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कभी आय में बीडीओ को मात देने वाले किसान की हैसियत अब चपरासी के बराबर भी नहीं

‘उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी भीख निदान’ की पुरानी उक्ति अब कृषि प्रधान देश में पूर्णरूप से उलट गई है। खेती-किसानी घाटे का सौदा हो गया है। देश अन्न के मामले में तो आत्मनिर्भर हो गया है; लेकिन किसान फटेहाल हो गए। 73 वर्षों में भारत की किसी भी सरकार ने किसानों के हित में कोई ठोस नीति नहीं बनाई। उल्टे सरकार की किसान विरोधी नीतियों ने किसानों को घोर आर्थिक तंगी में धकेल दिया है। इसके परिणाम स्वरूप प्रत्येक आधे घंटे में एक किसान कर्ज एवं आर्थिक तंगी की घोर निराशा में आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। अब तक तीन लाख 50 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

इधर कुछ वर्षों से चुनाव नजदीक आने पर सत्तारूढ़ एवं विपक्षी पार्टियां ऋण माफी का वादा कर देश के 58 प्रतिशत किसानों का वोट हथियाने का हथकंडा अपनाती रही हैं। ऋण माफी किसानों की समस्या का सही और स्थायी निदान नहीं है। सही निदान तब होता जब किसानों के उत्पादन का लागत तथा लाभांश जोड़कर मूल्य निर्धारण होता या अन्य जिन्सों तथा सेवाओं में जितनी वृद्धि हो रही है उसी अनुपात में कृषि उपज का मूल्य भी निर्धारित होता तो किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती। यह बड़ी विडंबना है कि दुनिया के सारे उत्पाद का मूल्य उत्पादनकर्ता निर्धारित करता है; लेकिन बेचारे किसान की उपज का मूल्य उपभोक्ता, बाजार या सरकार निर्धारित करती है।


कृषि उपज को छोड़कर अन्य दैनिक आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की मूल्य वृद्धि सन् 1970 वर्ष को आधार माना जाए तो डीजल-पेट्रोल 180 गुना, बीज और कीटनाशक दवा 500 गुना, ईंटा 420 गुना, सरिया (छड़) 500 गुना, मजदूरी 175 गुना, तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों का वेतन 120 गुना, स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों का 150 से 200 गुना, कपड़ा 100 गुना और एक कप चाय में 100 गुना वृद्धि हुई है, लेकिन कृषि उपज मात्र 19 गुना ही बढ़ी है। 1970 में किसान को एक जोड़ा बैल खरीदने के लिए 16 से 20 क्विंटल धान बेचना पड़ता था। अब 36 से 40 क्विंटल धान बेचने पर ही एक जोड़ा बैल खरीद पाता है।

आज के दिन में एक किलो प्याज उत्पादन करने में सात से आठ रुपये लागत आती है; लेकिन उसे एक से दो रुपये प्रति किलो के भाव बेचना पड़ता है। लहसुन की उत्पादन लागत 20 से 25 रुपये प्रति किलो पड़ती है; लेकिन इसे 12 से 20 रुपये में बेचना पड़ता है। आलू की लागत छह रुपये पड़ती है और इसे एक से दो रुपये में बेचने पर विवश हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में गेहूं से प्रति वर्ष प्रति एकड़ 3000 से 3500 रुपये की आय होती है। पांच एकड़ जमीन धारक किसान सालाना  15 हजार से 17 हजार रुपये की आय  से अपने परिवार का भरण-पोषण साल भर कैसे कर सकता है? झारखंड, बिहार, बंगाल में यह आय 2000 से 2300 ही होती है। धान की फसल से भी लगभग इतनी ही आय हो पाती है।

1970 तक एक बीडीओ का वेतन 350 रुपये मात्र मासिक था। उसी समय एक किसान की औसत आय 474 रुपये मासिक थी, लेकिन आज एक पियून-चपरासी का मासिक वेतन 18000 रुपये है। इन से पांच गुना कम आज किसान की आमदनी रह गई है। यह सरकार की गलत नीति और कुप्रबंध का ही दुष्परिणाम है कि एक बीडीओ को अपने पाकेट में रख सकने वाला किसान दीन-हीन हो गया है।

