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नारी अपराध को सांप्रदायिक, जातीय और राजनीतिक रंग देकर विमर्श से गायब करने की साजिश

डोमिनिकन रिपब्लिक के तानाशाह राफेल ट्रजिलो ने 25 नवंबर 1960 को अपने अत्याचारी शासन के विरुद्ध बहादुरी से आवाज़ बुलंद करने वाली तीन बहनों पेट्रिया, मारिया और एंटोनिया, जिन्हें मिराबल बहनों के नाम से जाना जाता है, को नृशंसतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया था। 1981 से नारी अधिकारों के लिए कार्य करने वाले एक्टिविस्टों द्वारा इन वीर महिलाओं की शहादत की स्मृति में इस दिन हर प्रकार के नारी उत्पीड़न का विरोध प्रारंभ किया गया।

यूएन जनरल असेम्बली ने 17 दिसंबर 1999 को निर्णय लिया कि 25 नवंबर, इंटरनेशनल डे फ़ॉर द एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमेन के रूप में मनाया जाएगा। 25 नवंबर 2000 से एक निश्चित थीम के आधार पर यह दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2019 की थीम- ‘ऑरेंज द वर्ल्ड: जनरेशन इक्वलिटी स्टैंड्स अगेंस्ट रेप’ रखी गई है।

यूएन जनरल असेंबली से 1993 में पारित ‘डिक्लेरेशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमेन’ में नारियों पर हिंसा को परिभाषित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि इसके अंतर्गत जेंडर आधारित हिंसा का कोई भी ऐसा कृत्य जिसके परिणाम स्वरूप नारी को शारीरिक, यौनिक या मनोवैज्ञानिक क्षति अथवा पीड़ा पहुंचे या पहुंचने की संभावना हो सम्मिलित होगा।

नारियों पर हिंसा की परिभाषा में अंतरंग साथी की हिंसा (बार-बार प्रहार कर चोट पहुंचाना, मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना, मैरिटल रेप, हत्या) यौन हिंसा एवं यौन प्रताड़ना (बलात्कार, जबरन की गई सेक्सुअल एक्टिविटी, चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज, जबरन विवाह, सड़कों पर अभद्रता करना और सताना तथा पीछा करना, साइबर उत्पीड़न), मानव तस्करी (दासता और यौन उत्पीड़न), जननांगों को क्षति पहुंचाना और बाल विवाह सम्मिलित किए गए हैं।

नारियों पर होने वाली हिंसा के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। दुनिया की हर तीसरी महिला शारीरिक या यौन हिंसा की शिकार होती है। यह हिंसा प्रायः उसके निकट संबंधी और अंतरंग साथियों द्वारा ही की जाती है। विवाहित महिलाओं में से केवल 52 प्रतिशत महिलाओं को अपनी इच्छा से यौन संबंध बनाने, गर्भनिरोधकों का प्रयोग करने तथा स्वास्थ्य रक्षा के उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है।

प्रायः उन्हें अपने पुरुष साथी की मर्जी के अनुसार चलना पड़ता है। आज दुनिया में ऐसी 75 करोड़ महिलाएं और युवतियां हैं जिनका विवाह 18 वर्ष से कम आयु में कर दिया गया है। जबकि 20 करोड़ महिलाओं को नारी जननांगों को क्षति पहुंचाने वाले कृत्यों का सामना करना पड़ा है।

वर्ष 2017 में जिन महिलाओं की हत्या की गई उनमें हर दूसरी महिला के हत्यारे उसके साथी या परिवार जन ही थे, जबकि पुरुषों के लिए यह औसत बीस पुरुषों में एक पुरुष था। विश्व में 35 प्रतिशत महिलाओं को अपने अंतरंग साथी की शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। जबकि अपने साथी के अतिरिक्त बाहरी व्यक्तियों की यौन हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं की संख्या सात प्रतिशत है।

विश्व भर में महिलाओं की हत्या के मामलों में से 38 प्रतिशत इंटिमेट पार्टनर वायलेंस के मामले होते हैं। मानव तस्करी का शिकार होने वाले लोगों में 71 प्रतिशत महिलाएं हैं। मानव तस्करी की शिकार हर चार महिलाओं में से तीन यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं में विकलांगता और मृत्यु की जितनी घटनाएं कैंसर के कारण  होती हैं, उतनी ही या उससे अधिक यौन हिंसा के कारण होती हैं।

द नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 30 प्रतिशत महिलाओं को शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है, जबकि इसी आयु वर्ग की छह प्रतिशत महिलाओं को अपने जीवन में कम से कम एक बार यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है।

इकतीस प्रतिशत विवाहित महिलाएं अपने जीवन साथी की शारीरिक हिंसा या मानसिक यातना अथवा यौन प्रताड़ना का शिकार हुई हैं। लाइवमिंट का एक अध्ययन बताता है कि यौन हिंसा के 99 प्रतिशत मामलों की रिपोर्ट नहीं होती। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में जो स्त्री शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हैं, केवल आधा प्रतिशत यौन हिंसा के मामलों की रिपोर्ट हो पाती है।

हमारे देश में प्रति एक लाख जनसंख्या पर रिपोर्ट किए जाने वाले बलात्कार के मामलों की संख्या 6.3 है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट 2016 के अनुसार महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की संख्या 2007 में 185312 थी जो 2016 में 83 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 338954 हो गई।

2016 में नारियों के साथ होने वाले मामलों में कन्विक्शन रेट 18.9 था जो पिछले दशक की न्यूनतम दर है। 2015 में बलात्कार की रिपोर्ट की गई घटनाओं की संख्या 34651 थी जो 2016 में बढ़कर 38947 हो गई, इन मामलों में 36859 मामलों में बलात्कारी व्यक्ति बलात्कार पीड़िता का परिचित ही था।

क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट 2016 के अनुसार रेप की शिकार जीवित महिलाओं में से 43.2 प्रतिशत की आयु 18 वर्ष से कम है। भारत में सर्वाधिक मामले घरेलू हिंसा के होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का 2013 का एक अध्ययन यह बताता है कि समूचे दक्षिण पूर्वी एशिया में नारियों पर घरेलू हिंसा की दर विश्व के अन्य भागों की तुलना में बहुत अधिक है।

भारत मानवाधिकारों से जुड़े लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हस्ताक्षरकर्ता है, जिनमें नारी अधिकारों और उनके साथ होने वाले भेदभाव एवं अत्याचारों को रोकने के बड़े स्पष्ट प्रावधान हैं। इसमें कन्वेंशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ आल फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वीमेन जैसे समझौते शामिल हैं।

नारियों के साथ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। डावरी प्रोहिबिशन एक्ट 1961, इंडिसेंट रिप्रजेंटेशन ऑफ वीमेन प्रोहिबिशन एक्ट 1986, चाइल्ड लेबर प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन एक्ट 1986, प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सिलेक्शन एक्ट 1994, प्रोटेक्शन ऑफ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005, प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट 2006, इनफार्मेशन एंड टेक्नोलॉजी एक्ट 2008 बनाए गए।

इसके साथ ही द प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट 2012, क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट 2013- सेक्सुअल हैरेससेमेंट ऑफ वीमेन(प्रोटेक्शन, प्रीवेंशन एंड रिड्रेसल) एक्ट 2013, चाइल्ड लेबर प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन एक्ट 2016, क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट (डेथ पेनाल्टी फ़ॉर रेपिंग ए माइनर) 2018 जैसे कितने ही कानूनों की मौजूदगी के बावजूद नारियों के साथ होने वाली हिंसा के मामले न केवल बढ़े हैं बल्कि इस हिंसा का स्वरूप और भयानक हुआ है।

लैंगिक हिंसा के कारणों की पड़ताल इस समस्या के जटिल स्वरूप को उजागर करती है। पितृ सत्तात्मक समाज में पुरुष अर्थोपार्जन का केंद्र होता है और नारी अपनी आजीविका के लिए पुरुष पर निर्भर होती है। यह निर्भरता न केवल नारी के दमन और शोषण का कारण बनती है बल्कि नारी को अपने साथ हो रही हिंसा एवं अत्याचार को चुपचाप सहन करने के लिए विवश भी करती है, किन्तु पितृसत्ता का वर्चस्व केवल आर्थिक जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि उसका प्रसार धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में भी देखा जा सकता है, जहां पुरुष धार्मिक कर्मकांडों और सांस्कृतिक परंपराओं में नेतृत्व करता दिखता है और नारी गौण अथवा सहायक भूमिका में होती है।

