Saturday, October 16, 2021

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यूएनआई कर्मियों-पत्रकारों ने शुरू किया प्रबंधन के खिलाफ आंदोलन

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भारत की प्रमुख समाचार एजेंसी यूनाईटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया ने 21 मार्च, 2021 को अपनी स्थापना के 60 बरस पूरे किये।

आधिकारिक संदेश

चेयरमैन सागर मुखोपाध्याय ने इस अवसर पर अपने संदेश में लिखा: यूएनआई की समृद्ध विरासत यूएनआई के कर्मचारियों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफल है। इसके लिए मैं सभी वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों और उनके परिवारों के प्रति आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संस्थान का साथ दिया और उल्लेखनीय समर्पण का प्रदर्शन किया।

व्याख्या

यदि संस्थान या उसके बाहर का भी कोई व्यक्ति यह संदेश पढ़ता तो यही सोचता कि यूएनआई में दो दशक पुराना संकट अब जल्दी ही खत्म हो जाएगा। अफसोस! ऐसा नहीं हुआ। जल्दी ही कर्मचारियों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।
मणिपाल मीडिया के मुखोपाध्याय यूएनआई के चेयरमैन इस वर्ष मार्च में ही चुने गये थे। इसके साथ ही मणिपाल समूह के लीगल व सेक्रेटरियल विभाग के प्रमुख, बिनोद कुमार मंडल कम्पनी बोर्ड के निदेशक मंडल में शामिल किये गये।

इस अवसर पर मुखोपाध्याय ने कहा था, ‘‘एजेंसी के लिए एक ग्रोथमैप की शिनाख्त कर ली गई है और इसे जल्द ही सबके सामने लाया जाएगा। 30 अप्रैल 2021 को शेयरधारकों की असाधारण आम सभा में सुप्रीम कोर्ट के वकील पवन शर्मा को निदेशक बनाया गया और विश्वास त्रिपाठी को निदेशक मंडल से हटा दिया गया। जिसके बाद अब यूएनआई बोर्ड में चार निदेशक हैं जिनमें नवंबर 2018 से नवभारत समूह के सुमित माहेश्वरी भी हैं।
यूएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार उक्त बैठक में चार शेयरधारको-जागरण प्रकाशन लिमिटेड, कस्तूरी एंड संस लिमिटेड, एक्सप्रेस पब्लिकेशंस (मदुरै) और मणिपाल मीडिया लिमिटेड – के प्रतिनिधि मौजूद थे और तीन शेयरधारकों -एचटी मीडिया लिमिटेड, स्टेट्समैन लिमिटेड और नवभारत प्रेस लिमिटेड – के प्रतिनिघि वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक से जुड़े।

