Sunday, March 3, 2024

अमेरिकी शहर सिएटल में जातिगत भेदभाव विरोधी कानून: दलितों में खुशी हिंदूवादी संगठनों में आक्रोश

सिएटल जातिगत भेदभाव पर रोक लगाने के लिए कानून लाने वाला अमेरिका का पहला शहर बन गया है। सिएटल सिटी काउंसिल ने शहर के भेदभाव विरोधी कानून में जाति को भी शामिल कर लिया है। काउंसिल की सदस्य क्षमा सावंत ने जातिगत भेदभाव रोकने पर प्रस्ताव पेश कर एक मिसाल कायम किया है। सिएटल सिटी काउंसिल में मंगलवार (21फरवरी) को प्रस्ताव पेश किया जिसपर वोटिंग कराई गई और प्रस्ताव 6-1 मतों से पारित भी हो गया।

अध्यादेश के समर्थकों का कहना है कि ऐसे कानून के बिना उन लोगों को सुरक्षा नहीं दी जा सकती है जो कार्यस्थल या दूसरे जगहों पर जातिगत भेदभाव का शिकार होते हैं। यह अध्यादेश जातिगत भेदभाव को रोकेगा। दक्षिण एशिया के 1लाख 67 हजार से अधिक लोग वाशिंगटन राज्य में रहते हैं, जो बड़े पैमाने पर ग्रेटर सिएटल क्षेत्र में केंद्रित है, जहां यह कानून बना है।

काउंसिल की सदस्य क्षमा सावंत ने कहा है कि “जातिगत भेदभाव केवल दूसरे देशों में ही नहीं होता है। दक्षिण एशियाई अमेरिकी और अप्रवासी कामकाजी लोग अपने कार्यस्थलों पर जातिगत भेदभाव का सामना करते हैं, जिसमें सिएटल और देश भर के शहर शामिल हैं। इसलिए जातिगत भेदभाव पर रोक लगाने के लिए देश में पहला कानून लाने पर हमें गर्व है।”

यह कानून होटलों, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पब्लिक टॉयलेट या दूसरे संस्थानों में भी जाति के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाएगा। इसके अलावा यह कानून किराये के घरों में रह रहे लोगों, कर्ज लेने वाले और प्रापर्टी बेचने वाले लोगों को भी जातिगत भेदभाव से बचाएगा। जातिगत भेदभाव ठीक उसी तरह से लोगों को एक दूसरे से अलग करता है जिस प्रकार हम लिंग के आधार पर एक पुरुष और महिला में भेदभाव करते हैं। जो भेदभाव का सामना कर रहे लोगों के लिए बेहद पीड़ादायक अनुभव होता है।

क्षमा सावंत ने ये भी कहा कि “जातिगत भेदभाव कार्यस्थलों पर होने वाले भेदभावों में से एक है और गहरा प्रभाव डालता है। इक्विटी लैब्स के डेटा से पता चलता है कि चार जाति-उत्पीड़ित लोगों में से एक ने शारीरिक और जुबानी हमले का सामना किया, तीन में से एक ने शिक्षा में भेदभाव का सामना किया, और तीन में से दो ने कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना किया।“

भारतीय-अमेरिकी अधिकार संगठनों के गठबंधन इंडियन अमेरिकन कोएलिशन ने जातिगत आधारित भेदभाव पर रोक लगाने के लिए सिएटल सिटी काउंसिल की तारीफ की। जहां कानून बनने से अमेरिका में दलित समूहों में खुशी की लहर दौड़ गई है वहीं हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन जैसे कुछ संगठनों में उदासी छायी हुई है। 

कानून के बनने के बाद से सिएटल सिटी में तनाव का माहौल है। पूरे यूएस में स्थित हिंदू संगठनों ने कानून का विरोध किया है। हिंदू संगठनों का कहना है कि कानून अतिरिक्त कानूनी जांच के लिए हिंदू अमेरिकियों को अलग करता है।

मंगलवार को कानून पर परिषद के मतदान से ठीक पहले, उत्तरी अमेरिका के हिंदू गठबंधनों ने ट्वीट किया: “दलित बहुजन समूहों, मंदिरों, सांस्कृतिक संघों और सहयोगियों सहित 100 से अधिक दक्षिण एशियाई संगठनों ने जातिगत भेदभाव रोकने वाले अध्यादेश पर वोट नहीं करने का आग्रह किया है।“

