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Friday, September 24, 2021

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अदालत ने महमूद प्राचा के यहां छापे के वीडियो फुटेज पेश करने को कहा

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दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली के दंगों से जुड़े मामलों से संबंधित एक जांच अधिकारी को समन जारी करके तलब किया है। साथ ही इस अधिकारी को दिल्ली पुलिस द्वारा दिल्ली दंगों और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के मामलों की पैरवी करने वाले वकील महमूद प्राचा के कार्यालय में छापेमारी की कार्रवाई के पूरे वीडियो फुटेज पेश करने को कहा है। पटियाला हाउस कोर्ट में ड्यूटी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अंशुल सिंघल ने यह आदेश वकील महमूद प्राचा के उस आवेदन पर दिया, जिसमें प्राचा ने गुरुवार को अपने कार्यालय में दिल्ली पुलिस द्वारा की गई छापेमारी के वीडियो फुटेज की प्रतियों को संरक्षित करने के लिए अनुरोध किया था।

प्राचा ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 165 (5) और 156 (3) के तहत एक आवेदन दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 93 के तहत एक आवेदन दायर किया है और आईओ को उक्त आवेदन पर जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया था और यह मामला ड्यूटी एमएम के समक्ष रखा गया था। अदालत ने महमूद प्राचा के ऑफिस में तलाशी के संबंध में शुक्रवार को दिल्ली पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।

सीआरपीसी की धारा 165 (5) में कहा गया है कि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा तलाशी की स्थिति में, किए गए किसी भी रिकॉर्ड की प्रतियों को निकटतम मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा, जिसे अपराध का संज्ञान लेने के लिए सशक्त किया जाएगा, और तलाशी के स्थान के मालिक या कब्जाधारी के आवेदन पर उसे तलाशी की एक प्रति मुफ्त दी जाएगी।

अदालत की निगरानी में जांच के लिए प्राचा ने भी प्रार्थना की है। जैसा कि ड्यूटी मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेश में दर्ज किया गया है, प्राचा ने अदालत को बताया कि जांच अधिकारी ने उसे धमकी दी कि वे उसके खिलाफ झूठे मामले दर्ज करेंगे। इसलिए, उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) के तहत एक आवेदन दायर करने के लिए विवश किया गया था, ताकि मामले की निरंतर निगरानी की जा सके।

इस बीच दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट ने दिल्ली दंगों के कुछ आरोपियों का केस लड़ रहे वकील महमूद प्राचा के खिलाफ निजामुद्दीन थाने में एफआईआर दर्ज की है। वकील प्राचा पर एक सरकारी कर्मचारी को आपराधिक बल का प्रयोग करके कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने का आरोप है। पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 186, 353 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की है। इससे पहले गुरुवार को पुलिस ने प्राचा के दफ्तर में छापे डाले थे।

पांच जनवरी तक स्टेटस रिपोर्ट मांगने के अलावा, अदालत ने मामले के जांच अधिकारी को प्राचा के ऑफिस परिसर में उनके द्वारा ली गई किसी तलाशी की पूरी वीडियो फुटेज के साथ सुनवाई की अगली तारीख 27 दिसंबर को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है।

प्राचा ने अदालत को बताया कि 24 दिसंबर को दोपहर 12 बजे से लेकर 25 दिसंबर को तड़के लगभग 03:00 बजे तक उनके ऑफिस में तलाशी ली गई और कानून के अनुसार जांच अधिकारी को संबंधित मजिस्ट्रेट को तलाशी और जब्त की गई सामग्री के बारे में बताना चाहिए, जिसके बाद अदालत ने यह निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि हालांकि, वह नहीं किया गया और इसलिए उन्होंने इस संबंध में एक अर्जी दायर की है। अदालत ने जांच अधिकारी को प्राचा की याचिका का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

महमूद प्राचा पर आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से एक फर्जी हलफनामा देने और हिंसा पीड़ितों को झूठे बयान देने के लिए मजबूर किया। आरोप ये भी है कि प्राचा ने एक अन्य वकील के हस्ताक्षर वाला शपथ पत्र आगे बढ़ाया था, जबकि वो वकील तीन साल पहले मर चुका था। अदालत ने इस संबंध में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को आदेश दिए, तभी पुलिस ने इस मामले में जांच शुरू की। अदालत ने उन्हें निर्देश दिया कि प्राचा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए स्पेशल सेल या अपराध शाखा को निर्देश जारी करें।

इस मामले पर जानकारी देते हुए स्पेशल सेल के स्पेशल सीपी नीरज ठाकुर ने बताया कि अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। अदालत द्वारा जारी किए गए सर्च वारंट को अमल में लाया गया। स्पेशल सेल ने यह कार्रवाई अदालत के आदेशों पर एक प्राथमिकी दर्ज करने के बाद की। स्पेशल सेल की टीम ने अदालत से सर्च वारंट मिलने के बाद प्राचा के ऑफिस में रेड की।

सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि वकील महमूद प्राचा को दिल्ली पुलिस इसलिए निशाना बना रही है कि वे दिल्ली दंगों में मुसलमानों की पैरवी कर रहे हैं? क्या वे गृह मंत्रालय के निशाने पर इसलिए हैं कि उन्होंने 22 आरएसएस कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ सबूत पेश कर उन्हें गिरफ़्तार करवाया था? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने न सिर्फ उनके दफ़्तर पर छापे मारे हैं, बल्कि प्राचा के अनुसार उनके सहयोगियों को पीटा है और उनसे बदतमीज़ी की है। मीडिया रिपोर्ट यह भी है कि दिल्ली पुलिस ने उनके कुछ मुवक्क़िलों पर दबाव बनाया है कि वे प्राचा को अपने मुक़दमों से हटा दें और वे मामले वापस ले लें।

सुप्रीम कोर्ट की मशहूर वकील इंदिरा जयसिंह ने पुलिस के छापे को ‘क़ानूनी प्रतिनिधित्व के बुनियादी हक़’ का सीधा उल्लंघन क़रार दिया है। सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी ने इसके तकनीकी पक्ष को उठाया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसी मामले से जुड़ी जानकारी वकील का निजी मामला है और यह उसका विशेषाधिकार है, लेकिन पुलिस दूसरे मामलों से जुड़ी जानकारियां भी ले गई होगी। दिल्ली की वकील शरबीर पनाग ने कहा कि वकील और मुवक्क़िल के बीच के मामले और उससे जुड़े काग़ज़ात उस वकील का विशेषाधिकार है और इसका उल्लंन नहीं किया जा सकता है।

प्रशांत भूषण ने कहा कि पहले वे सक्रिय कार्यकर्ताओं को पकड़ने आए, फिर छात्रों को पकड़ने आए, उसके बाद वे किसानों के लिए आए, अब वे उनके वकीलों को पकड़ने के लिए आ रहे हैं। इसके बाद वे आपको पकड़ने आएंगे। क्या आप इसे लोकतंत्र कहेंगे? हम सबको मिल कर इसके ख़िलाफ़ लड़ना होगा।

दिल्ली हाई कोर्ट महिला वकील फोरम ने शनिवार को दिल्ली दंगों के षड़यंत्र के मामलों में कई अभियुक्तों की पैरवी करने वाले एक वकील महमूद प्राचा के कार्यालय पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गई छापेमारी की कार्रवाई की निंदा की है। दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहित माथुर को संबोधित एक पत्र में फोरम से जुड़े वकीलों ने जांच एजेंसियों की इस कार्रवाई को वकीलों को हतोत्साहित करने और उन्हें डराने के प्रयास के रूप में बताया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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