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कालीमाटी से कोरस तक के सफर में डिमना बांध के विस्थापितों को क्या मिला?

लगभग आठ दशक पहले जमशेदपुर शहर के नागरिकों के पेय जल की व्यवस्था के लिए डिमना बांध का निर्माण किया गया। इस निर्माण के लिए 15 आदिवासी बहुल गांवों की 1861 एकड़ जमीन अधिग्रहीत हुई और सैकड़ों आदिवासी ग्रामीण विस्थापित हुए। उन्हें न तो पूर्ण मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास का अधिकार। आज तक वे अपने अधिकारों के लिए दरबदर हैं।

2009 में डिमना बांध के विस्थापितों ने एक रैली के माध्यम से जिला उपायुक्त, पूर्वी सिंहभूमि एवं प्रबंध निदेशक, जुस्को को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अवगत कराया था, पर आज 23 चक्र की वार्ता के बावजूद समस्याएं अपनी जगह कायम हैं।

टाटा स्टील ने विस्थापितों, वन विभाग और सरकार की 102 एकड़ जमीन पर कब्जा जमाए रखा था, पर  आज तक उसके मुआवजे के मसले का निपटारा नहीं हुआ। ग्रामीणों की 5.84 एकड़ ऐसी जमीन डूब में आ रही है जिसका अधिग्रहण तक नहीं हुआ है। सरकार, टाटा स्टील और जुस्को न तो इस जमीन का अधिग्रहण कर रहे हैं और न ही क्षतिपूर्ति देने को तैयार हैं।

डिमना बांध में मछली मारने और पर्यटन का अधिकार देने से इस आधार पर इनकार किया जा रहा है कि यह टाटा स्टील का निजी बांध है, जबकि बांध जनहित में बनाया गया है और जनहित के लिए ही भूमि अधिग्रहण किया गया था। आश्चर्य की बात है कि टाटा स्टील पानी का व्यवसाय कर रही है जो मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग का खुला उल्लंघन है।

एक और मसला है कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी का। यह दिखाने के दांत हैं। हकीकत कुछ और है फसाना कुछ और। ग्रामीण कब से स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं की मांग कर रहे हैं पर टाटा स्टील यह भी देने को तैयार नहीं है, इसलिए विस्थापितों के दिमाग में यह सवाल घूम रहा है कि टाटा के कालीमाटी से लेकर कोरस तक के सफर में हमें क्या मिला?

टायो रौल्स
उपयुक्त प्राधिकरण, श्रम, रोजगार और प्रशिक्षण (एप्रोप्रियेट ऑथोरिटी, लेबर, एम्प्लायमेंट एंड ट्रेनिंग), झारखंड सरकार ने टायो रोल्स लिमिटेड द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947) की धारा 25 (O) के तहत टायो रोल्स के ऑपरेशन को बंद करने के लिए दाखिल किए गए आवेदन को 27 अक्तूबर 2016 को खारिज कर दिया और टायो मैनेजमेंट को टायो रोल्स को चलाने को कहा। पर टाटा मैनेजमेंट ने इस आदेश को दरकिनार कर टायो रोल्स को बंद कर दिया और इसकी 350 एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया। इस आदेश के खिलाफ टाटा मैनेजमेंट झारखंड उच्च न्यायालय गई, जहां इसका रिट पिटीशन 19 अगस्त 2019 को खारिज कर दिया गया।

टाटा मैनेजमेंट ने मई 2017 में टायो रोल्स को दिवालिया कराने के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, कोलकाता में आवेदन देकर येनकेन प्रकारेण टायो रोल्स को दिवालिया करने की जुगत में लग गई। अक्टूबर 2016 से कर्मचारियों को वेतन देना बंद कर दिया और फिर मेडिकल सुविधा भी वापस कर ली।

5 अप्रैल 2019 को राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, कोलकाता ने टायो रोल्स पर मॉराटोरियम घोषित कर दिया। सरकार चाहे तो इस कंपनी को दूसरे किसी निवेशक और कर्मचारियों की कॉआपरेटिव के सहयोग से चला सकती है। उपयुक्त प्राधिकरण, श्रम, रोजगार और प्रशिक्षण (एप्रोप्रियेट अथॉरिटी, लेबर, एम्प्लायमेंट एंड ट्रेनिंग), झारखंड सरकार ने अपने 27 अक्तूबर 2016 के आदेश में कहा था कि टाटा मैनेजमेंट ने टायो रोल्स की लाभ-हानि खाते और तुलन पत्र (Profit & Loss and Balance Sheet) में हेराफेरी कर घाटे को दस गुणा दिखाया है, जो लगभग 90 करोड़ रुपये है।

सरकार इस पैसे को टाटा से वसूल कर इतने ही से टायो रोल्स को चला सकती है। अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तब सरकार इसके तमाम कर्मचारियों को उनके क्वार्टरों की बंदोबस्ती करे। 350 एकड़ जमीन का एक हिस्सा कर्मचारियों के नाम में बंदोबस्ती करे और शेष जमीन उन पांच गांवों के आदिवासियों को वापस करे, जिनकी जमीनें सरकार ने उन्हें नौकरी देने का लोभ दिखा कर अधिगृहीत कर लिया था।