हिंदू संगठनों ने एक बयान में कहा है कि “हम जाति-आधारित भेदभाव सहित सभी तरह के भेदभाव की निंदा करते हैं। हालांकि, हम इस तरह के मौजूदा प्रस्ताव को देखकर हैरान और दुखी हैं, जो झूठ पर आधारित है और इक्वैलिटी लैब्स जैसे घृणित समूहों द्वारा गलत आरोप लगाया गया है।“

वहीं कानून का स्वागत करते हुए इक्वैलिटी लैब्स के एक कार्यकारी निदेशक थेनमोझी साउंडराजन ने कहा कि “प्यार ने नफरत पर जीत हासिल की है क्योंकि सिएटल जातिगत भेदभाव पर रोक लगाने वाला देश का पहला शहर बन गया है।“

अमेरिका में ये पहली बार नहीं हुआ है कि जातिगत भेदभाव को नकारा गया हो। इससे पहले भी कई जगहों पर जातिगत भेदभाव के खिलाफ कदम उठाये गए हैं। दिसंबर 2019 में बॉस्टोन के करीब स्थित ब्रांडिज यूनिवर्सिटी भी सभी तरह के भेदभाव को रोके जाने के कानून में जातिगत भेदभाव को शामिल करने वाला यूएस का पहला कॉलेज बन गया था।

जिसके बाद द कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी सिस्टम, कोलबी कॉलेज, ब्राउन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया ने इसी तरह से जातिगत भेदभाव पर रोक लगाई थी। साल 2021 में हावर्ड यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ने अपने ग्रैजुएट स्टूडेंट युनियन के साथ मिलकर वर्कर छात्रों को लिए जातिगत सुरक्षा को लेकर एक कान्ट्रैक्ट बनाया था।

माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के मुताबिक विदेशों में बसने की चाह रखने वाले भारतीयों के लिए अमेरिका उनका दूसरा सबसे बड़ा पसंदीदा देश है। इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार साल 1980 में जहां अमेरिका में 2 लाख 6 हजार भारतीय रह रहे थे वहीं अब साल 2021 में  20 लाख 70 हजार भारतीय वहां रह रहे हैं। 

इक्वैलिटी लैब के साल 2016 के सर्वे के मुताबिक जाति से जुड़े भेदभाव ने बड़े स्तर पर वहां अपना पैर पसार लिया था। जाति से जुड़ी सभी असमानताएं सभी प्रमुख दक्षिण एशियाई अमेरिकी संस्थानों में समा गईं और अमेरिकी संस्थानों में फैल गई हैं।जिनमें महत्वपूर्ण दक्षिण एशियाई अप्रवासी आबादी है। सर्वे में इस बात का भी खुलासा हुआ कि तीन में से दो दलित अपने कार्यस्थल पर जाति के आधार पर भेदभाव का सामना कर रहे हैं।

साल 2020 से भारत की जाति व्यवस्था कई कारणों से अमेरिका के निवासियों को प्रभावित कर रही है। सबसे पहले साल 2020 में, कैलिफ़ोर्निया नियामकों ने टेक गेन सिस्को सिस्टम्स इंक पर मुकदमा दायर किया। कंपनी पर एक भारतीय अमेरिकी कर्मचारी के साथ भेदभाव करने और जातिगत उत्पीड़न की अनुमति देने का आरोप लगाया गया था।

दूसरा मामला भी साल 2020 का ही है, जब पत्रकार ईसाबेल विल्कर्सन ने अपनी किताब “कास्ट” पब्लिश की थी जो भारत में होने वाली जातिगत भेदभाव पर आधारित है। साल 2021 में न्यू जर्सी में स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण कार्य के लिए संस्था को दलितों के मानव तस्करी का दोषी पाया गया था।

अमेरिका में भारतीयों के बीच बड़े पैमाने पर जातिगत भेदभाव इस बात का सबूत है कि भारतीय जहां भी जाते हैं, अपनी जातिगत गंदगी साथ ले जाते हैं।

( जनचौक की कॉपी एडिटर कुमुद प्रसाद की रिपोर्ट)

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