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ग़रीबों-वंचितों के गीत से धार्मिक भावना आहत!

पंजाबी गीत`मेरा की कसूर` से परेशानी की वजह क्या है? यही न कि यह गीत गरीबों के साथ अन्याय, मेहनत की लूट, जात-पात और छुआछूत की शर्मनाक कारगुज़ारियों पर सीधे सवाल खड़ा करता है? गीत में गाय के मूत्र के ज़िक्र पर धार्मिक भावनाएं आहत कर देने का आरोप लगाने वालों के पास क्या इस गीत में गाए गए उन सवालों का जवाब है जिनसे जूझते हुए ही गुरु नानक जैसे संतों ने एक सच्ची इंसानी राह दिखाई थी?

‘ओ जे मैं माडे घर जमिया ते मेरा की कसूर या’ पंक्ति से शुरू होने वाला यह गीत बेहद मार्मिक है। इससे जुड़े लोग पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के जाने-पहचाने नाम हैं और उनका राब्ता बॉलीवुड से भी है। रणजीत बावा द्वारा गाये गए इस गीत को बीर सिंह ने लिखा है और इसकी धुन गुरमोह ने बनाई है। गीत के शनिवार को यूट्यूब पर रिलीज होते ही इस पर हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा दिया गया। इतवार रात को भाजपा युवा विंग भाजयुमो के नेता और वकील अशोक सरीन हिक्की ने जालंधर पुलिस के पास इस गीत से जुड़े लोगों के खिलाफ़ शिकायत दी।

अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक, सरीन ने बताया कि गायक रणजीत बावा, गीतकार बीर सिंह, संगीतकार गुरमोह आदि के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई गई है। सरीन ने आरोप लगाया है कि इस गीत से हिंदू समाज की आस्था को ठेस पहुंची है। शिकायतकर्ता ने गायक के खिलाफ सख़्त कार्रवाई करने और गीत को यूट्यूब से हटवाने की मांग की है। सोशल मीडिया पर भी इस गीत में गौमूत्र के ज़िक्र पर आपत्ति जताते हुए अभियान चलाया गया है।

हैरानी की बात यह है कि जिस गीत को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, उसमें आए सवाल न नए हैं और न काल्पनिक। गुरु नानक ने ग़रीबों और धार्मिक पाखंडों के शिकार जन के पक्ष में आवाज़ बुलंद करते हुए ही बराबरी और मुहब्बत की राह दिखाई थी। गुरु ग्रन्थ साहब में दलित संतों की वाणी मुखर रूप से है। इस रौशन परंपरा के बावजूद यह विडंबना है कि पंजाब में भी चमक-दमक भरी समृद्धि के शोर के बीच ग़रीबी और जातिगत भेदभाव का नासूर ख़त्म नहीं हो सका। इस गीत में दलित संतों का हवाला भी दिया गया है। यह गीत बेहद तीखे प्रतिरोध के रूप में भी और बेहद मार्मिक विवरण के रूप में भी असर छोड़ता है। इस गीत की खास बात है कि अपने सवालों में यह गीत केवल पंजाब का गीत नहीं रह जाता है बल्कि पूरे समाज को ही संबोधित करता है।

पंजाबी आसानी से समझने वालों को तो कोई दिक्कत ही नहीं होगी लेकिन जो पंजाबी ठीक से नहीं समझते हैं, वे इस गीत को हिन्दी में पढ़कर समझ सकते हैं कि गीत आखिर कह क्या रहा है।

कैसी तेरी मत (मति) कैसी तेरी बुद्धि है
भूखों को मुक्का (घूंसा), पत्थरों को दूध है
अगर मैं थोड़ा और बोला तो युद्ध हो जाना है
गरीब का साया भी माडा (बुरा) मानते हो
और गाय का मूत्र तुम्हारे लिए शुद्ध है
चलो माना कि आप शक्तिशाली हो
लेकिन मैं माडे (गरीब-वंचित) घर में पैदा हुआ
इसमें मेरा क्या कसूर है?

गातरे जनेऊ और क्रॉस गले डाल लिए
विचार अपनाए नहीं, सिर्फ बाने (कपड़े) अपना लिए हैं
चौधर की भूख में आपके सारे उसूल डगमगा गए हैं
गौत्रों के हिसाब से गुरुद्वारे भी बना लिए हैं
धन्ने भगत और रविदास की कही बातों को झुठला कर दिखाओ पहले
फिर हम भी मानने को तैयार हैं कि गरीब लोगों की सोच भी गरीब होती है
अगर मैं माड़े घर में पैदा हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर है ।।

बंद कमरे में बहती हवाओं को रोक लो
चांद, सूरज और सितारों को छत में जड़वा लो
पानी नदी और समंदर का सुराही में भर लो
हमारी परछाई भी ना पड़े इसलिए अन्न को अपने आंगन में उगा लो
हम फिर अपने आप मर जाएंगे अगर तुम ये पाबंदी लगा लोगे, तुम हमें हाथों से मारोगे तो हाथ भी मैले हो जाएंगे हमें छूने से
अगर मैं माड़े घर मैं पैदा हुआ हूं तो इसमें मेरा क्या कसूर है ?

साहूकारों, हम जानते हैं तुम्हें किसी भी प्रकार की कोई कमी तंगी नहीं है
लेकिन अन्न, पानी, कपड़े और छत की तो हमें भी ज़रूरत है
घर छोटे-दिल बड़े, बात साफ, बिना घुमाए-फिराये कही है
तुम्हारे क़त्ल जैसे जुर्म भी माफ हैं और हमारी झूठ जो लोग आम बोलते रहते हैं, भी माफ़ नहीं
अमीरों को और अमीर और गरीबों को और रौंदता है, ये आपके शहरों का दस्तूर है
अगर मैं माड़े घर में पैदा हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर है।

(मूल रूप से जींद (हरियाणा) के निवासी संजय सैनी संजू चंडीगढ़ में रहते हैं और पंजाबी फिल्मों के लिए लिखते हैं।)

This post was last modified on May 6, 2020 6:47 pm

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