इन्कैब
इन्कैब इन्डस्ट्रीज लिमिटेड को 1920 में एक अंग्रेजी कंपनी ने बनाया। 1919 में टाटा को जमशेदपुर में उसकी फैक्ट्री और व्यवसाय के लिए अंग्रेजों ने आदिवासियों की 15725 एकड़ जमीन छीन कर सरकारी अनुदान दिया (Government Grant)। इसी अनुदान से अंग्रेजों ने 177 एकड़ जमीन वापस लेकर इन्कैब को सरकारी अनुदान दिया।

65 सालों तक यह जमशेदपुर की सबसे अच्छी कंपनियों में शुमार रही। 1985 में अंग्रेजी कंपनी भारत छोड़ कर चली जाती है। तब वित्तीय संस्थानों ने जिनके पास इन्कैब की शेयरधारिता होती है, काशीराम तापुड़ियां को कंपनी चलाने के लिए अधिकृत किया और कंपनी का सर्वनाश हो गया। काशीनाथ तापुड़ियां ने वित्तीय हेराफेरी की। कंपनी बंद हो गई। वित्तीय संस्थाएं तब एक मलेशियन कंपनी युनिवर्सल लीडर को ले आती हैं, कंपनी चलाने के लिए। यह भी एक अक्षम और फ्रॉड कंपनी साबित होती है।

तब तक इन्कैब कंपनी की पुणे की 36 एकड़ जमीन पर कमला मिल्स लिमिटेड के मालिक रमेश घमंडीराम गोवानी की नजर पड़ती है। गोवानी मुबंई का कुख्यात रियल एस्टेट कारोबारी है। वह अपनी दूसरी कंपनी आरआर केबल्स लिमिटेड द्वारा इन्कैब कंपनी के पुनरूद्धार के लिए बीआईएफआर में आवेदन डलवाता है और फिर युनिवर्सल लीडर के साथ नापाक सौदा कर इन्कैब कंपनी की सारी परिसंपत्तियों पर कब्जा कर लेता है। कमला मिल्स और इसका मालिक रमेश घमंडीराम गोवानी इन्कैब की पुणे की उत्पादन इकाई के इस्तेमाल और इन्कैब की परिसंपत्तियों को किराए पर लगा कर तथा उसे अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर इन्कैब का लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक हड़प लेता है। वह बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (NPA) भी गैरकानूनी तरीके से खरीद लेता है।

6 जननरी 2016 को दिल्ली उच्च न्यायालय कमला मिल्स और आरआर केबल्स को फ्रॉड कंपनियां करार देकर बीआईएफआर के फैसले का अनुमोदन कर टाटा स्टील को इन्कैब का पुनरुद्धार करने को कहती है, पर टाटा स्टील अपने 2007 में किए गए वादे से मुकर जाती है और पुनरुद्धार की पहल नहीं करती है। तब इसके कर्मचारी अपने को ठगा सा महसूस करते हैं और उन्हें भान होता है कि टाटा की नजर सिर्फ इसकी 177 एकड़ जमीन पर थी। टाटा, इन्कैब को एक पत्र भेज कर इसकी 177 एकड़ जमीन पर अपना दावा कर अपनी ठगी को साबित भी कर देती है।

इन्कैब कोलकाता के कर्मचारियों के आवेदन पर राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, कोलकाता बीआईएफआर और दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशों, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और कमला मिल्स तथा इसके मालिक रमेश घमंडीराम गोवानी के फर्जीवाड़ों को दरकिनार कर इन्कैब के परिसमापन (Liquidation) का आदेश देती है, जिसके खिलाफ कर्मचारी राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण, दिल्ली में अपील दायर करते हैं और जमीन के मसले पर रांची उच्च न्यायालय में संशोधन (Revision) के लिए आवेदन देते हैं, जो विचारार्थ लंबित हैं।

सरकार चाहे तो इस कंपनी को थोड़े से निवेश के द्वारा खुद या किसी प्राईवेट निवेशक (जिसके लिए कई तैयार हैं) और कर्मचारियों के सहयोग से चला सकती है। कमला मिल्स से 100 करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति वसूल कर बैंकों और दूसरी देनदारियों को लगभग 25 करोड़ रुपये में निबटाकर इस कंपनी का पुनरुद्धार कर सकती है। सरकार अगर इसे चलाना नहीं चाहती तब भी इसे अपने नियंत्रण में ले, कंपनी के क्वार्टरों को कर्मचारियों के नाम बंदोबस्ती कर दे, जमशेदपुर की 177 एकड़ जमीन का कुछ हिस्सा और पुणे की 36 एकड़ जमीन कर्मचारियों में बांट दे और जमशेदपुर की शेष जमीन उसके असली आदिवासी मालिकों को लौटा दे।

जमशेदपुर
जैसा ऊऊपर कहा गया है, जमशेदपुर की जमीन एक सरकारी अनुदान है जिसे टाटा केवल अपनी फैक्ट्री लगाने और व्यवसाय के लिए इस्तेमाल कर सकती थी। टाटा ने केवल 3000 से 3500 हजार एकड़ जमीन का इस्तेमाल किया बाकी पर इसका अवैध कब्जा है। 2005 का लीज समझौता एक फर्जीवाड़ा है। सरकार जमशेदपुर की इस 12500 एकड़ के लगभग की जमीन को अपने नियंत्रण में ले और इसके सार्वजनिक हित के इस्तेमाल को छोड़ कर बाकी इसके असली आदिवासी मालिकों को लौटा दे। सारे अवैध आवंटन रद्द करे और अवैध निर्माणों को ध्वस्त करे।

(लेखक कलकत्ता हाई कोर्ट में एडवोकेट हैं।)

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This post was last modified on October 4, 2020 1:34 pm

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