Wednesday, January 26, 2022

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‘शांति का टापू’ कहे जाने वाले मालवा निमाड़ की सांप्रदायिक घटनाएं पूर्व नियोजित: फैक्ट फाइंडिंग टीम

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मध्य प्रदेश में हुई सांप्रदायिक घटना की फैक्ट फाइंडिंग के लिए एक टीम ने मालवा निमाड़ के कई गांवों का दौरा किया। यहां का दौरा करने के बाद टीम ने एक रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी घटनाएं केवल डोराना मंदसौर में नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में एक ही पैटर्न पर हुई सांप्रदायिक घटनाएं बहुत से सवाल खड़े करती हैं।

फैक्ट फाइंडिंग टीम ने गांव के लोगों, प्रशासनिक अधिकारियों और वकीलों से बातचीत के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है। टीम में CITU के शैलेंद्र सिंह ठाकुर, सुप्रीम कोर्ट के वकील एहतशाम हाशमी, सोशल एक्टिविस्ट कृपाल सिंह मंडलोई, सीपीआईएम मंदसौर के नेता एडवोकेट गोपाल सिंह मोर शामिल रहे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दिसंबर 2020 के आखिरी सप्ताह में ‘शांति का टापू’ कहे जाने वाले मध्य प्रदेश के मालवा निमाड़ के अलग-अलग गावों से तनाव की घटनाओं की ख़बरें एक के बाद एक सामने आने लगीं थीं।

घटना से पहले
रिपोर्ट के मुताबिक डोराना मंदसौर में 29 दिसंबर को हुई घटना से पहले के घटनाक्रम साफ़ इशारा करते हैं कि मालवा क्षेत्र की यह घटनाएं एक रणनीति का हिस्सा हैं।मध्य प्रदेश में निकाय और पंचायतों चुनावों को कोरोना की वजह से अचानक आगामी तीन महीनों तक टाल दिया गया, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि ऐन वक़्त पर की गई यह घोषणा कोरोना के कारण से ज्यादा किसान आंदोलन से फैले असंतोष को टालना भर था।लोगों का यह भी मानना है कि चुनावों की तारीख टाले जाने के ठीक अगले दिन से हो रही तनाव की घटनाएं कुछ हद तक इस पर मोहर भी लगाती हैं।

25 दिसंबर को उज्जैन में हुई घटना के बाद उपद्रवियों और जिम्मेदार दोनों की ओर से हर घटना को ‘प्रतिक्रिया मात्र’ कह कर पल्ला झाड़ने से लेकर संरक्षण देने का काम किया जा रहा है। उज्जैन में हुई घटना और उसके बाद की गई कार्रवाई भी अनेकों सवालों के घेरे में है। यह भी सच्चाई है कि उसी दिन उज्जैन के अलावा और भी जगहों पर उकसावे की घटनाओं को अंजाम दिया गया। ठीक इसी क्रम में 25 दिसंबर को लगभग 200 लोगों की भीड़ चंदे के नाम पर डीजे पर भड़काऊ नारों और गानों के साथ डोराना मंदसौर में भी पहुंची।

प्रशासन को इस रैली की जानकारी पहले से थी। रैली आपत्तिजनक नारों और डीजे पर गानों के साथ मस्जिद के सामने तक पहुंची और वहां खेल रहे बच्चों से रास्ता पूछा, जो उन्हें बता दिया गया। साथ ही यह आग्रह भी किया गया कि असर की नमाज का वक्त हो रहा है, तो डीजे को थोड़ी देर के लिए बंद कर दिया जाए। इसके बाद वो वहां से बताए गए रास्ते पर चले गए। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले ही दिन से भड़काने के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर संदेश भेजे जाने लगे। भीड़ एकत्र कर 29 तारीख को पहुंचने के लिए आसपास के इलाकों में संदेश भेजे जाने लगे। इस बात की जानकारी भी प्रशासन को थी। जैसे ही गांव के लोगों को इसकी भनक लगी, उन्होंने प्रशासन को लिखित में सूचना दी। गांव के लोगों ने अनहोनी की आशंका भी जताई और अपील की कि प्रशासन संज्ञान लेकर त्वरित हरकत में आए।

व्हाट्सऐप ग्रुप पर चल रहे संदेशों के स्क्रीन शॉट भी दिखाए गए। गांव वालों ने खुद प्रशासन से कहा कि कुछ नहीं तो दफा 144 लगा दें या कोरोना में इतनी बड़ी रैली नहीं निकाली जा सकती है, यह बोल दिया जाए, लेकिन प्रशासन ने रैली रोकने में असमर्थता जताते हुए कहा कि आप सब अपने घर की महिलाओं और बच्चों को लेकर उस दिन गांव से बाहर चले जाएं।

रिपोर्ट के मुताबिक घटना के एक दिन पहले शाम 8:00 बजे के आस-पास गांव में 3-4 बार अनाउंसमेंट हुआ कि सभी हिंदू भाई अपने घरों में हथियार लेकर रहें, कल एक बड़ी रैली आने वाली है। इसके बाद डोराना गांव के अधिकतर अल्पसंख्यक परिवार घर छोड़ कर खेतों में चले गए।

फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक घटना वाले दिन यानी 29 दिसंबर 2020 को प्रशासन को पूर्व सूचना के बाद भी किसी तरह की बैरिकेडिंग नहीं की गई और न ही उचित संख्या में पुलिस बल तैनात किए गए। सुबह लगभग 11 बजे के आसपास पुलिस प्रशासन के लोगों ने गांव में बचे हुए अल्पसंख्यक परिवारों से आग्रह किया कि वो सब भी अपने-अपने घरों से निकल कर जल्द से जल्द खेतों में चले जाएं। अगर गलती से भी कोई छूट जाए तो वो अपने आप को घर में बंद कर लें। साथ ही प्रशासन ने खुद कहा कि लोग अपने-अपने घरों से झंडे आदि भी हटा दें।

टीम की रिपोर्ट के मुताबिक दोरोना गांव की ओर हथियारों के साथ आने वाली रैली का फेसबुक लाइव विभिन्न एकाउंट्स से होने लगा, फिर भी प्रशासन नहीं चेता। दोपहर लगभग 1:30 बजे पहली बड़ी रैली डीजे के साथ गांव में पहुंची। डीजे पर लगातार आपत्तिजनक नारे और गाने चलते रहे। लगभग 2:30 बजे के आसपास दो और रैलियां डीजे पर नारे लगाते हुए पहुंचीं। लगभग 5000-6000 की संख्या होने के बाद माहौल और ख़राब हो गया। रैली में शामिल लोग अचानक घरों पर चढ़ने लगे और भगवा झंडे लगाने लगे। बंद घरों के दरवाजे तोड़ने की कोशिशें होने लगीं। मस्जिद पर और कब्रिस्तान के गेट पर भी भगवा झंडे लगाए गए।

रिपोर्ट बताती है कि घरों को चिन्हित कर नुकसान पहुंचाया जाने लगा। जिस गली में केवल दो विशेष समुदाय के घर थे, उसमें भी अंदर घुस कर टीवी आदि फोड़ी गई। समुदाय विशेष के लगभग हर घर का बिजली मीटर तोड़ा गया। शौचालयों के दरवाजे तोड़े गए। घरों में लगे शीशे तोड़े गए। गाड़ी पलटाई गई। सीसीटीवी तोड़े जाने के बाद एक घर में घुस कर तिजोरी तोड़ी गई और घर वालों के अनुसार उनके घर में रखे पैसे और ज़ेवर लूटे गए। साथ ही शीशे की बनी हर चीज तोड़ी गई। जानवरों तक को नहीं छोड़ा गया। गांव के दिव्यांग व्यक्ति को भी पीटा गया। यहां तक कि गली में बंधी भैंसों को मारा गया और एक बकरी भी मारी गई।

रिपोर्ट के अनुसार, यह सब कुछ तीन घंटों तक चलता रहा और प्रशासन अपने गिनती के अमले के साथ देखता रहा। किसी तरह की अतिरिक्त पुलिस, रैपिड एक्शन फ़ोर्स, सीआरपीएफ आदि को नहीं लगाया गया, जबकि नीमच से 50 मिनट में सीआरपीएफ बुलाई जा सकती थी। हिंसक भीड़ के जाने के बाद वापस आने पर लोगों ने अपने घरों की हालत देखी और नामजद रिपोर्ट लिखवाई, लेकिन कमज़ोर रिपोर्ट बनाई गई। उचित धाराओं में प्रकरण दर्ज नहीं किए गए।

बाद में दो रिपोर्ट मुस्लिम समाज के अज्ञात लोगों के नाम से भी लिखी गई, यह कहते हुए कि 25 दिसंबर को आई रैली में शामिल लोगों से उनका विवाद हुआ, जिसके बाद यह सब हुआ। सब कुछ हो जाने के बाद चार दिन पुरानी बात का हवाले देते हुए रिपोर्ट का लिखा जाना, रैली की जानकारी होते हुए भी, उचित निर्देशों का न लिया जाना और FIR में उचित धाराओं का न लगाया जाना साफ़ करता है कि प्रशासन चाहे किसी के दबाव में है या खुद संलिप्त है। गांव के लोगों ने सभी फोटो, वीडियो, सोशल मीडिया स्क्रीन शॉट को पुलिस के संज्ञान में दिया है और अपील की है कि संविधान के हिसाब से काम करें।

रिपोर्ट में मांग की गई है कि मध्य प्रदेश में बीते दिनों हुई सभी घटनाओं की न्यायिक जांच की जाए। रैली के आयोजकों पर, सोशल मीडिया पर रैली की अपील करने वालों पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो। तमाम कार्रवाईयां किसी पार्टी या नेता के बयानों पर नहीं, बल्कि संविधान के हिसाब से हो। प्रशासन के, समय से निर्णय न लेने और गैर जिम्मेदार रवैये पर भी कार्रवाई हो। जिम्मेदार अधिकारियों को सस्पेंड किया जाए। यह जांच भी की जाए कि रैली के आयोजकों को जानबूझ कर संरक्षण तो नहीं दिया गया। पुलिस और आयोजकों के बीच अगर कोई कॉल हुई है तो उसके रेकॉर्ड्स को भी प्रिजर्व किया जाए।

सभी भड़काऊ ग्रुप्स और आयोजकों के व्हाट्सऐप रेकार्ड्स को प्रिजर्व किया जाए, ताकि सभी सबूतों के आधार पर न्याय मिले। घटना के दौरान हुए नुकसान का उचित मुआवजा जल्द से जल्द दिया जाए। मध्य प्रदेश के हर जिले में प्रशासन को इस तरह की भड़काऊ रैली को समुदाय विशेष के इलाके में से निकलने को अनुमति न दी जाए।

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