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बढ़ते जनप्रतिरोध के बीच बौखलाई सरकार, दिल्ली दंगों की चार्जशीट में ठूंसे येचुरी, योगेंद्र और अपूर्वानंद के नाम

जिस दिन से बेरोजगार युवकों ने ताली-थाली बजाकर सरकार का विरोध किया है, मोदी सरकार के तीन कृषि अध्यादेश के खिलाफ किसान सड़कों पर उतर रहे हैं, और उच्चतम न्यायालय के सरकारपरस्त निर्णयों की देशव्यापी खुली आलोचना हो रही है, उससे सरकार और सरकारी मशीनरी सकते में है। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि इतने भयाक्रांत माहौल में लोग खुलकर मुखालफत करेंगे।

अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाही की ओर जा रही है। जीडीपी में माईनस में गिरावट हो रही है। सरकारी खजाना खाली है, जिसे सरकारी संपत्तियों को बेच कर भरने की कोशिशें हो रही हैं। रज्यों को जीएसटी का अंश देने के पैसे सरकार के पास नहीं हैं। ऐसे में राजनीतिक क्षेत्रों में माना जा रहा है कि सरकारी मशीनरी का संतुलन बिगड़ गया है और अनाप-शनाप फैसले लिए जा रहे हैं। ऐसा ही एक फैसला दिल्ली दंगों के सम्बंध में सामने आया है, जिसमें दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों से जुड़ी पूरक चार्जशीट में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और स्वराज अभियान के नेता योगेंद्र यादव समेत कई अन्य कई लोगों के नाम सह-षडयंत्रकर्ताओं के रूप में दर्ज किए हैं। दिल्ली पुलिस सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है।

दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए दंगों के मामले में दिल्ली पुलिस ने सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, स्वराज अभियान के नेता योगेंद्र यादव, अर्थशास्त्री जयति घोष, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं एक्टिविस्ट अपूर्वानंद और डॉक्युमेंट्री फिल्ममेकर राहुल रॉय के नाम सह-षडयंत्रकर्ताओं के रूप में दर्ज किए हैं। आरोप है कि इन लोगों ने सीएए का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों को ‘किसी भी हद तक जाने को कहा’। सीएए-एनआरसी को मुस्लिम विरोधी बताकर समुदाय में नाराजगी बढ़ाई और भारत सरकार की छवि खराब करने के लिए प्रदर्शन आयोजित किए।

दिल्ली के उत्तर पूर्वी जिले में 23 से 26 फरवरी के बीच हुए दंगों में पुलिस ने जो पूरक आरोप-पत्र दायर किया है, उसमें इन सभी के नाम हैं। आरोप-पत्र में दावा किया गया है कि दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 581 लोग घायल हो गए थे। इनमें से 97 गोली लगने से घायल हुए थे।

इन जानेमाने लोगों को तीन छात्राओं के बयान के आधार पर आरोपी बनाया गया है। जेएनयू की छात्राएं देवांगना कालिता, नताशा नरवाल और जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा गुलफिशां फातिमा पिंजरा तोड़ की सदस्य भी हैं। इन लोगों को जाफराबाद हिंसा मामले में आरोपी बनाया गया है।

तीनों ही छात्राओं के खिलाफ गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप दर्ज हैं। संसद का मॉनसून सत्र आरंभ होने से महज दो दिन पहले सार्वजनिक किए गए आरोप-पत्र में दिल्ली पुलिस ने दावा किया है कि कालिता और नरवाल ने दंगों में न केवल अपनी संलिप्तता स्वीकार की है, बल्कि घोष, अपूर्वानंद और रॉय का नाम भी अपने संरक्षकों के तौर पर लिया है, जिन्होंने छात्राओं से कथित तौर पर कहा था कि वे संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन करें और ‘किसी भी हद तक जाएं’।

इस बीच दिल्ली दंगों के मामले में फाइल किए गए पूरक आरोप पत्र को लेकर दिल्ली पुलिस बैकफुट  पर आ गई है, क्योंकि उसे शायद यह उम्मीद नहीं थी कि उसके इस कदम की देशव्यापी कड़ी प्रतिक्रिया होगी। दिल्ली पुलिस ने  रविवार को सफाई दी। दिल्ली पुलिस ने कहा, “यह स्पष्ट किया जाता है कि सीताराम येचुरी, योगेंद्र यादव और जयति घोष को हमारे द्वारा दायर पूरक आरोप पत्र (दिल्ली हिंसा मामले के) में अभियुक्त नहीं बनाया गया है।” दिल्ली पुलिस ने कहा कि एक व्यक्ति को केवल खुलासा (डिस्क्लोजर) किए गए बयान के आधार पर अभियुक्त नहीं बनाया जाता है। केवल पर्याप्त पुष्टि योग्य सबूतों के आधार पर ही आगे की कानूनी कार्रवाई की जाती है। मामला फिलहाल विचाराधीन है।

आरोप-पत्र के अनुसार छात्राओं-कार्यकर्ताओं ने पुलिस को यह भी बताया कि उन तीनों ने इस्लामी समूह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और जामिया समन्वय समिति के साथ मिलकर पिंजरा तोड़ के सदस्यों को बताया कि सीएए के खिलाफ अभियान को किस तरह आगे लेकर जाना है। घटनाक्रमों की पुष्टि पुलिस ने जामिया की छात्रा फातिमा के बयानों के जरिए की है।

