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हबीब तनवीर की पुण्यतिथि पर विशेष: सबसे हबीब

भारतीय रंगमंच की कोई भी चर्चा हबीब तनवीर के बिना अधूरी ही रहेगी, हबीब तनवीर पर चर्चा का मतलब रंगमंच की कई शैलियों, अभिव्यक्तियों, अस्मिताओं इत्यादि पर एक साथ बात करना है। सच तो यह है कि हबीब तनवीर के रंगकर्म और व्यक्तित्व के इतने पहलू हैं कि सब को समेट पाना नामुमकिन है। उनका व्यक्तित्व किसी नाटक के पात्र के जैसा ही दिलचस्प है । विश्व थियेटर की ज़बरदस्त जानकारी के बाद भी उन्होंने अपनी शैली लोक में तलाशी, सिनेमा के मोहपाश में नहीं बंधे, लगातार ग्रामीण कलाकारों के साथ काम किया। उन्होंने थिएटर को एक नई दिशा व अर्थ दिए।

बुर्जुआई थिएटर परम्परा को जन सुलभ व जनवादी स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने उस दौर में उच्च व मध्यवर्गीय प्रवृत्ति और बंद रंगशालाओं के लिए हो रहे बुर्जुआ रंगकर्म को चुनौती देते हुए उसे लोक का व्यापक संदर्भ दिया। अपने रंगकर्म के ज़रिए उन्होंने इस धारणा की पुष्टि की कि जो लोकल है वही ग्लोबल भी हो सकता है। उनकी शैली और नाटक सभी दर्शक वर्ग द्वारा देखे व सराहे गए।

हबीब तनवीर के लिए नाटक खुराक और रंगमंच ही उनका घर था। उन्होंने रंगमंच को आम आदमी के लिए खोला, उस पर उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की। उन्होंने अपने नाटकों के लिए लोक की समृद्ध परम्परा को माध्यम बनाया। मगर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लोक प्रेमी रंगकर्मी हबीब तनवीर ने अपने नाटकों की ‘लोक’ की पृष्ठभूमि को प्रयोगधर्मिता के नाम पर विद्रूप नहीं होने दिया, बल्कि अधिक सार्थक एवं प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे।

भारतीय नाट्य परंपरा में लोक को प्रतिष्ठित करने के जिन उद्यमों की हम सराहना करते आए हैं, हबीब तनवीर का सम्पूर्ण रंगकर्म आधुनिक नाट्य में उसका नेतृत्व करता रहा है। लोक’ उनके यहां हाशिए पर नहीं है, बल्कि उस पूरे नाट्य प्रदर्शन का मुख्य माध्यम होने के साथ ही पूरी लोक परम्परा का उद्घोष है । इस कारण से तनवीर साहब का रंग कर्म केवल हिंदी का ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत का प्रतिनिधि रंग कर्म है जिसमें हमें भारतीय जन की आस्था भी दिखाई देती है तो आकांक्षा भी, संघर्ष भी दिखाई देता है तो सपना भी।

हबीब तनवीर ने भारतीय रंग कर्म को देशज चेतना तथा संस्कारों के साथ-साथ जन बोली में विकसित व समृद्ध किया। हबीब साहब यह मानते थे कि भारतीय संस्कृति के केंद्र में ‘लोक’ ही है तथा ‘लोक’ के साथ जुड़कर ही सार्थक रंगमंच की तलाश पूरी हो सकेगी। इसीलिए अपनी बात को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए वह भारत के केंद्र में पहुंचते हैं, वे कहते थे कि “आज भी गांवों में भारत की नाट्य परंपरा अपने आदिम वैभव और समर्थता के साथ ज़िंदा है।उनके पास एक गहरी लोक परंपरा है और इस परंपरा की निरंतरता आधुनिक रंगमंच के लिए आवश्यक है।” हबीब साहब का मानना था, “हमें अपनी जड़ों तक गहरे जाना होगा और अपने रंगमंच की निजी शैली विकसित करनी होगी जो हमारी विशेष समस्याओं को सही तरीके से प्रतिबिंबित कर सके।”

इसी आधार पर उन्होंने अपने प्रायः सभी नाटकों के माध्यम से नाटकों के पूर्वकालिक स्थापित मान्यताओं को खारिज किया और नए प्रयोगों व नए प्रतिमान गढ़ने के लिए ‘लोक’ में व्याप्त उस समृद्ध परम्परा व खजाने से रूबरू हुए जिसे आधुनिकता के नाम पर बुर्जुआ रंग प्रेमियों की दुनिया ने हाशिए पर डाल दिया था। ‘आगरा बाज़ार’ और ‘मिट्टी की गाड़ी’ से जिस नए प्रयोग व शैली की शुरुआत की हबीब साहब को उसका मुकम्मल आकार ‘गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद’ से मिला। ‘चरनदास चोर’ के मंचन के पश्चात तो हबीब साहब के इस लोक रंग प्रधान नए शिल्प व रंग मंचन को दर्शकों की मान्यता ही मिल गई।