अप्रैल 20210के तीसरे सप्ताह में अखबारों में प्रधान संपादक और महाप्रबंधक (ऑपरेशंस एंड मार्केटिंग) जैसे शीर्ष पदों के लिए विज्ञापन दिये गये। विज्ञापनों में यह बताया गया कि ‘‘सही प्रत्याशियों के लिए वेतन की सीमा नहीं होगी।’’ऐसा तब किया गया जब यूएनआई के देश भर में फैले 43 केंद्रों में 250 कर्मचारियों के 50 महीनों का वेतन बकाया है! इसके बावजूद, कर्मचारियों को लगा कि नये अधिकारी शायद उनका भला सुनिश्चित करेंगे।
प्रधान संपादक की नियुक्ति के बाद, संपादकीय समेत कई विभागों में अनुबंध के आधार पर नियुक्तियां हुईं। कुछ पुराने नियमित व अनुबंधित कर्मचारियों के इस्तीफे भी हुए। ऐसी चर्चा चली कि नियमित कर्मचारियों को अनुबंध आधार पर आने के लिए कहा जा रहा है। अनुबंध आधार पर नियुक्ति का इस्तेमाल यूएनआई में हमेशा एक समानांतर ढांचा खड़ा करने के लिए किया जाता है ताकि नियमित कर्मचारी अगर आंदोलन के तेवर अपनाएं तो भी पूरी तरह काम ठप नहीं हो सके। यूएनआई में 2000 के दशक में अनुबंध आधार पर नियुक्तियां शुरू हुईं और तब से प्रबंधन की ‘‘बांटो और राज करो’’नीति के काम आ रही हैं। अनुबंधित कर्मचारियों को वेतन हर महीने दिया जाता है और नियमित कर्मचारियों को महीनों तरसाया जाता है। वेतन में देरी की शुरुआत 2006 में हुई और तब से आज स्थिति बहुत बिगड़ गई है। इस समय दो वेतन के भुगतान के बीच का फासला छह से आठ महीने हो गया है जिसका मतलब है कि कर्मचारियों को साल में दो वेतन भी नहीं मिलते। अलावा इसके, हाल में अनुबंध आधार पर की गई नियुक्तियां इस मायने में भी अलग हैं कि यह शीर्ष पदों पर की जा रही हैं जिसका नियमित कर्मचारियों को निकट भविष्य और दीर्घावधि में योग्यता के बावजूद प्रमोशन न मिलने के रूप में नुकसान होगा।

नये प्रधान संपादक का एक विवादास्पद निर्णय 14 सितंबर 2021 को सामने आया। हस्ताक्षरयुक्त नोट में कर्मचारियों को बताया गया कि मासिक/चक्रवार आधार पर उन्हें दिये जाने वाले पंद्रह हजार रुपये वेतन का एक अंश होगा और बाकी रकम ‘‘जब और जैसे पैसे आएंगे, दी जाएगी। ’’ यह ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनके जैसा था।
प्रधान संपादक खुद दो लाख रुपये वेतन के रूप में ले रहे हैं। उन्होंने जिनकी नियुक्तियां की हैं उन सभी को लगभग पचास हजार से अधिक वेतन दिया जा रहा है।
इतना ही नहीं, यह पंद्रह हजार रुपये भी दिल्ली को छोड़कर कई केंद्रों के कर्मचारियों और सेवानिवृत्त या इस्तीफा दे चुके पूर्व कर्मचारियों को नहीं दिये गये जबकि उनके भी महीनों का बकाया वेतन, ग्रेच्युटी जैसे कानूनी बकाया का भुगतान नहीं किया गया है।
नवगठित ऑल इंडिया यूएनआई एंप्लाईज फ्रंट ने जब 23 सितंबर को मेल भेजकर 2 अक्तूबर से मुख्यालय में ‘‘क्रमिक भूख हड़ताल’’ और ‘‘धरने’’की घोषणा की तो कुछ पूर्व कर्मचारियों के खाते में दस-दस हजार रुपये जमा कराए गए। यह ताजा घटनाक्रम है।लेकिन जैसा कहते हैं कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था उसी तरह यूएनआई जैसे बड़े संस्थान को एक दिन में ‘‘तबाह’’ नहीं किया गया।
सुभाष चंद्रा

31 मार्च 2000 तक यूएनआई के पास 22.94 करोड़ रुपये का सरप्लस था और उस वित्त वर्ष यानी 1999-2000 में कंपनी ने 4.27 करोड़ रुपये का लाभ दर्शाया था। छह साल बाद सितंबर 2006 में कंपनी के 14811 अनसब्सक्राईब्ड शेयर 32.4 करोड़ रुपये में सुभाष चंद्रा के एस्सेल समूह के स्पेशल पर्पज वेहिकल मीडिया वेस्ट को आवंटित किये गये। चार शेयरधारक संस्थानों, मणिपाल, एबीपी, कस्तूरी एंड संस व मैसूर प्रिंटर्स ने इसे कंपनी लॉ बोर्ड में चुनौती दी। कंपनी लॉ बोर्ड ने 21 जनवरी 2008 सुनाए फैसले में इस शेयर सौदे को रद्द कर दिया। साथ ही अपने आदेश के आखिरी पारा में सीएलबी ने निदेशक मंडल और खासकर याचिकाकर्ताओं को एक संदेश दिया। जिसका सार यह था कि कंपनी वित्तीय संकट से गुजर रही है, अर्थात कंपनी को निधि की जरूरत है। शेयर बेचने का सौदा रद्द होने के बाद अब यह जिम्मेवारी निदेशक मंडल और खासकर याचिकाकर्ताओं की होगी कि वह कंपनी के लिए आवश्यक निधि जुटाएं।

