Tuesday, December 7, 2021

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अखिलेश की ‘विजय यात्रा’ के मायने

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा के उपाध्यक्ष के चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र सिंह वर्मा को हराकर औऱ बागी उम्मीदवार नितिन अग्रवाल को जिताकर यह एलान कर दिया है कि इस चुनाव से 2022 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर सामने आ गई है। उनका यह भी दावा है कि समाजवादी पार्टी ने नरेंद्र वर्मा को प्रत्याशी बनाकर उन्हें धोखा दिया है। हालांकि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के करीब किया गया यह काम एक तरह की औपचारिकता मात्र था लेकिन उस पर भी योगी ने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जब साढ़े चार साल तक विपक्ष की ओर से कोई पहल नहीं हुई तो हमने नितिन अग्रवाल के रूप में एक युवा चेहरे को आगे किया। इसका सटीक जवाब नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने यह कहते हुए दिया कि `जरा बड़ा दिल दिखाइए छाती चौड़ी कीजिए, सिर्फ 56 इंच का सीना कहने से क्या होगा?’ परंपरा तो सपा की मुलायम सरकार ने निभाई थी जिन्होंने भाजपा के राजेश अग्रवाल को विधानसभा उपाध्यक्ष बनाया था। राम गोविंद चौधरी का यह भी कहना था कि चुनाव न तो गोपनीय हुआ है और न ही निष्पक्ष।

लेकिन लगता है कि भाजपा के तमाम लोकतांत्रिक नाटक का सही जवाब देने के लिए ही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी विजय यात्रा लेकर निकले हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी के तमाम कार्यक्रमों का विस्तार से कवरेज करने वाला मीडिया अखिलेश की यात्रा की ओर विशेष ध्यान नहीं दे रहा है। कानपुर के जाजमऊ से जब उनकी यात्रा निकली तब तो कुछ खबरें दी गईं लेकिन उसके बाद प्रदेश के दूसरे हिस्सों में छपने वाले संस्करणों में उनकी चर्चा नदारद थी। जो भी चर्चा की गई उसमें यही बताने की कोशिश की गई कि अखिलेश यादव के साथ बहुत सारी कमियां ही हैं। उनके घर में झगड़ा है, वे पिछली बार महज 48 सीटें ही जीत पाए थे। उन्होंने रथयात्रा इसलिए जल्दी निकाली क्योंकि प्रियंका गांधी पापुलर हो रही थीं। या उनकी विजय यात्रा की मर्सडीज बस पांच करोड़ की है। लेकिन तमाम आलोचनाओं के बावजूद यह सच्चाई तो निकल कर आ ही गई कि जहां भी अखिलेश यादव की विजय यात्रा का रथ जा रहा है वहां भारी भीड़ जमा हो रही है।

उनकी यात्रा जाम कराने वाली यात्रा साबित करने के बहाने कई अखबार यह लिख गए कि जब वे जाजमऊ पुल पर निकले तो वहां कानपुर लखनऊ रोड पर जाम लग गया। बस के साथ सेल्फी लेने के लिए समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं में धक्का मुक्की होने लगी। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से हाईवे का जाम खुलवाया। विपक्ष के लिए प्रतिकूल बन चुके समाचार माध्यमों के समाचार यह प्रमाणित करते हैं कि अखिलेश यादव की विजय रथ यात्रा में भीड़ उमड़ रही है। यही नहीं वे जनता से सहज रूप से सार्थक संवाद भी कर रहे हैं। उन्होंने यात्रा के आरंभ में जिन प्रतीकों को चुना है वे जनता को सरकार के उन कदमों की याद दिलाने वाले हैं जिनके कारण देश की अर्थव्यवस्था और विशेषकर ग्रामीण इलाकों में तबाही आई है। नोटबंदी के समय जन्मे छोटे से बच्चे खजांची नाथ ने जब झंडा दिखा कर सपा की विजय रथयात्रा का शुभारंभ किया तो साफ संदेश गया कि मजदूरों और किसानों की बर्बादी के लिए नोटबंदी जिम्मेदार है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी नोटबंदी के बाद चुनाव भी जीत चुकी है और वह दावा करती रहती है कि वह एक सही फैसला था, लेकिन रिजर्व बैंक के आंकड़े, तमाम अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण और साल भर से चल रहे किसान आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि उससे लोगों को राहत मिलने की बजाय उनकी परेशानी ही बढ़ी है।

