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ब्रिटेन में फेल हो गया रेलवे का निजीकरण

भारत में रेलवे का निजीकरण हो रहा है। वहीं 1980 के दशक में रेलवे को निजी करने वाले ब्रिटेन में यह पूरी तरह फेल हो गया है। एक के बाद एक लाइनों को वापस राष्ट्रीयकृत करना पड़ रहा है, क्योंकि निजी पूंजीपतियों ने महंगे किरायों पर मुनाफा लूटकर रेल सेवाओं के ढांचे को ही बरबाद कर दिया है। अब एक मार्च से मैंचेस्टर-लिवरपूल क्षेत्र की नॉर्दर्न रेल को सरकार अपने हाथों में ले रही है। दो साल पहले एक और लाइन के राष्ट्रीयकरण पर लिखी यह पोस्ट दोबारा पढ़िए…

बात ब्रिटेन की है पर कहानी दुनिया भर की है। ब्रिटेन में मारग्रेट थैचर ने रेल का निजीकरण किया था। अब उसी कंजरवेटिव पार्टी की टेरेजा में सरकार उसका वापस राष्ट्रीयकरण कर रही है। जब निजीकरण हुआ तो बनी-बनाई रेलवे लाइनें, रेलगाड़ियां और पूरा ढांचा निजी क्षेत्र को बिना इकन्नी खर्च हुए मिला। उन्हें बस सालाना शुल्क देना था।

उन्होंने कुछ साल में ही भाड़ा तीन गुना बढ़ा दिया, पर उन्हें हमेशा ‘घाटा’ ही होता रहा! सरकार उन्हें और रियायतें देती रही, पर घाटा होता रहा, भाड़ा भी बढ़ता रहा!! पर कमाल की बात ये कि वे घाटे के बावजूद भी ‘देश सेवा’ में रेल को चलाते रहे, और इतने घाटे के बावजूद भी निजी क्षेत्र के मालिक और भी दौलतमंद बनते गए!!!

इन्हीं मालिकों में से एक रिचर्ड ब्रांसन है, जिसकी वर्जिन एयरलाइन के बारे में भारत में भी बहुत से लोग वाकिफ हैं। ब्रांसन की कंपनी भी लंदन से लीड्स, न्यूकैसल, ग्लासगो की पूर्वी तटीय रेल को ‘घाटे’ में चलाती रही और ब्रांसन ‘घाटे’ में रहते हुए भी जमीन से आसमान में नए-नए कारोबार शुरू करता रहा, और अमीर बनता गया।

कुछ दिन पूर्व अचानक ब्रांसन ने ऐलान कर दिया कि अब उसे और घाटा बर्दाश्त नहीं, इसलिए अब वह शुल्क नहीं दे सकता। तो सरकार ने क्या किया? आज उस कंपनी का राष्ट्रीयकरण हो गया है। कंपनी को उसकी सारी देनदारियों समेत सरकार ने ले लिया। यहां तक कि कंपनी के सारे प्रबंधक उन्हीं पदों और वेतन पर बने रहे।

जब तक कारोबार में दिखावटी घाटे के बावजूद मलाई मौजूद थी, कंपनी निजी रही। जब मलाई खत्म हुई और असली वाला घाटा शुरू हुआ तो घाटे का ‘राष्ट्रीयकरण’ कर दिया गया! कमाल की बात यह कि लंदन से बर्मिंघम, मैंचेस्टर, लिवरपुल की पश्चिम तट रेल भी ब्रांसन की ही दूसरे नाम की कंपनी के पास है, पर उसका राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ, क्योंकि ब्रांसन ने उसे चलाने से मना नहीं किया (वहां अभी मलाई की गुंजाइश बाकी है!) अर्थात कौन कंपनी निजी रहे, किसका राष्ट्रीयकरण हो यह तय ब्रांसन कर रहा है। सरकार सिर्फ फैसले पर अमल कर रही है!

यही पूंजीवाद में निजीकरण-राष्ट्रीयकरण की नीति का मूल है। जब पूंजीपतियों को निजीकरण से लाभ हो तो सरकारें प्रतियोगिता को प्रोत्साहन देने के नाम पर निजीकरण करने लगती हैं; जब पूंजीपतियों को राष्ट्रीयकरण में फायदा दिखे तो सरकारें ‘समाजवाद’ और ‘कल्याण’ की बातें करने लगती हैं। दुनिया भर के संसदीय वामपंथी इसे ही ‘शांतिपूर्ण रास्ते से समाजवाद’ की ओर अग्रसर होना बताकर वाह-वाह में जुट जाते हैं।’

मुकेश असीम

This post was last modified on February 6, 2020 1:12 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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