आरोप-पत्र में दावा किया गया है कि येचुरी और योगेंद्र यादव के अलावा फातिमा के बयान में भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर, यूनाइटेड अगेंस्ट हेट के कार्यकर्ता उमर खालिद तथा पूर्व विधायक मतीन अहमद एवं विधायक अमानतुल्ला खान जैसे कुछ मुस्लिम समुदाय के नेताओं के नाम भी शामिल हैं। इसमें उन्हें हिंसा के साजिशकर्ताओं का मददगार बताया गया है। पुलिस का दावा है कि फातिमा ने अपने बयान में कहा कि उसे ‘भारत सरकार की छवि को खराब करने के लिए’ प्रदर्शन आयोजित करने को कहा गया था।

सीताराम येचुरी ने प्रतिक्रिया देते हुए ट्विटर पर लिखा, ज़हरीले भाषणों का वीडियो है, उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? इसके साथ ही उन्होंने कई और ट्वीट भी किए हैं और सरकार की आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि हमारा संविधान हमें न सिर्फ़ सीएए जैसे हर प्रकार के भेदभाव वाले क़ानून के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार देता है बल्कि यह हमारी ज़िम्मेदारी भी है। हम विपक्ष का काम जारी रखेंगे। बीजेपी अपनी हरकतों से बाज़ आए। उन्होंने लिखा है कि दिल्ली पुलिस भाजपा की केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के नीचे काम करती है। उसकी ये अवैध और ग़ैर-क़ानूनी हरकतें भाजपा के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के चरित्र को दर्शाती हैं। वो विपक्ष के सवालों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन से डरते हैं और सत्ता का दुरुपयोग कर हमें रोकना चाहते हैं।

योगेंद्र यादव ने ट्विटर पर लिखा कि यह तथ्यात्मक रूप से ग़लत है और उम्मीद है कि पीटीआई इसे वापस ले लेगा। पूरक चार्जशीट में मुझे सह-षड्यंत्रकारी या अभियुक्त के रूप में उल्लेख नहीं किया गया है। पुलिस के अपुष्ट बयान में एक अभियुक्त के बयान के आधार पर मेरे और येचुरी के बारे में उल्लेख किया गया है जो अदालत में स्वीकार्य नहीं होगा।

उच्चतम न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण ने ट्विटर पर लिखा है कि यह दिल्ली दंगों में दिल्ली पुलिस की दुर्भावनापूर्ण प्रकृति को साबित करता है। सीताराम येचुरी, योगेन्द्र यादव, जयति घोष और प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद पर दंगे भड़काने का आरोप लगाना हास्यास्पद के अलावा और कुछ नहीं है। उनके भाषण के वीडियो उपलब्ध हैं। कपिल मिश्रा और उनके सहयोगियों को छोड़ दिया गया है।

ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की नेता और लोक सभा सांसद महुआ मोइत्रा ने ट्विटर पर लिखा है कि दिल्ली दंगों की चार्जशीट में कपिल मिश्रा पर चुप्पी है, लेकिन इसमें येचुरी और योगेंद्र यादव का नाम शामिल किया गया है। अब मुझे पक्का विश्वास है कि बीजेपी सरकार इतिहास की किताबों को फिर से लिखेगी, जिसमें नेहरू को गुजरात का दंगे भड़काने वाला मुख्य व्यक्ति बताया जाएगा।

दिल्ली हाईकोर्ट में 13 जुलाई को दायर दिल्ली पुलिस के हलफ़नामे के मुताबिक, मारे गए लोगों में से 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे। अब तक दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 751 प्राथमिकियां दर्ज की हैं। पुलिस ने दिल्ली दंगों से जुड़े दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है। पुलिस का तर्क है कि कई जानकारियां संवेदनशील हैं, इसलिए उन्हें वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जा सकता है। दिल्ली पुलिस ने सीपीआई (एम) की नेता वृंदा करात की हाईकोर्ट में दायर याचिका के जवाब में 16 जून को ये बात कही थी। इस मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का कहना है कि दंगों के पीछे एक गहरी साज़िश थी।

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने इन दंगों की जांच के लिए 9 मार्च को नौ सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट के वकील एमआर शमशाद कमेटी के चेयरमैन थे, जबकि गुरमिंदर सिंह मथारू, तहमीना अरोड़ा, तनवीर क़ाज़ी, प्रोफ़ेसर हसीना हाशिया, अबु बकर सब्बाक़, सलीम बेग, देविका प्रसाद और अदिति दत्ता कमेटी के सदस्य थे। कमेटी ने 134 पन्नों की अपनी रिपोर्ट 27 जून को दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग को सौंप दी थी, जिसे आयोग ने 16 जुलाई को सार्वजनिक की। इसमें कहा गया है कि दिल्ली के उत्तर-पूर्वी ज़िले में फ़रवरी में हुए दंगे सुनियोजित, संगठित थे और निशाना बनाकर किए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार 11 मस्जिद, पांच मदरसे, एक दरगाह और एक क़ब्रिस्तान को नुक़सान पहुंचाया गया। मुस्लिम बहुल इलाक़ों में किसी भी ग़ैर-मुस्लिम धर्म-स्थल को नुक़सान नहीं पहुंचाया गया था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 13, 2020 3:25 pm

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