Monday, October 25, 2021

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नारदा की खिड़की से बंगाल की सत्ता पर कब्जे की कोशिश

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नारदा मामला में सीबीआई बहुत ही उम्मीद के साथ सुप्रीम कोर्ट गई थी। भरोसा था कि सुप्रीम कोर्ट की मदद से सुब्रत मुखर्जी फिरहाद हकीम, मदन मित्रा और शोभन चटर्जी को जेल भेजने का उनका मंसूबा पूरा हो जाएगा। पर सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस बीआर गवई की डिवीजन बेंच के सवालों का जवाब देते नहीं बन पाया। सो अपील वापस ले ली, यानी लौट के बुद्धू घर को आए।

दरअसल एक सवाल का जवाब खुलकर सीबीआई नहीं दे पा रही है और, आम लोगों की बात तो छोड़ ही दीजिए, कानूनविद तक इसे नहीं समझ पा रहे हैं। इतना ही नहीं हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस की बेताबी भी कानूनविदों की समझ में नहीं आ रही है। आइए इस पर एक-एक कर के चर्चा करते हैं। सीआरपीसी की धाराओं के एकदम उलट जाते हुए चार्जशीट देने के बावजूद सीबीआई आखिर इन चारों नेताओं को जेल में क्यों रखना चाहती है। जबकि ऐसा होता नहीं है। क्या इसका तार विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा द्वारा बंगाल में शुरू किए गए दलबदल खेल से तो नहीं जुड़ा है। बंगाल में भाजपा का कोई मजबूत सांगठनिक आधार नहीं था और उनकी सारी उम्मीदें तृणमूल के टूटने पर टिकी हुई थी।

बंगाल में भाजपा के रणनीतिकार ने तृणमूल के दो नेताओं को निशाने पर लिया था। चर्चा के मुताबिक उनमें से एक थे सुब्रत मुखर्जी और दूसरे थे शुभेंदु अधिकारी। बंगाल में सुब्रत मुखर्जी का आधार राजनीतिक नजरिए से बेहद मजबूत है। वे 70 के दशक में छात्र परिषद के अध्यक्ष हुआ करते थे। सिद्धार्थ शंकर राय के जमाने में मंत्री थे, कोलकाता नगर निगम के मेयर थे और कई दशक तक आईएनटीयूसी के अध्यक्ष रहे हैं। लिहाजा अगर ये भाजपा में आ जाते तो, चुनाव परिणाम की बात छोड़ दें, भाजपा के पक्ष में एक मजबूत माहौल बन जाता और वह मुख्यमंत्री का एक चेहरा भी पेश कर पाती। पर यह पॉलिटिकल कैच भाजपा के हाथों से फिसल गया। जाल में फंस गए शुभेंदु अधिकारी।

रही बात फिरहाद हकीम की तो ये भाजपा को फूटी आंखें नहीं भाते हैं। लिहाजा इनसे भाजपा को बेहद रंजिश है। भाजपा के नेता ही नहीं बल्कि कार्यकर्ता भी फिरहाद हकीम के खिलाफ जहर उगलने से परहेज नहीं करते हैं। रही बात मदन मित्रा की तो वे कोई भारी-भरकम नेता नहीं हैं। पिछली सरकार में परिवहन मंत्री थे। अलबत्ता भाजपा के खिलाफ जहर उगलने में बेहद मुखर रहे हैं। अब आते हैं शोभन चटर्जी पर। ये कोलकाता नगर निगम की पूर्व मेयर हैं और भाजपा ने उन्हें कोलकाता कोऑर्डिनेटर और उनकी महिला मित्र बैशाखी बनर्जी को सहकोआर्डिनेटर बनाया था। शोभन ने बैसाखी के साथ कोलकाता में भाजपा के लिए कई रोड शो भी किया था। पर ठीक चुनाव से पहले उन्होंने बैसाखी के साथ भाजपा से नाता तोड़ लिया और बागी बन गए।

मुकुल राय और शुभेंदु अधिकारी की बात तो छोड़ दीजिए तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद भी नारदा स्टिंग ऑपरेशन कांड से जुड़े हुए हैं। सीबीआई बाकी सब नेताओं को दरकिनार करते हुए इन चारों के खिलाफ ही चार्जशीट दाखिल करने और उन्हें जेल में भरे जाने पर आमादा हो गई है। जबकि सीआरपीसी के मुताबिक पूरे मामले की जांच करके गिरफ्तार किए बगैर सभी अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट सौंपी जा सकती है। गिरफ्तारी के लिए कानून के मुताबिक लोकसभा के अध्यक्ष और विधानसभा के स्पीकर से अनुमति ली जा सकती है। इसके साथ ही एक सवाल उठता है। बंगाल विधानसभा का चुनाव परिणाम 2 मई को आया भाजपा की नाव डूब गई, 7 मई को राज्यपाल ने चुपके से अनुमति दे दी और 17 मई को गिरफ्तारी हो गई। क्या ये सारी कड़ियां आपस में जुड़ती हुई नजर नहीं आ रही हैं।

