Friday, April 19, 2024

प्राइवेट अस्पतालों के मुनाफे की हवस के चलते सामान्य प्रसव की जगह हो रहा है सिजेरियन

प्रयागराज/प्रतापगढ़। बहरिया ब्लॉक के बलीपुर सथरे गांव के निवासी मनोज पटेल (27 साल) सटरिंग का काम करते हैं। काम कभी किसी महीने लगातार चलता है तो कभी किसी महीने एकदम नहीं रहता है। किसी महीने हफ्ता पाख ही चलता है। कुल मिलाकर कमाई कोई फिक्स और नियमित नहीं है, किसी तरह गुज़ारा हो रहा है। शादी के दो साल बाद मनोज पटेल की जीवन साथी नीतू पटेल (25 साल) गर्भवती हुईं। जीवनसाथी और भावी पिता के तौर पर मनोज पटेल का भरोसा भी क्षेत्र के निजी अस्पताल पर बना। वो किसी तरह अपने जीवन साथी को समय-समय पर निजी अस्पताल में दिखाते और ज़रूरी जांच आदि कराते रहे।

लेकिन जब प्रसव का दिन नज़दीक आया तो निजी अस्पताल ने मनोज पटेल को बताया कि गर्भ में बच्चे के गले में नाल लिपट गया है। सीजेरियेन करना पड़ेगा। ख़र्चा भी बता दिया गया 40 हजार रुपये। मनोज हड़बड़ा उठे। पैसे तो थे नहीं, कर्ज़ आदि की व्यवस्था में लग गये। नीतू ने अपनी मामी से बात की। दरअसल मनोज की जीवन साथी नीतू की मामी धनपुर ब्लॉक के बहचन्निया गांव की निवासी और आशा वर्कर हैं। उन्होंने पति-पत्नी को समझाया और अपने गांव आने के लिए मनाया। वहां नीतू की मामी उसे लेकर सरकारी अस्तपताल में गयी। जहां नीतू की सामान्य डिलिवरी करवायी गयी। नीतू ने एक हष्ट-पुष्ट बिटिया को जन्म दिया। उसी दिन शाम को जच्चा-बच्चा को अस्पताल से रिलीज भी कर दिया गया।

रमाकान्त पटेल प्रतापगढ़ जिले के रानीपुर तहसील के खाखापुर गांव के निवासी हैं। अप्रैल महीने के पहले सप्ताह में उनकी जीवन संगिनी रेनू पटेल (22 वर्ष) का नौवां महीना चल रहा था। डिलिवरी के समय प्राइवेट अस्पताल में रेनू की सोनोग्राफी, अल्ट्रासाउंड आदि जांच करने के बाद बताया गया कि डिलिवरी की डेट पूरे एक सप्ताह ओवर हो रही है। अब तक तो बच्चा हो जाना चाहिए था। जबकि गर्भधारण के बाद से रेनू की देखरेख उसी प्राइवेट अस्पताल में हो रही थी। अस्पताल ने रेनू के परिजनों से कहा कि कोई कंप्लीकेशन हो सकती है। इसलिए सिजेरियन करना पड़ेगा।

रेनू ने दलील दी की उन्हें कोई दर्द नहीं महसूस हो रहा है ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें इस तरह से बताया कि परिजन डर गये। रमाकान्त और उनके भाई करनाईपुर और बिटई बाज़ार में पैथोलॉजी सेंटर चलाते हैं। पैसे की कोई तकलीफ़ नहीं थी अतः परिजन बिना वक्त ज़ाया किए रेनू को लेकर सिजेरियन के लिए गये। जहां उसकी सिजेरियन डिलिवरी करवायी गयी। इस अस्पताल में रमाकान्त के ममेरे भाई काम करते हैं। फिर भी परिवार 30-35 हजार रुपये के चपेट में आ गया। जच्चा-बच्चा को जो परेशानी हुई सो अलग।

अब इसे चिकित्सकीय नैतिकता के दायरे में समझने की कोशिश की जाए या सामान्य नैतिकता के दायरे में, दोनों ही दृष्टि से ग़ैरजरूरी सिजेरियन डिलीवरी को उचित नहीं माना जा सकता। सी-सेक्शन भारत जैसे विकासशील देशों में तेजी से आम होता जा है। विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति को ‘बाज़ार की महामारी’ करार देते हैं। मजे की बात यह है कि निजी अस्पतालों में गर्भधारण से लेकर डिलीवरी होने तक गर्भवती महिलाओं को परीक्षण में रखा जाता है।

