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जलवायु परिवर्तन पर युवा सड़कों पर हैं लेकिन राष्ट्रों को चिंता नहीं

प्रदूषण फैलाने वाले बड़े देशों को छोटे देशों के दबाव का सामना करना पड़ा और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक एक्शन प्लान नहीं बन पाया। दो सप्ताह के विचार-विमर्श के बाद भी 2015 के पेरिस समझौते को कैसे लागू किया जाए, इस पर सभी देश सहमत नहीं हो सके।

इस गतिरोध पर 14 साल की एक्टिविस्ट अलेक्जेंड्रिया विलासेन ने निराशा जताई। उसने कहा कि वार्ताकारों और सड़क पर आंदोलन कर रहे युवाओं के बीच यही अंतर है कि युवा सड़क पर तेजी से कदम उठाने की मांग कर रहे हैं, जबकि इन्हें कोई जल्दी नहीं है।

स्पेन की राजधानी मैड्रिड में वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन, कॉन्फ्रेंस ऑन द पार्टीज या कॉप-25 शनिवार को पूरा हुआ। इस बार आयोजन से जुड़ी खास बात यह रही कि आयोजनकर्ता, यूएनएफसीसीसी (युनाइटेड नेशन्स फ़्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज) की स्थापना के 25 वर्ष पूरे हुए हैं। 1992 में पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का आयोजन ब्राजील की राजधानी रियो डी जनेरियो में किया गया था। रियो सम्मेलन में तय हुआ था कि यूएनएफसीसीसी के सदस्य राष्ट्र हर साल इकट्ठा होंगे तथा जलवायु संबंधित चिंताओं और कार्य-योजनाओं पर चर्चा करेंगें।

इस सम्मेलन को कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी या कॉप) नाम दिया गया। कॉप-1 का आयोजन 28 मार्च से सात अप्रैल 1995 तक जर्मनी के बर्लिन में किया गया था। यह जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के ढांचे यानी यूएनएफसीसीसी में शामिल सदस्यों का सम्मेलन है।

पृथ्वी के धरातल पर निश्चित समय में तापमान एवं वर्षा की विसामान्यता (डेविएशन) को जलवायु परिवर्तन कहते हैं। मनुष्यों द्वारा किया गया प्रदूषण और गर्म हानिकारक गैसों का उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को प्रमुख कारण माना जाता है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है और जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक चल रहा है। रियो बैठक में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक व्यापक संधि पर सहमति बनी थी, जिसे यूएनएफसीसीसी कहा गया था।

इसके साथ दो और कन्वेंशन की परिकल्पना की गई थी। इसमें एक है, जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन और दूसरा मरुस्थलीकरण पर संयुक्त राष्ट्र का कन्वेंशन। पर्यावरण से जुड़े ये सम्मेलन बड़े महत्व के हैं। संयुक्त राष्ट्र के वार्ताकार इस बार मैड्रिड में जुटे और जलवायु परिवर्तन पर सबसे मुश्किल समझे जाने वाले मुद्दों को निपटाने की कोशिश की, ताकि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की जा सके। वैज्ञानिकों ने कहा कि भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए शीघ्र बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।

इस बार के आयोजन में जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ प्रयासों का आकलन किया गया और इस मामले को पटरी पर लाने की कोशिश हुई। भारत ने कॉप-25 बैठक में कहा कि विकसित देश 2020 से पहले और बाद के लक्ष्यों को हासिल करें तथा 2050 तक कार्बन निरपेक्षता हासिल करें। भारत ने कहा कि ज्यादातर विकसित देश 2020 से पहले के अपने लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रहे हैं, लेकिन तत्परता दिखाएं तो आगे की रणनीति पर असर नहीं पड़ेगा। विकसित देशों को 2020 तक अपने उत्सर्जनों में 25-40 फीसदी तक की कमी लानी थी।

भारत की तरफ से मुख्य वार्ताकार और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव रविशंकर प्रसाद ने कहा कि विकसित देशों ने भले ही 2020 तक के लक्ष्य हासिल नहीं किए हों, लेकिन इससे आगे के लक्ष्यों को हासिल करने में कोई रियायत नहीं दी जा सकती है। विकसित देशों को 2050 तक हर हाल में कार्बन निरक्षेपता का लक्ष्य हासिल करना होगा। यानी वे उतना ही उत्सर्जन करें जितना सोखने की क्षमता उनके पास है। यूरोपीय संघ ने शुक्रवार को वर्ष 2050 तक नेट (शुद्ध) कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का संकल्प लिया है। महासचिव गुटेरेश ने इसके लिए बधाई देते हुए कहा है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए की गई कार्रवाई का अनुसरण दुनिया के बाकी देशों में भी किया जाना चाहिए।