पिछली बार अच्छी किस्म का धान (बासमती इत्यादि) 4000 से 4500 रुपये प्रति क्विंटल बिका, लेकिन वर्तमान में भाव गिर कर 3000 से 3500 रुपये रह गया। सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 1750 रुपये निर्धारित किया, लेकिन बाजार में 1000 से 1200 रुपये में बेचना पड़ा। सोयाबीन का मूल्य पिछले बार छह हजार से सात हजार रुपये प्रति क्विंटल बिका, लेकिन इस बार भाव गिरकर 3500 से 4000 रुपये रह गया। अरहर का सरकारी रेट 5050 रुपये तय हुआ, लेकिन  विदेशों से दाल मंगाने के कारण दाम गिरकर 3500 से 4000 रुपये रह गया। मक्का 1850 रुपये प्रति क्विंटल से 800 से 1000 रुपये में, कपास 5515 रुपये से 5825 रुपये निर्धारित था, लेकिन 3700 से 4100 रुपये में बिका, उड़द प्रति क्विंटल 6000 रुपये लेकिन बिकता है 3050 रुपये में, मूंग 7169 रुपये लेकिन 4500-4600 में, बाजरा 2150 रुपये बाजार भाव 1350 रुपये में बेचना पड़ता है।

एक एकड़ में सब्जी उगाने में करीब 60 हजार रुपये लागत आती है, लेकिन बमुश्किल 30 से 35 हजार रुपये मिल पाता है। कई वर्षों से देखा जा रहा है कि आलू और टमाटर के किसानों को अपने स्थानीय बाजार में ले जाने और ले आने का ट्रांसपोर्टिंग खर्च भी नहीं निकलने के कारण सड़कों पर फेंकने पर मजबूर होना पड़ा है। सन 2018 में देश में गेहूं की पैदावार 9.70 करोड़ टन हुई। इस में से मात्र 3.30 करोड़ टन की खरीद सरकार द्वारा 1625 रुपये प्रति क्विंटल पर हुई। शेष 6.40 करोड़ टन खुले बाजार में 1225 रुपये की दर पर बिकी। यानी एक क्विंटल पर 400 रुपये या 4000 रुपये प्रति टन के हिसाब से 25 हजार 600 करोड़ रुपये का घाटा केवल एक फसल पर किसानों को उठाना पड़ा।

इसी तरह धान की पैदावार 10.88 करोड़ टन में प्रति टन 4000 रुपये का घाटा, दलहन की पैदावार 2.24 करोड़ टन पर 20000 रुपये प्रतिटन, तिलहन की पैदावार 3.35 करोड़ टन पर 1000 रुपये प्रति टन, गन्ना कपास सहित अन्य फसलों के अलावा 28 करोड़ टन फल-सब्जी पर तीन लाख करोड़ रुपये, 15.5 करोड़ टन, दूध पर 1.5 करोड़ रुपये से अधिक। कुल मिला कर हर वर्ष 7.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।

अर्थ शास्त्रियों का मानना है कि देश में पेट्रोल-डीजल और लोहे के दाम बढ़ने से महंगाई बढ़ती है। पेट्रोल-डीजल के दाम तो हर दो-तीन महीनों में बढ़ रहा है। लोहा का खदान मालिक और कारखानों को अनावश्यक और अनुचित कीमत वृद्धि की छूट मिली हुई है। 2005-2008 में लौह अयस्क उत्खनन की लागत प्रति टन मजदूरों द्वारा 350 रुपये और मशीन से 400 रुपये आती थी। उसे माइन्स ऑनर चार से छह हजार रुपये प्रति टन पर बेचा। इतनी अनाप-शनाप कीमत वृद्धि पर सरकारी रोक एवं नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है। इन लोगों और सरकार की गलत नीति के चलते जब महंगाई बढ़ती है तो महंगाई की भरपाई के लिए किसानों की फसल की कम कीमत निर्धारित कर किसानों की बलि चढ़ा दी जाती है, ताकि उपभोक्ता एवं बाजार को महंगाई से राहत मिल सके।

