इमरजेंसी भी शर्मा जाए! हरियाणा में सीएए के खिलाफ पर्चा बांट रही महिलाओं से पुलिस की नोकझोंक

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रोहतक। रोहतक में मंगलवार दोपहर को सीएए, एनआरसी और एनपीआर को लेकर लोगों के बीच पम्फलेट बांट रहीं जनवादी महिला समिति की प्रतिनिधियों के साथ पुलिस की नोकझोंक हुई। पुलिस का आरोप था कि जेएमएस की एक्टिविस्ट पर्चे बांटकर लोगों को परेशान कर रही हैं।

जनवादी महिला समिति की वरिष्ठ नेत्री जगमती सांगवान, समिति की हरियाणा राज्य सचिव सविता, मुनमुन हज़ारिका, वीणा मलिक, राज़ पुनिया, उर्मिल आदि एक्टिविस्ट रोहतक के नया बस स्टैंड के पास लोगों को पम्फलेट बांटते हुए उनसे बातचीत कर रही थीं तो पुलिस ने उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश की। पुलिस अधिकारी का आरोप था कि जनवादी महिला समिति की कार्यकर्ता लोगों को परेशान कर रही हैं। पुलिस से नोकझोंक के बावजूद जेएमएस का अभियान ज़ारी रहा।

वह पर्चा नीचे दिया जा रहा है जिसके चलते पुलिस और महिला संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच नोकझोंक हुई:

सीएए एनपीआर और एनआरसी नहीं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा   

बहनों,

आज पूरे देश के करोड़ों लोग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के विरोध में सड़कों पर हैं। इन विरोध कार्रवाइयों में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। सवाल उठना लाजमी है कि हम इन कानूनों को काला कानून क्यों कह रहे हैं?

आज केंद्र की भाजपा सरकार देश से घुसपैठियों को बाहर निकालने के नाम पर के देश के 130 करोड़ नागरिकों से नागरिकता का प्रमाण पत्र मांग रही है। जबकि इस संबंध में पहले से कानून मौजूद हैं। इसी क्रम में नागरिकता संशोधन कानून लाया गया जो धर्म के आधार पर नागरिकों का बंटवारा करता है। इसी के अगले क्रम में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर लागू किया जा रहा है जो हमसे तमाम दस्तावेज मांगता है जो बाद में एनआरसी का आधार बनेगा। 

हमारा विरोध क्यों

1. हम सीएए का विरोध करते हैं क्योंकि यह हमारे देश के संविधान की मूल भावना धर्मनिरपेक्षता पर चोट करता है। संविधान में कहीं भी नागरिकता का आधार धर्म नहीं माना गया है किंतु यह कानून पहली बार नागरिकता को धर्म के साथ जोड़ता है। यह देश के लिए बेहद खतरनाक है। संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग लिखा है ना कि वे भारत के लोग जिनके पास नागरिकता सिद्ध करने के दस्तावेज हों।

2. हम एनआरसी का विरोध करते हैं क्योंकि हम असम में इसका परिणाम देख चुके हैं। करोड़ों रुपए की सरकारी धन की बर्बादी हुई, वहीं आम जनता 4 साल तक अपने सब काम छोड़कर व अपने हजारों रुपए खर्च करके दस्तावेज जुटाने में लगी रही। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का ऐसा रास्ता खुला कि लोग दलालों के चंगुल में फंस गए और उनकी जमीन जायदाद तक बिक गई और फिर भी पूरे दस्तावेज नहीं मिल पाए। एक ही परिवार के कुछ का नाम सूची में आया और कुछ डिटेंशन सेंटर में भेजे गए।

3. ये दस्तावेज केवल वोटर कार्ड, आधार कार्ड या राशन कार्ड नहीं हैं बल्कि 1971 की मतदाता सूची में नाम, जमीन के कागजात, स्थाई निवास प्रमाण-पत्र, जन्म प्रमाण-पत्र स्कूल प्रमाण-पत्र आदि 14 प्रकार की जानकारी के दस्तावेज हैं। मजदूरी की तलाश में पलायन करने वाले मजदूर परिवारों, भूमिहीन गरीबों के पास क्या इतने दस्तावेज होंगे ? 

4. हमारा देश एक गरीब मुल्क है जहां आज भी करोड़ों लोगों को स्कूल जाने का मौका नहीं मिला और ऐसे में अक्सर राशन कार्ड, आधार कार्ड या बैंक खाते में नामों की स्पेलिंग या मात्रा गलत होती है जिसे ठीक करवाने के लिए कितने चक्कर लगाने पड़ते हैं। रिश्वत देनी पड़ती है। इंकार करें तो यूपी के उन दो बच्चों जैसा हाल होता है जिनके चाचा ने जब रिश्वत देने से मना किया तो उनकी उम्र जन्म प्रमाण पत्र में 102 और 104 साल लिख दी गई जो अब भी जन्म प्रमाण पत्र ठीक करवाने के लिए धक्के खा रहे हैं। महिलाओं को संपत्ति में अधिकार मिलता नहीं है तथा अक्सर ससुराल में महिलाओं का नाम बदल देते हैं।

महिलाओं के राशन कार्ड में कुछ और नाम तथा जन्म प्रमाण-पत्र में कुछ और नाम मिलते हैं। अनाथ बच्चों तथा ट्रांसजेंडरों के पास अपनी पिछली कोई पहचान नहीं होती है। अब ऐसे व्यक्तियों के सही दस्तावेज न पाने पर उनके नाम के आगे गोला बना दिया जाएगा। मतलब कि आप संदिग्ध हैं। संबंधित होने पर अगर आप मुस्लिम हैं तो आपके नागरिक अधिकार छिन जाएंगे और अगर गैर मुस्लिम हैं तो सिद्ध करें कि आप पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के प्रताड़ित शरणार्थी हैं। जो लोग नागरिकता साबित करने में असफल रहेंगे उनसे बहुत संघर्षों से हासिल किया गया वोट का अधिकार, संपत्ति, रोजगार आदि सब छिन जाएगा।

5. हम काले कानून का इसलिए भी विरोध करते हैं कि जब देश की जनता महंगाई, बेरोजगारी भूख और मंदी की मार झेल रही है तब जनता के बुनियादी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए सरकार द्वारा पूरे देश को लाइनों में खड़ा करने की तैयारी की जा रही है। जब शिक्षा का बजट केवल 95000 करोड़ रुपए और स्वास्थ्य का मात्र 63000 करोड़ रुपए है तब इस फिजूल की प्रक्रिया में 4 लाख करोड़ रुपए क्यों खर्च किए जा रहे हैं ? 

हमें यह समझना होगा कि इन तीनों काले कानूनों का असर केवल किसी विशेष समुदाय पर नहीं बल्कि देश के करोड़ों गरीबों तथा हाशिए पर पड़े लोगों पर पड़ेगा। अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाएगा। यह देश को बचाने, संविधान बचाने और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई है। आइए हम सब मिलकर इसके खिलाफ आवाज बुलंद करें

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, हरियाणा

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