नारी जब मानसिक प्रताड़ना या शारीरिक हिंसा अथवा यौन उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाती है तो उसे ज्ञात होता है कि पुलिस, प्रशासन, न्याय प्रणाली और राजसत्ता का चरित्र भी पितृसत्तात्मक है, जो उसे गलत सिद्ध कर पराजित करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है। न कानून उसके पक्ष में हैं न कानूनों को लागू करने वाले लोगों की मंशा उसे न्याय दिलाने की है।

कठुआ, मुजफ्फरपुर और उन्नाव की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि पितृसत्ता नारी को न्याय से वंचित करने के लिए क्या क्या कर सकती है और किस तरह अमानवीय रूप धारण कर सकती है। हमारी व्यवस्था नारी को न्याय की मांग करने की जुर्रत करने की भयंकर सजा भी देती है।

यह पितृ सत्ता का रणनीतिक कौशल ही था कि धीरे-धीरे इन प्रकरणों को सांप्रदायिक, जातीय और राजनीतिक रंग देकर पूरे विमर्श से नारी को ही गायब कर दिया गया। स्वयं नारियां सम्प्रदाय, जाति और दलीय राजनीति के आधार पर विभक्त होकर आपस में ही उलझ पड़ीं और इस प्रकार पीड़िताओं का पक्ष अपेक्षित प्रबलतापूर्वक नहीं रखा जा सका।

यही स्थिति हम मी टू की मुहिम के संदर्भ में देखते हैं। पुरुषों द्वारा किए गए शारीरिक-मानसिक तथा यौन उत्पीड़न के विषय में जब कुछ पीड़िताएं मुखर हुईं तो उनके विरोध को अपेक्षित प्रतिसाद नारी समुदाय से नहीं मिल सका। बल्कि अनेक नारियां इनकी आलोचना करती नजर आईं।

नारियों पर होने वाली घरेलू हिंसा (चाहे वह दहेज प्रताड़ना हो या लैंगिक भेदभाव) प्रायः घर की अन्य नारियों द्वारा ही की जाती है। यह पितृ सत्ता के वर्चस्व की गहराई को प्रदर्शित करता है, जब नारी पुरुष की मानसिक दासता के कारण अपनी समानधर्मा और सहयोगिनी  नारियों पर अत्याचार करने लगती हैं और पुरुष उसे अपने हिंसक आधिपत्य की स्थापना का माध्यम बना देता है।

राजनीति और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने वाली नारियां भी पुरुष सत्ता की मूल्य मीमांसा का अनुकरण करती देखी जाती हैं तथा नारियों पर होने वाली हिंसा के प्रति उनका रवैया कई बार बहुत असंवेदनशील होता है।

यदि सूक्ष्मतापूर्वक विचार करें तो हमारे सामाजिक ढांचे, शिक्षण प्रणाली, न्याय व्यवस्था और प्रशासन तंत्र सब पर पितृ सत्तात्मक सोच की छाप स्पष्ट दिखती है। नारी को जन्म से लेकर मृत्यु तक इस पुरुषवादी व्यवस्था से अनुकूलन करना पड़ता है।

भीरुता, आत्मसुरक्षा की प्रबल भावना, दासता कहे जाने की सीमा तक चरम समर्पण जैसे गुण जिन्हें नारी की मूल प्रवृत्ति कहा जाता है दरअसल हिंसक पुरुषवादी व्यवस्था के निरंतर आक्रमण की प्रतिक्रिया स्वरूप नारी द्वारा अर्जित विशेषताएं हैं। हिंसा पितृसत्ता के चिंतन का मूल आधार है क्योंकि इसके माध्यम से वह नारी को अनुशासित करने का परपीड़क आनंद प्राप्त करती है।

बलात्कार जैसे कृत्य नारी पर आधिपत्य स्थापित करने की आदिम पितृ सत्तात्मक सोच की हिंसक अभिव्यक्तियां हैं और इनके लिए यौन परितुष्टि की भावना से अधिक नारी को शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुंचा कर  उसे परास्त करने की विकृत सोच उत्तरदायी होती है।

आज जब हम नारियों पर होने वाली हिंसा की चर्चा करते हैं तो हमारा जोर हिंसा की स्थूल अभिव्यक्तियों पर होता है किंतु हिंसात्मक सोच की बुनियाद पर खड़ी पुरुषवादी व्यवस्था में परिवर्तन लाने का मूलभूत मुद्दा अचर्चित रह जाता है।

(डॉ. राजू पाण्डेय वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on November 25, 2019 12:53 pm

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