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल और भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य ने अपने कार्यकाल में और बाजारवाद के हित पोषक अर्थ शास्त्रियों ने किसानों के कर्ज माफी को नैतिक त्रासदी और कर्ज अनुशासन बिगाड़ने वाला कदम बताया, लेकिन हर साल कॉरपोरेट को मिलने वाली 5 से 6 लाख करोड़ रुपये की छूट 6.8 लाख करोड़ रुपये के डूबते कर्ज और सिर्फ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 7वां वेतन आयोग द्वारा 2.57 गुणा वेतन वृद्धि में 4.80 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान किस आधार पर आर्थिक समझदारी है? और किसानों की कर्ज माफी गलत।

अमेरिकी सरकार प्रत्येक किसान को सालाना औसत 60 हजार अमेरिकी डॉलर सब्सिडी देती है। चीन सालाना 2120 करोड़ डॉलर, यूरोपीय यूनियन 1000 डॉलर, रूस 3770 करोड़ रूबल, कनाडा प्रत्येक किसान को सालाना 150000 डॉलर सब्सिडी देती है और भारत मात्र 175 डॉलर औसत प्रत्येक किसान को सालाना दे पाती है। और तो और उद्योगपतियों को 8.2 प्रतिशत ब्याज पर ऋण देती है। टाटा कंपनी को तो नैनो कार बनाने के लिए 0.01 प्रतिशत ब्याज पर ऋण दिया, वहीं किसानों को 24 से 26 प्रतिशत ब्याज पर ऋण चुकाना पड़ता है। कंपनी के मालिकों को हजारों-लाखों करोड़ रुपये ऋण नहीं चुकाने पर भी इज्जत के साथ मंत्रियों के दफ्तर में चाय पिलाई जाती है और किसानों को 10-20 हजार रुपये के लोन पर जेल भेज दिया जाता है।

2016 के एक आंकड़े के अनुसार किसानों का ऋण डिफॉल्टर छह प्रतिशत है। वहीं कंपनियों का ऋण डिफॉल्टर 14 प्रतिशत है। कर्ज लौटाने में किसानों का अच्छा रिकॉर्ड है। बीमा कम्पनी सरकार से जितना प्रीमियम सब्सिडी उठाती है उसका एक तिहाई भी किसानों को नहीं देती। कृषि बीमा से भी किसान वंचित रह जाता है। अगर किसानों को 1970 के मूल्य का सिर्फ 100 गुणा वर्तमान समय में उपज का दाम निर्धारित होता तो धान की कीमत प्रति क्विंटल 7600 रुपये मिलती जो अन्य जिन्सों के दाम में जो वृद्धि हुई है, थोड़ा बहुत समानता आती।

देश का सैनिक सीमा की रक्षा कर देश की सेवा करता है। सरकारी कर्मचारी जनता की सेवा कर देश की सेवा करता है; इसी प्रकार किसान भी अन्न उपजा कर देश वासियों का पेट भर कर देश की सेवा करता है। सैनिकों और जन सेवकों को वेतन के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अन्य भत्ता वेतन के अलावा दिए जाते हैं। इसी तरह किसानों को भी उन भत्तों को जोड़ कर कृषि उपज का मूल्य दिया जाना चाहिए, ताकि सम्मान के साथ जीवन-यापन कर सकें। साथ ही अधिकतम खुदरा मूल्य के प्रभावी अनुपालन के लिए कानून बनना चाहिए, जिसमें निर्धारित मूल्य से कम दर पर खरीदने वाले मंडी हों या व्यापारी को दण्डित करने का प्रावधान हो। भारत के किसानों को हर वर्ष औसत 7.5 लाख करोड़ रुपये का घाटा और ऊपर से अन्य जिन्सों और कृषि उपज के बीच कीमतों के इतना गहरी खाई को पाटे बिना किसानों की आय दो गुन करने का दावा सिर्फ खोखला ही सिद्ध होगा।

औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचा कर आर्थिक विकास का सपने वाला मॉडल दुनिया भर में विफल माना जाता है। अमेरिकी अध्ययन बताता है कि शहरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश की तुलना में कृषि पर लगाई गई पूंजी गरीबी मिटाने में पांच गुना अधिक प्रभावी होती है।

  • चित्रसेन सिंकू

(लेखक पूर्व सांसद और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, झारखंड के सह प्रदेश वरीय उपाध्यक्ष हैं।)

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This post was last modified on October 28, 2020 9:17 pm

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