इसके बाद तो हबीब साहब की यह शैली भारतीय नाट्य जगत के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय रंग जगत में प्रतिष्ठित हो गई ।लोक से ली गई यह परिष्कृत मंचन शैली संस्कृत, लोक और पाश्चात्य शैली का सफल मिश्रण था। चाहे ‘आगरा बाज़ार’ हो या ‘गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद’ हो या ‘चरनदास चोर’ अथवा ‘हिरमा की अमर कहानी’ हो; देख रहे हैं नैन हो, सभी में वे अपने समय तथा लोक के मूल्यों की स्थापना के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहे साथ ही लोक कलाकारों को मुख्य धारा में लाने के प्रयास भी करते रहे थे। हबीब तनवीर के नाटक समकालीनता और रंग परम्परा का धारदार मिश्रण रहे। उनके नाटकों में आधुनिकता की समीक्षा व चेतना भी विद्यमान हुआ करती थी।

गीत-संगीत हबीब साहब के नाटकों की विशिष्ट पहचान रहे हैं। एक तरह से यह कह सकते हैं कि हबीब साहब ने ऐसी शैली तैयार की जिसमें रंगमंच पर नाट्य कर्म की सभी तरह की अभिव्यक्तियों को प्रभावशाली व सुरुचिपूर्ण तरीके से समाहित कर प्रस्तुत किया जा सके। इस मकसद में उनके नाटक के गीत काफ़ी असरदार सिद्ध हुए। उनके नाटक पहले नाटक आगरा बाजार से लेकर चरनदास चोर, देख रहे हैं नैन, बहादुर कलारिन कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना, शाजापुर की शांतिबाई आदि-आदि के गीत इसके उदाहरण हैं और जो आज भी उतने ही पसंद किये जाते हैं। हबीब साहब के नाटकों का रंग संगीत अपने आप में एक अर्थपूर्ण विशिष्टता लिए हुए है । हिन्दी रंगमंच के क्षेत्र मे ऐसा रंग संगीत कम ही मिल पाता है। हबीब साहब दर्शकों के प्रति अपनी पूरी जिम्मेदारी समझते थे इसीलिए वे दर्शकों को टोटल थियेटर का आस्वाद प्रदान करने के लिए कटिबद्ध दिखाई पड़ते हैं।

 एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब तनवीर के पिता हफीज अहमद खान पेशावर (पाकिस्तान) के रहने वाले थे। स्कूली शिक्षा रायपुर में पूरी करने के बाद वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे, जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर 1945 में वह मुंबई चले गए। वहां उनका जुड़ाव इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से हुआ। बम्बई मे बतौर प्रोड्यूसर वह ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े। कविताएं लिखीं, फिल्मों में अभिनय भी किया। इसके बाद हबीब साहब इंग्लैंड चले गए, जहां तीन साल तक रॉयल अकादमी ऑफ डोमेस्टिक आर्ट्स में रंगमंच और उसकी बारीकियों को समझा। फिर दिल्ली आ गए और अपना पहला नाटक 1954 में आगरा बाज़ार खेला जिसने सबका ध्यान खींचा।

1959 में हबीब तनबीर ने अपनी रंगकर्मी पत्नी मोनिका मिश्रा के साथ मिलकर *नया थिएटर* नाम से एक नाट्य ग्रुप बनाया और जीवन पर्यन्त इसी संस्था के बैनर तले रंगकर्म करते रहे। शुरुआती दौर में इप्टा से जुड़ने के कारण वामपंथ का उन पर पूरा असर था, जो अंत तक बना रहा इसी के चलते उनके नाटकों में यथार्थ हमेशा अधिक मुखर रहा। उन्हें कई बार आलोचना के अलावा हमले तक झेलने पड़े । हबीब तनवीर ने थिएटर के साथ साथ टीवी सीरियल एवं बॉलीवुड की फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उनको पद्म भूषण, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कार मिले थे। सत्तर के दशक में वह राज्यसभा के सदस्य रहे। राज्यसभा के सदस्य बनने वाले दूसरे रंगकर्मी थे। उनसे पहले यह सम्मान पृथ्वी राज कपूर को मिला था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातनाम इस अद्वितीय रंगकर्मी को अपने ही शहर व प्रदेश मे बेरुखी व उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा ।

अलग राज्य बनने के बाद भी छत्तीसगढ़ में उपेक्षा व अनदेखी से वे खून का घूंट पीकर मध्यप्रदेश के भोपाल में विस्थापित हो गए। आज भी सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ में इस महान रंगकर्मी को वो सम्मान व स्थान नहीं दिया जा रहा है जिसके वे हकदार हैं। हालांकि रंगकर्म से जुड़े लोग उन्हें लगातार याद करते हैं । यही उनकी उपलब्धि भी है कि वे अपने चाहने वालों के दिलों में एक प्रेरणा बनकर विशिष्ट स्थान बनाये हुए हैं। हमें इस बात का गर्व है कि वे हमारे रायपुर में जन्मे। वे सदा रंगकर्मियों व रंग दर्शकों के प्रेरणास्रोत बने रहेंगे ।

(जीवेश प्रभाकर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। आप आजकल रायपुर में रहते हैं।)

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