सत्ता की मलाई मिलते ही शिवपाल ने उतार फेंका सेकुलर चोला, मायावती के पूर्व बंग्ले से चलेगा मोर्चे का दफ्तर

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चरण सिंह

नई दिल्ली। गत लोकसभा चुनाव में देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में 73 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार भी वह परिणाम दोहराने के लिए हर स्तर से लग गई है। प्रदेश में बसपा और सपा के गठबंधन की चल रही अटकलों से बेचैन भाजपा इसे कमजोर करने का माध्यम ढूंढ रही है। क्योंकि उत्तर प्रदेश चुनाव में बेहतर प्रदर्शन का जिम्मा यहां के मुख्यमंत्री योग आदित्यनाथ को दिया गया है तो वह अपने हिसाब से समीकरण बनाने में लगे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे व हाल में ही बने सेक्युलर मोर्चा के मुखिया शिवपाल यादव को सपा और बसपा के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की फिराक में है।

इस बीच कई बार वह शिवपाल यादव को मिलने के लिए अपने आवास पर बुला चुके हैं। साथ ही मायावती से खाली कराया गया बंगला उन्हें दे दिया गया है। बताया जा रहा है कि मायावती के आवास के तौर पर काम करने वाला यह बंगला अब सेक्युलर मोर्चा के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मायावती इसी बंगले के पास दूसरे बंगले में शिफ्ट हो गई थीं।

भाजपा का इस तरह से बंगले को शिवपाल यादव को सौंपना उन्हें साधने के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। सपा में महत्वपूर्ण पदों पर रहने और परिवार का सदस्य होने की वजह से शिवपाल यादव को अखिलेश यादव की हर कमजोरी मालूम है। गेस्ट हाउस कांड की वजह से चली आ रही मायावती के साथ अदावत को भी वह समाजवादी पार्टी में फूट डालने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। दोनों ही पार्टीयों में टिकट बंटवारे में जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलेंगे उन्हें अपने मोर्चे से टिकट देकर उनका वोट काट सकते हैं।

दरअसल इस खेल के पीछे अमर सिंह का हाथ बताया जा रहा है। अमर सिंह लम्बे समय से अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव के साथ ही मो. आजम खां को सबक सिखाने की फिराक में हैं। वह लगातार इन लोगों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। कभी मुलायम परिवार के सबसे करीब रहने वाले अमर सिंह आजम खां को ललकारने रामपुर तक पहुंच गए थे।

दरअसल शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के विवाद के बाद शिवपाल यादव और अमर सिंह का याराना हो गया था। वैसे भी गत दिनों जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में मंच से अमर सिंह का नाम लिया था। तभी साफ हो गया था कि बीजेपी किसी नई खिचड़ी को पकाने के फिराक में है। अब उसकी तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रहा है। समाजवादी पार्टी में कभी राष्ट्रीय स्तर पर अमर सिंह तो प्रदेश स्तर पर शिवपाल यादव मुख्य नेता हुआ करते थे। इस लिहाज से पार्टी में अभी भी इन दोनों का काफी नेताओं पर प्रभाव माना जाता है। यह बात भाजपा बखूबी जानती है।

वैसे भी जिस तरह शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी से पुराने नेताओं को तोड़ने में लगे हैं, उस हिसाब से यह सिलसिला लगातार चलता रहा तो चुनाव आते-आते वह सपा को काफी कमजोर सकते हैं। वैसे भी अखिलेश यादव के पार्टी संभालने के बाद शिवपाल यादव के करीबी अधिकतर नेता घर बैठ चुके थे, जिन्हें शिवपाल यादव धीरे-धीरे सेक्युलर मोर्चे में ला रहे हैं। समजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव शिवपाल यादव को काफी समय तक राजनीतिक दल बनाने से रोके रखे थे। 

शिवपाल यादव कह रहे थे कि मोर्चे के गठन में नेताजी का उन्हें आशीर्वाद प्राप्त है। ऐसे में दिल्ली संसद रोड पर होने वाली सपा की रैली में मुलायम सिंह न केवल अखिलेश यादव और राम गोपाल के साथ मंच पर बैठे बल्कि समाजवादी पार्टी को कभी बूढ़ी न होने का युवा कार्यकर्ताओं से वादा भी लिया। ऐसे में भाजपा को शिवपाल यादव को और उकसाने का मौका मिल गया और दूसरे दिन ही उन्होंने मोर्चे के कई मंडल प्रभारी नियुक्त कर दिए।

वैसे मोर्चे के भविष्य की बात करें तो शिवपाल यादव के बंगले का इस्तेमाल करने पर भाजपा और शिवपाल यादव दोनों  को राजनीतिक  नुकसान है। इस बंगले में सेक्युलर मोर्चे का कार्यालय खुलने पर शिवपाल यादव पर भाजपा के लिए काम करने की मुहर लग जाएगी। दूसरी ओर जो नेता और मतदाता शिवपाल यादव से उम्मीद लगाए बैठे हैं उनका विश्वास उनसे उठ जाएगा।

मायावती और अखिलेश यादव को शिवपाल यादव के खिलाफ एक मुद्दा मिल जाएगा। वैसे भी सेक्युलर मोर्चे का मतलब भाजपा के खिलाफ बनने वाला संगठन है। यदि ऐसे में मोर्चे का कार्यालय भाजपा के रहमोकरम पर चलता है तो समाज में इसका कितना गलत संदेश जाएगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में अगर शिवपाल यादव  भाजपा के खिलाफ कुछ बोलते भी हैं तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा। क्योंकि तब तक कभी सपा का कद्दावर नेता रहा ये शख्स अपनी साख गवां चुका होगा।

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