अखिलेश यादव का यह कहना कि बाबा जी के साथ चले जाएंगे बुल और बुलडोजर सरकारी नीतियों से परेशान गांव और शहर की नब्ज पर एक साथ हाथ रखने का प्रयास है। निश्चित तौर पर गांव के किसान आज महंगाई बढ़ने और एमएसपी न मिलने से जितना परेशान हैं उससे भी ज्यादा वे परेशान हैं आवारा पशुओं से। महंगाई से खेती की लागत तो बढ़ी है और आवारा पशुओं को रोकने के लिए बाड़ का खर्च अलग से लगने लगा है। लेकिन इतने से आवारा पशु मानने वाले नहीं हैं। वे बाड़ को उखाड़ देते हैं कंटीले तारों को फांद जाते हैं और गेहूं, गन्ना धान जैसी तमाम फसलों को तबाह कर डालते हैं। यह ऐसी दुर्व्यवस्था है जिसके लिए मौजूदा सरकार की सांस्कृतिक नीति सीधे तौर पर जिम्मेदार है। वह न तो आवारा पशुओं के लिए पर्याप्त गोशालाएं बनवा रही है और न ही उनके लिए आवंटित राशि को सही तरीके से खर्च कर रही है।
अखिलेश यादव का दूसरा जोर बुलडोजर के हटने का है। बुलडोजर राजनीतिक विरोधियों के दमन का प्रतीक बन गया है। जो आंदोलन करे या मौजूदा सरकार के विरोधी दल से जुड़ा हो उसके लिए कभी भी बुलडोजर तैयार मिलेगा। इन कार्रवाइयों से मौजूदा सरकार ने अंग्रेजी राज की याद दिला दी है। उस समय जब्ती, जेल और जुर्माने का शासन चलता था और लगता है कि आज वह दौर लौट आया है।

अखिलेश यादव की मर्सडीज बस पर उनकी अपनी तस्वीर के साथ जिन दो लोगों की तस्वीरें हैं उनमें एक मुलायम सिंह हैं तो दूसरी आजम खान की। इन प्रतीकों के माध्यम से वे अपने बिछुड़े हुए मतदाता को खींच ही रहे हैं साथ ही उन किसानों के साथ भी अपने तार जोड़ रहे हैं जो साल भर से आंदोलनरत हैं और क्रूरतापूर्वक सड़क पर कुचले जा रहे हैं। यह कहना कि लखीमपुर की घटना को कोई नहीं भूलेगा क्योंकि इसमें कानून और किसान दोनों कुचले गए हैं, कृषक संवेदना के साथ खड़े होने का प्रयास है।

अखिलेश यादव पर सुस्त होने का आरोप लगता रहा है। उन पर मौजूदा सरकार के विरुद्ध नरम रुख अपनाने का भी आरोप है। यानी जनता का असंतोष उनसे जो उम्मीद कर रहा है उसके मुताबिक वे उतने आक्रामक नहीं हो पा रहे हैं। इसीलिए तमाम लोग यह चेतावनी भी दे रहे हैं कि इतने ढीले अंदाज में वे योगी और मोदी जैसे आक्रामक राजनेताओं से पार नहीं पा सकते। संभव है लोगों की इस चेतावनी में दम हो। लेकिन यहां पर कछुआ और खरगोश की वह कहानी याद आती है जिसमें अपनी धीमी लेकिन निरंतरता से कछुआ खरगोश जैसे तेज धावक को पराजित कर देता है। अखिलेश के भाषण अपमानजनक नहीं होते लेकिन उनमें चुटीलापन और पैनापन भरपूर रहता है। वे अतिसक्रिय नहीं दिखते लेकिन निष्क्रिय नहीं हैं। उत्तर प्रदेश की जनता में मौजूदा सरकार को लेकर बेचैनी है। वह विकल्प की तलाश में है। वह विकास चाहती है सिर्फ लंबी चौड़ी बातें नहीं। वह कानून व्यवस्था चाहती है लेकिन दमन और मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं। ऐसे में सपा ही ऐसी पार्टी है जो विकल्प बन सकती है। बहुत सारी आलोचनाओं के बावजूद अखिलेश उत्तर प्रदेश के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र की एक उम्मीद हैं। अब यह जनता पर निर्भर करता है कि वह सपा की विजय यात्रा को प्रदेश में परिवर्तन की यात्रा बनाती है या फिर राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन का रास्ता साफ करती है।
(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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