Tuesday, October 19, 2021

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टेलिकॉम सेक्टर में छह महीनों में जाने वाली हैं 50 हजार नौकरियां

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भारत के कॉर्पोरेट इतिहास में अभी तक का सबसे बड़ा तिमाही घाटा वोडाफोन-आइडिया झेल रही हैं। वोडाफोन-आइडिया को दूसरी तिमाही में 50 हजार 921 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। इससे पहले पिछले साल की दूसरी तिमाही में कंपनी को 4,947 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। इससे पहले टाटा मोटर्स ने अक्टूबर-दिसंबर 2018 की तिमाही में 26,961 करोड़ रुपये का तिमाही नुकसान दिखाया था। यह उस समय तक किसी भारतीय कंपनी का सबसे बड़ा तिमाही घाटा था।

इसी सप्ताह मूल रूप से आइडिया के मालिक आदित्य बिड़ला समूह ने कहा कि अगर सरकार समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) को लेकर 39,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की देनदारी पर बड़ी राहत नहीं देती, तो वह कंपनी में और निवेश नहीं करेगा। बिड़ला समूह को करीब 44,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा, क्योंकि कंपनी में उसकी 26 फीसदी हिस्सेदारी है। वोडाफोन-आइडिया की वित्तीय देनदारी आदित्य बिड़ला ग्रुप की सूचीबद्ध कंपनियों के उपलब्ध वित्तीय संसाधनों से कहीं अधिक है। उदाहरण के लिए, एवी बिड़ला समूह की तीन सूचीबद्ध कंपनियों- ग्रासिम, हिंडाल्को और आदित्य बिड़ला फैशन द्वारा सृजित कुल नकदी प्रवाह वित्त वर्ष 2019 में महज 611 करोड़ रुपये था।

वोडाफोन-आइडिया अगर बंद हो गई तो उसके शेयर धारकों के इक्विटी निवेश पर करीब 1.68 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। वोडाफोन-आइडिया में बैंकों का कुल ऋण इस साल मार्च के अंत में 1.25 लाख करोड़ रुपये था। टेलिकॉम कंपनियों पर बैंकों का भी काफी कर्ज है, इसलिए बैंकों के शेयरों में भी करीब पांच फीसदी गिरावट रही।

वोडाफोन-आइडिया का शेयर आजकल तीन रुपये 70 पैसे से 4 रुपये प्रति शेयर के बीच चल रहा है। इस हिसाब से कंपनी का बाजार पूंजीकरण 10 से 11 हजार करोड़ रुपये के बीच होता है, लेकिन बात सिर्फ वोडाफोन की ही नहीं है, एयरटेल की भी हालत खराब है। इन दो बड़े ऑपरेटरों से सरकार को सालाना 60,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है, अब वह भी खतरे में है।

टेलिकॉम कंपनी भारती एयरटेल को चालू वित्त वर्ष की जुलाई-सितंबर तिमाही में 23,045 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ है। यानी टेलिकॉम के दो महारथियों वोडाफोन-आइडिया और भारती एयरटेल को चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कुल मिलाकर करीब 74,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है।

एयरटेल और वोडाफोन-आईडिया जैसी कंपनियों पर अपनी लागत में कटौती करने का भारी दबाव है। ऐसे में इसका असर इस क्षेत्र में छंटनी के रूप में देखने को मिल सकता है। यह संकट अब टेलिकॉम कंपनियों में काम कर रहे दो लाख लोगों पर मंडरा रहा है।

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