पंजाब के 11 संगठनों ने कश्मीरियों के साथ दिखायी एकजुटता, मोर्चा गठित कर किया संघर्ष का ऐलान

नई दिल्ली। कश्मीरियों पर होने वाले दमन का प्रतिरोध करने और उनके अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए पंजाब के 11 जनसंगठनों ने मिलकर एक मोर्चे का गठन किया है। सौलिडैरिटी कमेटी फॉर कश्मीरी नेशनल स्ट्रगल के नाम से बने इस संगठन के नेतृत्व में 15 सितंबर को पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में एक बड़ा प्रदर्शन रखा गया है। उसके पहले राज्य में जगह-जगह पर विरोध-प्रदर्शन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस मोर्चे में छात्रों, किसानों, महिलाओं के अलावा जनता के बुनियादी सवालों पर लड़ाई लड़ने वाले संगठन शामिल हैं।

कमेटी ने सभी न्यायपसंद लोगों से कश्मीर की उत्पीड़ित जनता के साथ खड़े होने का आह्वान किया है। कमेटी ने कहा है कि यही पंजाब की विरासत रही है और जरूरत के इस मौके पर सभी लोगों को अपने पड़ोसी भाई के साथ खड़ा होना चाहिए।

प्रेस को जारी बयान में किसान नेता झंडा सिंह जेठुके, कंवलप्रीत सिंह पांजु और औद्योगिक मजदूरों के नेता लखविंदर ने कहा कि 1947 के पहले कश्मीर एक अलग राज्य था। अस्थाई समझौते के तहत 1947 में उस समय की भारत की सरकार ने कश्मीरी लोगों को जनमत संग्रह का भरोसा दिया था। जिससे वो अपने भविष्य का फैसला खुद कर सकते थे। लेकिन भारतीय राज्य अपने वादे से पीछे हट गया। और कहा जाए तो पिछले 72 सालों से भारत कश्मीर पर फौज के बल पर शासन कर रहा है। और इन्हीं स्थितियों में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 को शामिल किया गया था।

लेकिन तब की सरकारें जो कश्मीर पर जबरन कब्जा करना चाहती थीं धीरे-धीरे इससे छेड़छाड़ करना शुरू कर दीं। लेकिन अब बीजेपी ने कब्जे की अपनी शैतानी मंशा को खुलकर जाहिर करते हुए उसे पूरी तरह से खत्म कर दिया। और 35-ए को समाप्त कर भारतीय राज्य ने पूरे सूबे को गैर कश्मीरियों और कॉरपोरेट लूट के लिए खोल दिया है।

जनमत संग्रह की बात तो दूर बीजेपी उन्हें शासन संचालित करने के लिए अपनी एक विधानसभा तक देने के लिए तैयार नहीं है। और यह सब कुछ खत्म करने से पहले देश तक को भरोसे में नहीं लिया गया। और एकाएक पूरे जम्मू-कश्मीर को जेल में तब्दील कर दिया गया। अभी भी जबकि एक माह बीत गए हैं मोबाइल, इंटरनेट से लेकर संचार की दूसरी सुविधाओं को ठप कर केंद्र ने कथित लोकतांत्रिक फैसले की कलई खोल दी है। सेना की तादाद में अतिरिक्त बढ़ोत्तरी कर दी गयी और सैकड़ों राजनीतिक कर्मियों को जेल की सींखचों के पीछे डाल दिया गया। मीडिया को लाइव रिपोर्ट तक भेजने से मना कर दिया गया है। लेकिन यह सब कुछ कश्मीरियों के गुस्से और प्रतिरोध को नहीं रोक पाएगा। इससे लोगों का गुस्सा और बढ़ेगा। इतनी कड़ी पाबंदियों के बाद भी कश्मीरी सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। भले ही उन्हें पैलेट गन का निशाना बनना पड़ रहा है और उसमें सैकड़ों लोग घायल भी हो रहे हैं।

कमेटी ने कहा कि अपने राजनीतिक हितों की रक्षा और कारपोरेट मास्टरों को खुश करने के लिए बीजेपी फासीवादी रास्ते का सहारा लेकर आंदोलन को कुलचने की कोशिश कर रही है। बीजेपी ने अपने दूसरे काल में फासिस्ट हमले को और तेज कर दिया है। बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए मुस्लिम और पाकिस्तान विरोधी हिस्टीरिया को पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

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कश्मीरियों पर हमला वास्तव में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि सरकार कश्मीर की स्थिति से निपटने में पूरी तरह से नाकाम रही है। यह नाकामी हताशा के साथ-साथ कश्मीरियों के और ज्यादा उत्पीड़न के तौर पर सामने आ रहा है। रेप, फेक एनकाउंटर और राजनीतिक हत्याएं इसके दूसरे रूप हैं। कमेटी ने कहा कि पड़ोस के भाइयों के ऊपर हो रहा उत्पीड़न पंजाब के लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए बेहद चिंता का विषय है। इस इलाके के क्रांतिकारी आंदोलनों की दुनिया के उत्पीड़त तबकों के साथ खड़े होने की शानदार विरासत रही है और हमें उस परंपरा को बनाए रखने की जरूरत है।

इस मौके पर संगठनों के नेताओं ने पंजाब में पढ़ने वाले कश्मीर के छात्रों और काम करने वाले कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा कि उन पर होने वाले किसी भी तरह के उत्पीड़न के खिलाफ वो खड़े होंगे। और वो उन्हें किसी भी तरह का सहयोग देने के लिए तैयार हैं।

कमेटी में शामिल संगठनों में पंजाब खेत मजदूर यूनियन, नौजवान भारत सभा, पंजाब स्टूडेंट यूनियन (ललकार), कारखाना मजदूर यूनियन, भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्रहन), किसान संघर्ष कमेटी पंजाब, पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन (शहीद रंधावा), पेंडू मजदूर यूनियन (अश्विनी घुड्डा) और मोल्डर एंड स्टील वर्कर्स यूनियन शामिल थे।

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