आए दिन सोनोग्राफी व अन्य जांचें होती हैं और अधिकांश मामलों में डिलीवरी के ठीक पहले तक निजी अस्पतालों में यही कहा जाता है कि सब कुछ सामान्य है और फिर डिलीवरी के लिए अस्पताल में लेकर जाते ही पता नहीं कैसे सबकुछ असामान्य हो जाता है। कहीं सामान्य डिलीवरी और सिजेरियन डिलीवरी के चार्जेज में भारी अंतर इसका कारण तो नहीं है।

क्या है सिजेरियन सेक्शन

सी-सेक्शन एक सर्जिकल प्रक्रिया है जिसका उपयोग पेट और गर्भाशय में चीरे के माध्यम से बच्चे को जन्म देने के लिए किया जाता है। सिजेरियन (सी सेक्शन) डिलीवरी जो कभी गंभीर मामलों में प्रसूताओं के लिए वरदान बन कर आई थी, निजी अस्पतालों ने उसे व्यवसाय में बदलकर रख दिया है।

सिजेरियन पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट के मुताबिक निजी अस्पताल 45.5 % तक सिजेरियन डिलीवरी कर रहे हैं। वहीं सरकारी अस्पताल में सिजेरियन डिलिवरी 9.2 % है। यह हालात तब हैं, जब निजी अस्पताल आज भी सही आंकड़े सरकार को नहीं दे रहे हैं। इसमें भले ही 18.7% की गिरावट दर्ज़ की गयी है। बावजूद इसके निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत 45.5 है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 में यह आंकड़ा 64.1 % था।

सिर्फ 15 प्रतिशत केस में सिजेरियन की ज़रूरत

प्रयागराज जिले में अपना निजी क्लीनिक चलाने वाली गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ अपर्णा पाठक का कहना है कि 85-90 प्रतिशत मामलों में सिजेरियन की ज़रूरत नहीं होती। सिजेरियन डिलिवरी अंतिम विकल्प या अति जटिलता की हालत में ही होनी चाहिए। वो आगे कहती हैं कि सिजेरियन का मुख्य उद्देश्य मां और बच्चे की सुरक्षा से जुड़ा होता है। दोनों में किसी तरह की रिस्क आने पर ही सिजेरियन को प्राथमिकता देना चाहिए।

चिकित्सकीय रूप से, डॉक्टरों को ब्रीच पोजीशन (बच्चा उल्टा या आड़ा तिरछा होने) जैसे मामलों में सिजेरियन प्रक्रिया अपनाने की ज़रूरत होती है। अन्य मामले जटिल गर्भधारण करने, जहां या तो मां का बीमारी का इतिहास है या बच्चे को असामान्यताओं के साथ पैदा होने का संदेह है। जब बच्चा गर्भाशय में रहते हुए मेकोनियम स्टूल पास करता है। ऐसे मामलों में तुरंत सी-सेक्शन का विकल्प चुनने की ज़रूरत होती है।

स्वास्थ्य बीमा के चलते बढ़ा चलन

सामान्य प्रसव का ख़र्च एक औसत दर्जे के निजी अस्पताल में जहां 15 हज़ार के आस-पास है। वहीं सिजेरियन के मामले में यह 40 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक है। स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के बढ़ते प्रसार के साथ ही सिजेरियन की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई। सामान्य स्वास्थ्य बीमा के मामले में कंपनियां सिजेरियन डिलीवरी के लिए कम ही भुगतान करती हैं, लेकिन अस्पताल दूसरे ख़र्चे जोड़कर इसे बड़ी आसानी से ज्यादा कर देते हैं।

आम तौर पर प्रसूति के दौरान महज 10-15% केसेस में ही सर्जरी की ज़रूरत होती है। लेकिन फाइवस्टार सुविधायुक्त अस्पतालों की बाढ़ और कैशलेस इंश्योरेंस के चलन के साथ ही सिजेरियन डिलिवरी की दर में इजाफ़ा हुआ है। दरअसल सिजेरियन डिलिवरी से जुड़ी दवाएं और उससे संबंधित उपकरण एक बड़े व्यवसाय का रूप ले चुके हैं। दवा कंपनियों की ओर से विभिन्न तरीकों से डॉक्टरों और अस्पतालों तक पहुंचने वाले कमीशन की भी सिजेरियन के मामले बढ़ाने में बड़ी भूमिका है।

क्या कहते हैं विभिन्न अध्ययन?