लेकिन, याचिकाकर्ताओं और कम्पनी के निदेशक मंडल की अकर्मण्यता बनी रही और हालात और बुरे होते गये। मीडिया वेस्ट सौदे में मिले 32 करोड़ से जो 27 करोड़ रखे हुए थे, उसी समय वापस किये गये लेकिन जो पांच करोड़ सुभाष चंद्रा के इशारे पर प्रबंधन ने अनापशनाप खर्च किये थे किश्तों में कंपनी से लौटाये गये। यह रकम याचिकाकर्ताओं को लौटानी चाहिए था। 5 पांच करोड़ की यह राशि लौटाने के चक्कर में कर्मचारियों की भविष्य निधि का अंशदान जमा कराना बंद कर दिया गया। बाद में जब ईपीएफओ से दबाव आया तो पीएफ भरा जाने लगा.लेकिन फिर वेतन भुगतान में असहनीय देरी होने लगी।
वीआरएस

इस बीच, जुलाई 2010 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना अर्थात वीआरएस लाई गई और 56 कर्मचारियों ने वीआरएस ली। उनके कानूनी बकाया व योजना के लाभ मिलाकर उनकी जो रकम बनती थी उसका आधा हिस्सा पहली किश्त अगस्त में दिया गया और बाकी रकम यानी दूसरी व अंतिम किश्त एक साल के भीतर यानी 31 अगस्त 2011 को या उससे पहले देने का वायदा किया गया। यह दूसरी किश्त आज तक उन कर्मचारियों को नहीं दी गई जबकि एक दशक बीत चुका है।
यह भी विडंबना है कि पिछले एक दशक में कर्मचारियों की संख्या में काफी गिरावट आने के बावजूद वेतन भुगतान में अंतराल बढ़ता गया। सेवानिवृत्त, इस्तीफा दे चुके और वीआरएस लेने वाले कर्मचारियों का बकाया भुगतान 150 करोड़ रुपये से पार हो चुका है। इसका कारण यह है कि कंपनी के खर्चे और राजस्व के बीच एक बड़ी खाई है। एक दशक पहले यह खाई पचास लाख रुपये प्रति माह थी। शेयरधारकों के मीडिया संस्थानों समेत ग्राहक पत्रों के यूएनआई को पीठ दिखाने के कारण संस्थान का सर्वाइवल पिछले एक दशक में कठिन से कठिनतर होता गया। इसके बावजूद कर्मचारी कार्य करते रहे और संस्थान जिंदा रहा।

