावास शुल्क 18 हजार रुपये से बढ़ाकर एक लाख 10 हजार रुपये प्रति वर्ष कर दी गई।

बढ़ी हुई फीस नए छात्र- छात्राओं से ही नहीं पहले से पढ़ रहे छात्र-छात्राओं से भी वसूली जाने लगी। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के अत्यंत प्रिय अफसर, तत्कालीन प्रमुख सचिव और वर्तमान में अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश का फीस वृद्धि संबंधी उक्त आदेश पूरी तरह अवैधानिक था।

2004 में पीए इनामदार बनाम महाराष्ट्र सरकार के मुकदमे में उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया था कि प्राइवेट कॉलेजों की फीस निर्धारण के लिए राज्य स्तर पर विशेषज्ञ कमेटी गठित की जाए। उक्त आदेश के अनुपालन में उत्तराखंड सरकार ने “उत्तरांचल अनएडेड प्राइवेट प्रोफेशनल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रेग्युलेशन एंड फ़िक्सेशन ऑफ फी) अधिनियम, 2006” पारित किया गया। उक्त अधिनियम के अनुसार निजी संस्थानों में शुल्क निर्धारण, उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली कमेटी तय करेगी।

2006 में पारित उक्त अधिनियम में शुल्क निर्धारण कमेटी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नामित करने का अधिकार उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दिया गया था, वहीं 2010 में राज्य में बनी भाजपा की सरकार ने उक्त अधिनियम में संशोधन करके शुल्क निर्धारण कमेटी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नामित करने का अधिकार सरकार के हाथ में यानि स्वयं के हाथ में ले लिया।

फिर भी शुल्क वृद्धि का अधिकार वैधानिक रूप से उक्त कमेटी को ही है। वर्तमान सरकार के अत्यंत चहेते अफसर ने पिछली सरकार के कार्यकाल में नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए स्वयं ही शुल्क वृद्धि का ऐलान कर दिया। इस शुल्क वृद्धि के खिलाफ बीएएमएस के  2013-14, 2014-15 और 2015-16 बैच के पांच छात्रों ने उच्च न्यायालय, नैनीताल में जनहित याचिका दाखिल की। उत्तराखंड सरकार ने न्यायालय में तर्क दिया कि उक्त शुल्क वृद्धि इसलिए जायज है क्योंकि यह सात साल बाद की गई है।

जुलाई 2018 में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने राज्य सरकार के तर्क को खारिज करते हुए फीस वृद्धि के राज्य सरकार के आदेश को अरक्षणीय करार देते हुए रद्द कर दिया। एकल पीठ ने यह भी आदेश दिया कि यदि किसी कॉलेज ने छात्र-छात्राओं से बढ़ी हुई फीस ली है तो न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो हफ्ते के भीतर वह वसूली गई धनराशि लौटा दे।

उच्च न्यायालय की एकल पीठ के फैसले के खिलाफ प्राइवेट आयुर्वेदिक कॉलेजों की एसोसिएशन ने डबल बेंच में अपील की। डबल बेंच ने नौ अक्टूबर 2018 को सुनाए गए अपने फैसले में कहा कि फीस बढ़ाने का राज्य सरकार का निर्णय उत्तरांचल अनएडेड प्राइवेट प्रोफेशनल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रेग्युलेशन एंड फ़िक्सेशन ऑफ फी) अधिनियम, 2006 और उच्चतम न्यायालय के स्थापित कानून का उल्लंघन है। साथ ही डबल बेंच ने एकल पीठ के फैसले को सही करार दिया।

उच्च न्यायालय के उक्त दो आदेशों के बाद क्या होना चाहिए था? राज्य सरकार के लिए यह बाध्यकारी था कि वह उच्च न्यायालय के उक्त आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित कराती। गृह विभाग का जिम्मा संभालने वाले मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत को पुलिस को प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के संचालकों के ठिकाने पर भेजना चाहिए था। इसके बदले धरने पर बैठे हुए छात्र-छात्राओं के तम्बू पर धावा बोलने के लिए पुलिस भेजी गई। त्रिवेन्द्र रावत सरकार में परिपाटी बन गई है कि उच्च न्यायालय का जो आदेश सरकार को अपने मुफीद नहीं लगता, उसकी खुली अवहेलना की जाती है।

उच्च न्यायालय के दो आदेशों के बावजूद छात्र-छात्राओं पर बढ़ी फीस देने के लिए निरंतर दबाव बनाया जा रहा है। बढ़ी फीस न देने वाले छात्र-छात्राओं को तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। क्लास में बैठने से रोके जाने से लेकर हॉस्टल से निकालने की धमकियां तक लगातार दी जा रही हैं। थ्योरी में पास छात्र को प्रैक्टिकल में फेल कर दिया गया। इसके खिलाफ इन छात्र- छात्राओं ने उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर देहारादून के जिलाधिकारी तक से शिकायत की। जहां उच्च न्यायालय का निर्णय नहीं माना जा रहा, वहां बाकी किसी की क्या बिसात!

प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज वाले किस कदर छुट्टे और नियंत्रण मुक्त हैं, इसकी एक और बानगी देखिए। उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन के संबंध में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलपति ने पांच अक्टूबर 2019 को प्राइवेट आयुर्वेदिक/होमियोपैथी/यूनानी मेडिकल कॉलेजों की बैठक बुलाई। 16 सम्बद्ध कॉलेजों में से केवल छह कॉलेजों के प्रतिनिधि ही बैठक में पहुंचे। जब आयुर्वेद  विश्वविद्यालय ने उक्त उपास्थित छह कॉलेजों के प्रतिनिधियों से फीस के मामले में हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन करने संबंधी पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा तो छह में से तीन ने बहाना बनाते हुए हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। यह खुले तौर पर ऐलान है कि शुल्क वृद्धि के संबंध में हाईकोर्ट के आदेश को ये प्राइवेट कॉलेज नहीं मानेंगे।

इन कॉलेजों की इस कदर ढीठ होने की वजह क्या है आखिर? जानकारों का कहना है कि प्राइवेट आयुर्वेदिक कॉलेज सत्ता के निकटस्थ बड़े लोगों के हैं। यही वजह है कि हाईकोर्ट के आदेश की खुली अवमानना करने में इन्हें तनिक भी भय नहीं हो रहा है। भाजपा के ही राज में उत्तराखंड को आयुष प्रदेश बनाने का नारा भी उछाला गया था। ये नारा उछालने वाले निशंक जी और मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी, क्या आयुर्वेद पढ़ने वालों के अभिभावकों की जेबें काटने और इन छात्र-छात्राओं को पुलिसिया लात-घूसों से पिटवा कर बनेगा आयुष प्रदेश!

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