चार साल पहले 2018-19 में आईआईएम अहमदाबाद ने देश भर में प्रसूति पर अध्ययन करके बताया कि देश में एक साल में निजी अस्पतालों में हुए कुल 70 लाख प्रसव में से 9 लाख प्रसव बिना पूर्व योजना के सी-सेक्शन के जरिए हुए। जबकि इन्हें रोका जा सकता है। ये ऑपरेशन पैसे कमाने के लिए किए गये। ये बातें आईआईएम अहमदाबाद के फैकल्टी सदस्य अंबरीश डोंगरे और छात्र मितुल सुराना ने अपने अध्ययन में कहा था।

आईआईएम-अहमदाबाद के अध्ययन के आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2015-16 में हुए चौथे चरण के सर्वे पर आधारित थे। सरकारी स्वास्थ्य सर्वेंक्षण में पाया गया था कि देश के निजी अस्पतालों में 40.9% और सरकारी अस्पतालों में 11.9% सी-सेक्शन प्रसव हुए। आईआईएम ने अपने अध्ययन में साफ कहा था कि सी-सेक्शन के जरिए प्रसव कराने के पीछे मुख्य वजह ‘वित्तीय लाभ’ कमाना था।

‘टू मच केयर? प्राइवेट हेल्थ केयर सेक्टर एंड सर्जिकल इंटरवेंशंस ड्युरिंग चाइल्डबर्थ इन इंडिया’ शीर्षक से किए गये अध्ययन में पाया गया कि निजी अस्पतालों में सी-सेक्शन से डिलिवरी की संभावना सरकारी अस्पताल की तुलना में 14% अधिक होती है। अध्ययन में बताया गया कि सिजेरियन डिलिवरी से संबंधित परिवार पर आर्थिक दबाव तो पड़ता ही है। साथ ही नवजात को स्तनपान कराने में देरी होती है। इससे बच्चों का वजन कम हुआ और उन्हें सांस लेने में तकलीफ़ भी हुयी। साथ ही नवजात बच्चों को अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ा।

साल 2018-19 में ही एक लैंसेट जर्नल में भी तीन शोधपत्र छपे थे जिनमें भारत में बढ़ते सिजेरियन डिलिवरी को लेकर खुलासा किया गया था। भारत में साल 2005-06 में सिजेरियन डिलिवरी का आंकड़ा 9% था जोकि साल 2015-16 में बढ़कर 18.5% हो गया। शोधकर्ताओं में शामिल बेल्जियम के गेंट विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कहा था कि मध्य और उच्च आय वाले देशों में ऑपरेशन से प्रसव कराने की तकनीकि का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है।

मार्च 2019 में मेडिकल जर्नल जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित शोध के अनुसार, भारत में सिजेरियन जन्म दर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित बेंचमार्क से ऊपर है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि सिजेरियन डिलिवरी की दर भारत में बढ़ रही है और पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की 10-15 % की सीमा को पार कर चुकी है।

फ्रेंच रिसर्च इंस्टीट्यूट डेवलपमेंट (आईआरडी) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में आगे बताया है कि भारत ने 2010 से 2016 तक 18 लाख सिजेरियन डिलिवरी की वार्षिक अधिकता दर्ज़ की जोकि अधिक उन्नत क्षेत्रों और समृद्ध वर्गों में केंद्रित है। इस अध्ययन में बताया गया था कि ठीक इसी अवधि के दौरान, भारत ने वंचित क्षेत्रों और वंचित आबादी में 0.5 मिलियन सिजेरियन जन्मों की वार्षिक कमी दर्ज़ की, जिनके बीच घर पर डिलीवरी लगातार होती रही और सिजेरियन की दर कम रही।

यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत एक दोहरी समस्या से जूझ रहा है। जहां ज़रूरतमंद ग़रीब समुदायों में सिजेरियन डिलीवरी तक पहुंच की कमी है वहीं अधिक संपन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में सिजेरियन डिलीवरी के जबर्दस्ती बढ़ते उपयोग का सामना करना पड़ रहा है।

डब्लूएचओ की गाइडलाइंस का उल्लंघन

भारत में सी-सेक्शन का बढ़ता चलन डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइंस का उल्लंघन करता है, जो कहती है कि किसी भी देश में इस तरह के प्रसव 10-15% से अधिक नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली की रिपोर्ट बताती है कि निजी सुविधाओं में सी-सेक्शन डिलीवरी का उच्च प्रतिशत पाया गया था। सार्वजनिक अस्पतालों में सी-सेक्शन डिलीवरी की तुलना में निजी अस्पतालों में सी-सेक्शन डिलीवरी के बहुत अधिक प्रतिशत का चलन है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अनावश्यक सिजेरियन सेक्शन एक अतिभारित स्वास्थ्य प्रणाली में संसाधनों को अन्य सेवाओं से दूर खींच लेता है। बता दें कि स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली देश भर में सुविधा स्तर के स्वास्थ्य डेटा के लिए सूचना का एक विशेष स्रोत है।