इसके अलावा हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस राजेश बिंदल कि अतिसक्रियता भी कानूनविदों को हैरान कर रही है। जस्टिस बिंदल जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट से तबादले के बाद कोलकाता हाईकोर्ट में आए हैं। चीफ जस्टिस टीवी राधाकृष्णन की सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एक्टिंग चीफ जस्टिस का कार्यभार सौंपा गया है। सीबीआई की स्पेशल कोर्ट से इन चारों अभियुक्तों को जमानत मिल गई और 17 मई को ही रात को 8:30 बजे तक सुनवाई के बाद एक्टिंग चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने इस पर स्टे लगा दिया। हाई कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट भी इस आदेश का औचित्य नहीं समझ पाए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गवई ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्पेशल बेंच का गठन स्वतंत्रता देने के लिए किया जाता है, लेकिन ऐसा पहली बार देखा कि स्पेशल बेंच का गठन स्वतंत्रता हरण के लिए किया गया हो। इसके साथ ही कहा कि यह पहेली भी समझ में नहीं आई एक ही मामले में कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया और कुछ पर हाथ भी नहीं लगाया गया। हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ एडवोकेट जयंत मित्रा ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा था अगर जमानत के किसी मामले में दो जज एकमत नहीं हो पाते हैं तो थर्ड बेंच का गठन होता है। यह एक सिंगल जज होता है और उसका फैसला ही अंतिम होता है।

 पर यहां तो लार्जर बेंच का गठन किया गया है। 

 सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि यह सिर्फ जमानत का मामला नहीं है बल्कि कानून और व्यवस्था का मामला भी है। क्या राज्य में कानून का शासन रह गया है। यहां गौरतलब है कि बंगाल में चुनाव पूर्व और चुनाव बाद हिंसा कोई नई बात नहीं है। अब एक दूसरे पहलू पर नजर डालें। चुनाव बाद हिंसा को लेकर भाजपा के नेताओं और समर्थकों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में कई पीआईएल दायर की गई है। इनमें सवाल उठाया गया है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था नहीं रह गई है,  इसलिए केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल में सेना और केंद्रीय वाहिनी तैनात करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट दे। एक पीआईएल में तो कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल से रिपोर्ट तलब करने के बाद पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने का आदेश दे। बहरहाल सभी पीआईएल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। विधानसभा चुनाव में सोचनीय पराजय के बाद अब भाजपा को लगता है कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद ही भाजपा की वापसी हो सकती है। सो कोलकाता से लेकर दिल्ली तक इसकी तैयारी की जा रही है।

 सितारों के बाद जहां और भी है अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं

कोविड स्थिति सामान्य होने के साथ ही नगर निगमों के चुनाव कराए जाएंगे। इनमें कोलकाता और हावड़ा नगर निगम प्रमुख है। इसके साथ ही नगर पालिकाओं के चुनाव भी होने हैं। विधानसभा चुनाव के परिणाम के मद्देनजर इन चुनावों के बाद भाजपा का कितना वजूद रह जाएगा, यह एक सवाल बना हुआ है। दूसरी तरफ कानाफूसी के अंदाज में ही सही, पर यह चर्चा है कि क्या केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर का फार्मूला पश्चिम बंगाल में अपनाएगी। गोरखालैंड और कामतापुरी आंदोलन को इसका आधार बनाया जाएगा। पर भाजपा को इससे पहले आजादी के पूर्व के बंगभंग आंदोलन के इतिहास को पढ़ना पड़ेगा। क्या एक अदद सरकार बनाने के लिए भाजपा इतना बड़ा जोखिम उठाएगी। क्या यह पूरे विपक्ष को एकजुट नहीं कर देगा। लोकप्रियता के निरंतर गिरते हुए ग्राफ के इस दौर में एक भोपू राज्यपाल की मदद से राष्ट्रपति शासन लगाने का यह खेल बेहद खतरनाक साबित होगा।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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