मोदी सरकार का कोप

एक बड़ा झटका अक्तूबर 2020 में लगा जब यूएनआई के सबसे बड़े सब्सक्राईबर ‘प्रसार भारती’ ने पीटीआई की चीन सीमा विवाद पर कुछ खबरों के कारण नरेंद्र मोदी सरकार की नाराजगी के मद्देनजर पीटीआई, यूएनआई की समाचार सेवाएं लेनी बंद कर दी। प्रसार भारती से मिलने वाली सब्सक्रिप्शन राशि कंपनी के राजस्व का 45 फीसदी थी। नतीजा यह हुआ कि दो वेतनों के बीच अंतराल दो महीने से बढ़कर सीधे छह महीने हो गया। इस तरह प्रबंधन के साथ सरकारों व पॉलिटिकल क्लास ने भी समाचार एजेंसी को ‘‘छला‘‘ही है।
और वास्तव में, कंपनी की वित्तीय स्थिति के ही कारण कोविड-19 महामारी के समय, जब दूसरे मीडिया संस्थानों में बड़े पैमाने पर छंटनी, वेतन कटौती हुई तो यूएनआई में ऐसा कुछ नहीं हुआ। कंपनी वेतन कटौती कैसे करती जब कर्मचारियों को वेतन का भुगतान कर ही नहीं रही थी! कंपनी किसी कर्मचारी को कैसे निकालती जब निकाले जाने पर वह उसके कानूनी बकाया का भुगतान करने में भी असमर्थ थी! हालांकि इस आपदा में भी अवसर निकाल ही लिया गया और कुछ गैर-पत्रकार कर्मचारियों का वेतन का वेतन काटा गया।
लॉकडाउन

लॉकडाउन के दौरान मई में प्रबंधन ने एक निर्देश जारी किया कि पत्रकार व प्रशासनिक अधिकारी/कर्मचारी तो घर से काम करना जारी रख सकते हैं लेकिन गैर पत्रकार कर्मचारियों को कार्यालय आना पड़ेगा क्योंकि मीडिया ‘‘आवश्यक‘‘ सेवाओं में आता है। विभिन्न राज्यों में कड़े लॉकडाउन व ट्रांसपोर्ट की अनुपलब्धता, उदाहरण मुंबई में लोकल ट्रेन का नहीं चलना, के कारण जो गैर-पत्रकार कर्मचारी कार्यालय में आ नहीं सकते थे, उनका वेतन काटा गया। प्रबंधन ने इसी महीने कोलकाता कार्यालय भी इसी आधार पर बंद कर दिया कि वहां पत्रकारों को कड़े लॉकडाउन नियमों में ढिलाई के बावजूद, घर से काम करने दिया जा रहा था और गैर-पत्रकार कर्मचारियों के लिए कार्यालय में उपस्थित होने पर भी उनके लिए कोई काम नहीं बचा था। कार्यालय बंद करते समय गैर-पत्रकार कर्मचारियों को कोई सूचना लिखित में नहीं दी गई कि उनकी नौकरी का क्या होगा? कि उनके बकाया का क्या होगा? अब आशंका है कि प्रबंधन और भी कार्यालय निकट भविष्य में बंद कर सकता है।
प्रमुख मांगें

पूर्व और वर्तमान के इसी घटनाक्रम के कारण देश भर के कर्मचारियों में आक्रोश है और नतीजतन नवगठित यूनीफ्रंट ने मुख्यालय में 2 अक्तूबर से ‘‘क्रमिक भूख हड़ताल’’ और ‘‘धरना’’ करने का निर्णय किया।
यूनीफ्रंट की प्रमुख मांगें हैंः-
1 पंद्रह हजार के बजाय पूरा वेतन दिया जाए
2 सभी केंद्रों के सभी कर्मचारियों को वेतन हर महीने और एक ही दिन दिया जाए
3 सेवानिवृत्त, इस्तीफा दे चुके कर्मचारियों के बकाया वेतन का भुगतान किया जाए
4 वीआरएस ले चुके कर्मचारियों के बकाया का भुगतान करें
5 सेवानिवृत्ति/संस्थान छोड़ते समय कर्मचारियों को बकाया चुकाएं और ऐसा नहीं कर सकते तो लिखित में दें
6 कोलकाता और बंगलुरू कार्यालय फिर से खोलें
7 अनुबंध आधारित नियुक्तियों पर रोक लगाए
8 कंपनी की वित्तीय स्थिति पर श्वेतपत्र जारी करें और संस्थान को निकट भविष्य या दीर्घावध में कैसे चलाएंगे, इसकी रूपरेखा/योजना, यदि आपके पास है तो, बताएं।
(सीपी झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूएनआई में विभिन्न वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)

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