कौन राज्य हैं आगे

मार्च 2022 तक एचएमआईएस में रिपोर्ट किए गए निजी संस्थानों में सी-सेक्शन प्रसव का उच्चतम प्रतिशत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में दर्ज़ किया गया, इसके बाद लगातार दो वर्षों तक त्रिपुरा का स्थान रहा। 2020-21 में, अंडमान ने निजी सुविधाओं में 95.45 प्रतिशत सिजेरियन प्रसव की सूचना दी, अगले वर्ष यह बढ़कर 95.56 प्रतिशत हो गया। इसी तरह, त्रिपुरा ने 2020-21 में ऐसी डिलीवरी का 93.72 प्रतिशत दर्ज किया। 2021-22 में यह आंकड़ा 93.03 फीसदी पर पहुंच गया।

पश्चिम बंगाल और ओडिशा ने निजी सुविधाओं में किए गए सी-सेक्शन मामलों के उच्च प्रतिशत की सूचना दी है। जबकि पश्चिम बंगाल ने 2021-22 में 83.88 प्रतिशत मामले दर्ज किए, उसी वर्ष ओडिशा ने 74.62 प्रतिशत मामले दर्ज़ किए। कई राज्यों ने निजी सुविधाओं में इन दो वर्षों में सी-सेक्शन में पांच से 10% की वृद्धि देखी।

महाराष्ट्र सरकार ने लिखा पत्र

दिसंबर 2022 में महाराष्ट्र सरकार के परिवार कल्याण विभाग ने स्त्री रोग विशेषज्ञों के पेशेवर संगठनों से निजी अस्पतालों में सिजेरियन सेक्शन जन्मों की संख्या को कम करने में मदद करने के लिए कहा है। पिछले वर्ष महाराष्ट्र के निजी अस्पतालों में लगभग 35% डिलीवरी सी-सेक्शन के माध्यम से हुई हैं।

विभाग ने ज़ोर देकर कहा है कि सिजेरियन प्रक्रिया का उपयोग केवल संकेत दिए जाने पर ही किया जाना चाहिए। डब्लूएचओ ने दस संकेत बताए हैं जिनके आधार पर सिजेरियन का निर्णय लिया जाना चाहिए। इन्हें रॉबसन क्राइटेरिया कहा जाता है। डब्ल्यूएचओ की 137 देशों के आंकडे की रिपोर्ट में यह तथ्य पाया गया है कि विश्व में भर में केवल 14 देश ही ऐसे हैं जहां मानक के अनुरूप सिजेरियन किया जाता है।

सरकारी अस्पताल के आंकड़े

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस) के तहत एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 में कुल जन्मों में से 14 प्रतिशत से अधिक सी-सेक्शन के माध्यम से हुए थे यानी लगभग 19 लाख जन्म सी-सेक्शन के माध्यम से हुए थे। ये सार्वजनिक अस्पतालों का आंकड़ा है। साल 2010 के पहले यह संख्या वर्तमान के आधे से भी कम थी। 2008-09 में, सार्वजनिक अस्पतालों ने कुल 73.13 लाख बच्चों के जन्म दर्ज़ किए, जिनमें से 4.61 लाख सी-सेक्शन थे। जो 6% के आस-पास था।

नुकसान और फायदे

नॉर्मल डिलीवरी जच्चा और बच्चा दोनों के भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित होती है। इससे भविष्य में महिला को किसी तरह की दिक्कत या फिर परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। वहीं सिजेरियन डिलीवरी में सर्जिकल कॉम्प्लिकेशन होने की संभावना रहती है। अगर पहला बच्चा सिजेरियन से हुआ है तो दूसरा बच्चा भी सिजेरियन से होने की उम्मीद बढ़ जाती है। बार-बार शरीर पर कट लगने से महिला को भविष्य में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

आईआईएम, अहमदाबाद के अध्ययन में कहा गया है कि सिजेरियन के बाद नवजात शिशु को देर से स्तनपान कराना, जन्म के समय वजन कम होना, श्वसन रुग्णता, अस्पताल में भर्ती होने की दर में वृद्धि, कम अपगार स्कोर और लंबे समय में इसका प्रभाव दिखाई पड़ता है।

