Monday, December 5, 2022

जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम को लेकर टकराव की आशंका, सुप्रीम कोर्ट समीक्षा को राजी 

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एक ओर मोदी सरकार ने कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना कर रुख साफ कर दिया है कि वो जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में शामिल होना चाहती है। दूसरी ओर नए चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसमें पारदर्शिता लाने की बात कहकर किसी भी तरह से बदलाव से इनकार कर दिया है। साल 2015 में जब राष्ट्रीय न्यायिक आयोग को खारिज किया गया था तो लंबी बहस चली थी । लेकिन एक बार फिर ऐसा लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच टकराव की जमीन तैयार हो रही है। इस बीच चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका को सूचीबद्ध करने पर सहमत हो गए हैं। 

याचिका न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक नई व्यवस्था की मांग करती है। एडवोकेट मैथ्यूज जे नेदुमपारा ने सीजेआई की खंडपीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख किया था। पीठ में जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस जेबी पारदीवाला भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश नेदुमपारा ने कहा कि 2015 के फैसले ने कॉलेजियम प्रणाली को पुनर्जीवित किया था, जिसे शुरू से ही अमान्य कर दिया जाना चाहिए था। 

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने माना कि कॉलेजियम प्रणाली, जिसे सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ के फैसले के द्वारा लाया गया था, की भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका में समीक्षा की जा सकती है। बहरहाल, उन्होंने वकील को आश्वासन दिया कि इसे समय के साथ देखा और सूचीबद्ध किया जाएगा। 

याचिका के अनुसार, उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप को पूरी तरह से दूर रखने में और सबसे अच्छे और सबसे योग्य जजों की नियुक्ति में पूरी तरह से विफल रही है और इसके बजाय, इसके जरिए उच्च न्यायपालिका के जजों के प्रतिष्ठित पद पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वर्तमान और पूर्व जजों, उनके कनिष्ठों, प्रतिष्ठित वकीलों के परिजनों का एकाधिकार हुआ है। 

याचिका की मुख्य प्रार्थना परमादेश रिट या कोई अन्य उपयुक्त रिट, आदेश या निर्देश जारी करना है, जो यूनियन ऑफ इंडिया को एक गैर-सरकारी/गैर-विभागीय सार्वज‌निक इकाई के निर्माण के लिए इस तरह के विधायी या प्रशासनिक उपायों को अस्तित्व में लाने का निर्देश देता है, एक ऐसा न्यायिक नियुक्ति आयोग हो जो सभी योग्य उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित करके उच्च न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों का चयन करने के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों से स्वतंत्र हो। 

सुप्रीम कोर्ट के जज डी वाई चंद्रचूड़ ने देश के प्रधान न्यायाधीश के तौर पर पदभार ग्रहण कर लिया है। 9 नवंबर 2022, बुधवार को राष्ट्रपति दौपद्री मुर्मू ने उन्हें इस पद की शपथ दिलाई। देश के 50वें चीफ जस्टिस बनने के बाद उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम की वकालत की है। उन्होंने कहा कि ये सिस्टम न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। उनका कहना ये भी है कि वो कॉलोजियम सिस्टम में अधिक पारदर्शिता का समर्थन करते हैं। 

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि कोई भी संवैधानिक संस्था या मॉडल सही नहीं होता, लेकिन हमें उसकी कमियों को दूर करके और आलोचना के प्रति उत्तरदायी होकर कॉलेजियम प्रणाली को मजबूत करने की ज़रूरत है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि न्यायिक प्रणाली में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए साल 1993 में कॉलेजियम सिस्टम को लागू किया गया और साल 1998 में इस प्रणाली का देश के तत्कालीन राष्ट्रपति ने विस्तार दिया। उसी समय सुप्रीम कोर्ट के 5 सदस्यों की एक टीम बनाई गई थी। कॉलेजियम सिस्टम के जरिए न्यायाधीशों की नियुक्ति निष्पक्ष रूप से की जाती है साथ ही ये कानून के शासन को भी सुनिश्चित करता है। जस्टिस चंद्रचूड़ का कहना है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।

दरअसल केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री किरेन रिरिजू ने कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि लोग जजों की नियुक्ति के लिए बने कॉलेजियम सिस्टम से खुश नहीं हैं। जज आधा समय नियुक्तियों की पेचिदगियों में ही व्यस्त रहते हैं, जिसकी वजह से न्याय देने की उनकी जो मुख्य जिम्मेदारी है उस पर असर पड़ता है।

उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए बनाए गए कॉलेजियम प्रणाली पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। लोग इस सिस्टम से खुश नहीं हैं।जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर एक सवाल के जवाब में रिजिजू ने कहा था कि साल 1993 तक भारत में जजों को भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से कानून मंत्रालय द्वारा नियुक्त किया जाता था। उस समय हमारे पास बहुत प्रतिष्ठित जज थे।

केंद्रीय मंत्री का कहना है कि देश में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं।कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों में बंधे हैं और न्यायपालिका उन्हें सुधारती है, लेकिन जब न्यायपालिका भटक जाती है तो उन्हें सुधारने का कोई उपाय नहीं है।

रिजिजू ने कॉलेजियम सिस्टम को गैर-पारदर्शी करार दिया है और आरोप लगाया है कॉलेजियम के सदस्य अपने आधार पर जजों की नियुक्ति करते हैं। इसमें जजों की नियुक्ति को लेकर गहन राजनीति चल रही है। न्यायपालिका में ये दिखाई नहीं देता। 

सुप्रीम कोर्ट और राज्यों के हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही कॉलेजियम सिस्टम को अस्तित्व में लाया गया,जिसमें उच्चतम न्यायालय के 4 जज होते हैं और CJI इसका नेतृत्व करते हैं। कॉलेजियम सिस्टम ही सुप्रीम कोर्ट और हाई कार्ट में जजों की नियुक्ति और उनके तबादले को लेकर निर्णय लेता है।कॉलेजियम सिस्टम के सदस्य जज ही नामों की सिफारिश कर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास भेजते हैं। 

साल 1990 में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों के बाद यह व्यवस्था बनाई गई थी और साल 1993 से इसी प्रणाली के जरिए उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति शुरू की गई।कॉलेजियम प्रणाली जिन जजों का चुनाव करती हैं उन्हें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और उनकी मंजूरी मिलने के बाद जजों की नियुक्ति की जाती है। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) में यह कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के जजों के परामर्श और राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद होगी। इसके अलावा अनुच्छेद 217 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति प्रधान न्यायाधीश, राष्ट्रपति और राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाएगी।

साल 1993 से पहले कॉलेजियम सिस्टम के बिना जजों की नियुक्ति की जाती थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श और केंद्रीय कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति करता था।लेकिन फिर जजों की नियुक्ति को लेकर कुछ ऐसे मामले सामने आए जिनकी सुनवाई के बाद कॉलेजियम सिस्टम लाया गया और इसमें मौजूद सुप्रीम जजों के परामर्श से नियुक्तियां की जा रही हैं।

इस विवाद को लेकर साल 2014  में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों का नियुक्ति और तबादलों को लेकर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम बनाया था। हालांकि एक साल बाद ही साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार कर दिया। जिसे लेकर कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग न्यायपालिका के कामकाज में हस्तक्षेप है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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