नॉर्थ ईस्ट डायरीः विस्थापन के 23 साल बाद त्रिपुरा में ब्रू शरणार्थियों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हुई

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त्रिपुरा में 400 से अधिक ब्रू परिवारों ने 19 अप्रैल को राहत शिविर को छोड़ दिया और दो चयनित स्थानों पर स्थायी रूप से रहने के लिए चले गए। केंद्र, त्रिपुरा और मिजोरम सरकारों और ब्रू नेताओं के बीच पिछले साल जनवरी में त्रिपुरा में 32,000 से अधिक ब्रू शरणार्थियों को स्थायी पुनर्वास प्रदान करने के लिए हस्ताक्षर किए गए चतुष्कोणीय समझौते के तहत पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की गई है, जो अक्टूबर 1997 से उत्तरी जिले के छह शिविरों में रह रहे हैं। केंद्र ने पिछले साल जनवरी में ब्रू शरणार्थियों के लिए 600 करोड़ रुपये के पुनर्वास पैकेज की भी घोषणा की थी।

कंचनपुर की सब डिवीज़नल मजिस्ट्रेट चांदनी चंद्रन ने मीडिया को बताया, “पहले बैच में कुल 426 ब्रू परिवारों ने दो स्थानों पर पुनर्वास के लिए राहत शिविरों को छोड़ दिया है। एक अंबासा के हडुकलाऊ में और दूसरा लॉन्गट्रेई घाटी के बोंगोफापारा सब डिवीजन में। हम इसी हफ्ते दूसरे बैच के पुनर्वास की उम्मीद कर रहे हैं।” मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने पुनर्वास के बारे में कहा, “मुझे खुशी है कि त्रिपुरा ने निर्धारित समय के भीतर पीएम मोदी के एक और सपने को लागू किया है। त्रिपुरा में 23 वर्षों से विस्थापित जीवन जीने वाले ब्रू प्रवासियों का पुनर्वास आज से शुरू हुआ है और धलाई जिले में कंचनपुर के 426 ब्रू परिवारों को स्थायी पता दिया गया है।”

मिजोरम में जातीय संघर्ष के चलते तेईस साल पहले ब्रू (या रियांग) समुदाय के 37,000 लोगों को अपने घरों से पड़ोसी राज्य त्रिपुरा में भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। जनवरी 2020 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें नौ चरणों में शरणार्थियों की मिजोरम वापसी के बाद शिविरों में रह रहे शेष 32,000 ब्रू शरणार्थियों को त्रिपुरा में स्थायी रूप से बसने की अनुमति दी गई। त्रिपुरा और मिजोरम की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के साथ पुनर्वास समझौते में शाही परिवार के वंशज प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन लोगों में से 202 शरणार्थी परिवारों को बोंगोफ़ापारा में स्थानांतरित कर दिया गया, जबकि बाकी 224 परिवार राज्य के स्थायी निवासियों के रूप में नवनिर्मित अस्थायी घर में रहने के लिए हडुकोलपारा चले गए। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य प्रशासन ने उनके लिए राशन और पानी की व्यवस्था की है। स्थानांतरण प्रक्रिया के भाग के रूप में, त्रिपुरा ने ब्रू पुनर्वास के लिए 15 स्थानों की पहचान की और ब्रू लोगों के आधार नामांकन को पूरा किया।

इससे पहले स्थानीय जातीय संगठनों के एक समूह ने पुनर्वास योजना का विरोध किया और कुछ हिंसक विरोध प्रदर्शनों सहित कई आंदोलन का सहारा लिया, जिसमें पिछले साल उत्तरी त्रिपुरा में दो लोग मारे गए और 20 अन्य घायल हो गए। पड़ोसी मिजोरम के ममित, कोलासिब और लुंगले जिले से विस्थापित ब्रू 1997 में जातीय झड़पों के चलते पलायन के लिए महबूर हुए थे। उनमें से 5,000 को 2009 के बाद से नौ चरणों में वापस कर दिया गया, जबकि मिजोरम के अन्य क्षेत्रों से लगभग इतनी ही संख्या में शरणार्थी ताजा झड़पों के कारण त्रिपुरा में भाग कर आ गए।

ब्रू या रियांग जनजाति उत्तर पूर्व की एक जनजाति है, वे लोग त्रिपुरा, असम और मिजोरम राज्यों में रहते हैं। त्रिपुरा में, इस समुदाय को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह के रूप में मान्यता प्राप्त है। मिजोरम में, इसे जातीय संगठनों द्वारा निशाना बनाया जाता है। उनके द्वारा ब्रू लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने की मांग भी उठी है और इस जनजाति को त्रिपुरा में पलायन करने के लिए मजबूर किया गया। त्रिपुरा में उनका स्थायी बंदोबस्त सुनिश्चित करने के लिए पिछले साल केंद्र और दोनों राज्यों के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। हालांकि, इसका त्रिपुरा में बंगाली और मिजो समूहों ने इसका विरोध किया गया था।

(दिनकर कुमार ‘द सेंटिनेल’ के संपादक रह चुके हैं।)

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