हालांकि, सिजेरियन सेक्शन को एक जीवन रक्षक प्रक्रिया भी माना जाता है। जब गर्भावस्था की जटिलताओं के दौरान सामान्य प्रसव चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यदि दुरुपयोग न किया जाए तो सी-सेक्शन एक चिकित्सा वरदान है। खासतौर पर जब बच्चे की असामान्य स्थिति जैसे विभिन्न कारणों से प्राकृतिक, योनि प्रसव में जटिलताएं होती हैं।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, चिकित्सकों को किसी दिए गए लक्ष्य या दर को पूरा करने के लिए विशुद्ध रूप से सीजेरियन सेक्शन नहीं करना चाहिए, बल्कि मरीजों की ज़रूरतों पर ध्यान देना चाहिए। सिजेरियन सेक्शन महत्वपूर्ण जटिलताओं, विकलांगता या मृत्यु का कारण बन सकता है, विशेष रूप से उन हॉस्पिटल सेटअप में जहां सुरक्षित सर्जरी करने या संभावित जटिलताओं का इलाज करने की सुविधाओं की कमी होती है। ऐसे कई मामले हाल ही में सामने आये हैं।

निजी अस्पतालों और प्राइवेट डॉक्टर्स की दलीलें

प्रसव सिजेरियन हो या नॉर्मल? ये सवाल कई पहलुओं से जुड़ा है। डॉक्टरों का कहना है कि इसके लिए खुद गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों का डर और रिस्क न उठाने की प्रवृत्ति जिम्मेदार है। डॉक्टर और अस्पताल तो हर परिस्थिति से मरीज़ और उनके परिजनों को अपडेट करते हैं बस। निर्णय डॉक्टरों को नहीं परिवार को करना होता है। हालांकि इसका दूसरा पहलू ये है कि डॉक्टर्स की काउंसलिंग पर ही ये निर्भर करता है कि मरीज कौन सा विकल्प चुनता है। निजी अस्पताल गर्भ में बच्चे की स्थिति को लेकर ख़ौफ का माहौल पैदा करते हैं और सी-सेक्शन के लिए फोर्स करते हैं।

निजी अस्पताल के डॉक्टरों की दलील है कि यह सही काउंसलिंग से नॉर्मल प्रसव संभव है लेकिन प्राइवेट डॉक्टर जोख़िम नहीं लेना चाहते। मेडिको लीगल केसेज के चलते डॉक्टर्स एक खौफ में रहते हैं। वे हर चीज के बारे में मरीज को आगाह करते हैं और मरीज भयभीत होकर सिजेरियन का फैसला ले लेते हैं। परिजन शत प्रतिशत गारंटी चाहते हैं जो कि मुमकिन नहीं है।

सिजेरियन सेक्शन के लिए जो सामान्य कारण परिजनों को बताये जाते हैं उनमें बच्चे के गले में आंवल नाल (कॉर्ड) लिपट गया है, बच्चा आड़ा, तिरछा या उल्टा हो गया है, बच्चे का आकार बड़ा है, बच्चे की धड़कन अनियमित है। बच्चे ने गर्भ में पॉटी कर दिया है आदि प्रमुख हैं।

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, सी-सेक्शन की स्वैच्छिक मांग के कारण रोगियों की दर्द सीमा तेजी से गिर रही है। प्राइवेट डॉक्टर की दलील है कि 10 में 6 महिलाएं सामान्य प्रसव मार्ग के बदले सी-सेक्शन को तरजीह देती हैं क्योंकि वे दर्द को सहन करने में विफल होती हैं। यहां तक कि रिश्तेदारों के परामर्श और प्रेरणा के बावजूद गर्भवती महिलाएं सी-सेक्शन का विकल्प चुनने का अनुरोध करती हैं।

लॉकडाउन में कम हुआ सिजेरियन

कोविड महामारी के दौरान लगाये गये लॉकडाउन के चलते सिजेरियन डिलीवरी का स्थान सामान्य डिलीवरी ने ले लिया था। इस दौरान 64-90 % तक सिजेरियन डिलिवरी में कमी दर्ज़ की गयी। कोरोना की मार, लॉकडाउन का दौर और उसके बाद भी कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के चलते सिजेरियन डिलिवरी का रिस्क अस्पताल और प्रसूताएं दोनों ही लेने को तैयार नहीं थे।

शायद यही कारण है कि कोरोना के कारण महिलाओं और नवजात बच्चों को बड़ी राहत इस मायने में मिली क्योंकि सिजेरियन के कारण मां और बच्चा दोनों को ही तकलीफ होती है। जटिलताओं की भी आशंका रहती है। इसे कोरोना का सकारात्मक साइड इफेक्ट माना जा सकता है कि उस दौरान सिजेरियन डिलिवरी में अप्रत्याशित कमी दर्ज़ की गयी।

(प्रयागराज से सुशील मानव की रिपोर्ट)

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