28 सदस्य देशों वाले ब्लॉक में अकेले पोलैंड ऐसा देश है, जिसने इस संकल्प पर सहमति नहीं दी है। कुछ समूहों ने जलवायु कार्रवाई योजनाओं पर आगे बढ़ने के लिए वित्तीय संसाधनों की मांग की है। इनमें तकनीक हस्तांतरण और क्षमता निर्माण के लिए मदद शामिल हैं। आंद्रेस लान्देरैचे ने ज़ोर देकर कहा कि फ़्रेम वर्क तैयार करने में सरकारों की भूमिका है, लेकिन सांस्कृतिक बदलाव भी लाना होगा ताकि हर कोई यह बुनियादी सवाल पूछे: अपना कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए मैं क्या कर रहा हूं? अब तक तक 73 देशों ने अपने जलवायु कार्रवाई संकल्पों को और ज़्यादा मज़बूत बनाने की मंशा ज़ाहिर की है।

इसके साथ 14 क्षेत्रों, 398 शहरों, 786 व्यवसायों और 16 निवेशकों ने कहा है कि वे वर्ष 2050 तक नेट कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इससे साफ पता चल रहा है कि सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपात स्थिति से निपटने की अहमियत और सख़्त ज़रूरत को पहचाना जा रहा है। 177 कंपनियों ने कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखने का संकल्प लिया है, ताकि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचा जा सके। सितंबर 2019 में यूएन मुख्यालय में आयोजित सम्मेलन में संकल्प लेने वाली कंपनियों की तुलना में यह संख्या अब दूनी हो गई है।

कॉप 25 सम्मेलन में पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित जिन आपदाओं पर चर्चा की गई, उनमें अप्रत्याशित चक्रवात, अकाल और रिकॉर्ड-तोड़ ‘लू’ शामिल हैं। सम्मेलन दो दिसंबर को शुरू हुआ था और शुक्रवार शाम वार्ता समाप्त होने का कार्यक्रम था, लेकिन यह शनिवार सुबह तक जारी रहा।

वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिंग के भयानक प्रभावों की ओर इशारा किया है, जबकि लाखों युवा कार्यकर्ता सरकार से कदम उठाने की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं। पर्यावरण से संबंधित अपने काम और तेवर के कारण ही सोलह साल की ग्रेटा थनबर्ग को इस साल ‘टाइम्स पर्सन ऑफ़ द इयर, 2019’ चुना गया है। ग्रेटा थनबर्ग के बारे में बताना हो तो कहा जा सकता है कि पर्यावरण पर चिंता जताते हुए संयुक्त राष्ट्र में एक भाषण के दौरान उन्होंने ग़ुस्से में दुनिया भर के नेताओं से पूछा था, “हाउ डेयर यू? यानी आपकी ये हिम्मत?”

वैसे ग्रेटा ने ट्विटर पर अपना परिचय कुछ इस तरह दिया है, “एक किशोरी जो अपने ग़ुस्से को काबू में करना सीख रही है….।” समझा जाता है कि ग्रेटा को अपना यह परिचय देने की प्रेरणा डोनल्ड ट्रंप के ”चिल ग्रेटा, चिल” कहने से मिली होगी। इसके भिन्न मतलब लगाए जा सकते हैं और इसमें एक यह भी हो सकता है कि मस्त रहो। सब काम अपनी रफ्तार से होगा।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईईसीयूएन) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमारी गलतियों के कारण जलवायु परिवर्तन ने प्रकृति को खोखला बना दिया है। ऐसे में हर चर्चा का सही दिशा में सटीक कार्यान्वयन जरूरी है। इसके भिन्न मतलब लगाए जा सकते हैं और इसमें एक यह भी हो सकता है कि मस्त रहो। सब काम अपनी रफ्तार से होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और अनुवाद कम्यूनिकेशन के फाउंडर हैं।)

This post was last modified on December 15, 2019 3:50 pm

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