चिड़ियाघरः संरक्षण केंद्र या नुमाइश घर

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पिछले कुछ महीने से आरिफ और सारस की ‘दोस्ती’ को लेकर सोशल मिडिया पर कुछ विडियो और विवाद खूब वायरल हुआ। लाखों की संख्या में लोगों ने इसे देखा। बाद में इस मसले पर राजनेता भी अपने बयान के साथ उतर आये। देखते-देखते आरिफ के खिलाफ सरकारी नोटिस भी जारी कर दिया गया। मसले की नजाकत को देखते हुए सारस को वन विभाग ने चिड़ियाघर ले जाने का निर्णय लिया। यहां से मसला सोशल मिडिया से निकलकर एक ऐसे दायरे में चला गया, जिसे सुलझाना कानून से जितना आसान लगता हो, उतना आसान नहीं लगता है।

सारस को अंततः कानपुर चिड़ियाघर में रखा गया। वहां उसे 15 दिन के लिए क्वैरेंटाईन में रखा गया। उसे क्वैरेंटाईन इसलिए किया गया क्योंकि वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार उस पर इंसान की छाप पड़ चुकी थी। आरिफ को 27 दिन बार सारस से मिलने की अनुमति दी गई। निश्चित रूप से यह मिलना दूर से ही था। दोनों की मुलाकात का विडियो भावुक कर देने वाला था।

दोनों के बीच के रिश्ते को देखकर पेटा- पीपुल्स फाॅर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनीमल्स ने अपने बयान में ‘दिल तोड़ देने वाला’ दृश्य बताया। पेटा ने अपने ट्विटर बयान में कहा, ‘यूपीफाॅरेस्टयूपी, हम आपसे गुजारिश करते हैं, कृपया सारस को वहां छोड़ दें जहां से लाया गया था। एक जंगली चिड़िया को बंद रखना संरक्षण नहीं है। जिस किसान ने उसकी जिंदगी बचाई, उसे देखकर सारस की प्रतिक्रिया दिलतोड़ देने वाला था।’

कई बार दृश्य जरूर दिल को हिलाकर रख देने वाले होते हैं, लेकिन कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। यानी, निर्णय उपयुक्त है या नहीं, यह देखना जरूरी है। चिड़ियाघर एक आधुनिक अवधारणा है। यह सरंक्षण से अधिक नुमाइश के अधिक करीब लगता है। मसलन, जगह की तंगी से जूझ रहे शहरों में चिड़ियाघर बनाना एक बेहद कठिन काम है। इसका एक बड़ा उद्देश्य लोगों को पर्यावरण से परिचय कराना और आबादी के दबाव से बाहर ढकेले जा रहे पशु-पक्षियों को सरंक्षित करना भी है।

यह एक बेहद नजाकत भरा मसला है। यहां रह रहे पशुओं, पक्षियों और जीवों को दूर से ही सही इंसानों के सानिध्य में रहना पड़ता है। और इससे बचने के लिए उनके पास बहुत थोड़े से विकल्प उपलब्ध होते हैं। यह लोगों के लिए पर्यावरण सरंक्षण और परिचय से अधिक मनोरंजन का साधन अधिक होता है। अधिक सुविधासंपन्न लोग वन अभ्यारण्य में ‘जंगल सफारी’ का लुत्फ लेते हैं।

यहां दिल्ली के चिड़ियाघर में एक ऐसे ही लुत्फ की घटना मेरे एक मित्र ने बताई। यह पिछले महीने की बात है, छुट्टी का दिन था। चिड़ियाघर में खूब भीड़ थीं। लोग एक बंद घर से दूसरे बंद घर की ओर बढ़ते जा रहे थे और जानवरों के व्यवहार आदि का मजा ले रहे थे, उसे बुला रहे थे। एक बंद घर में एक लोमड़ी लगातार गोल-गोल घूम रही थी। बच्चे उसे देखकर हंस रहे थे और आवाज लगा रहे थे। उसी समय एक बड़ी उम्र की महिला ने कहा, ‘चलो रे, चलो! ये लोमड़ी मेंटल हो गई है।’ इस वाकये को सुनकर मैं भी खूब हंसा। इंसान ने अपनी मनोवैज्ञानिक समस्या को उस लोमड़ी के व्यवहार पर आरोपित किया था। 

क्या वास्तव में यह लोमड़ी ‘मेंटल’ हो गई थी? यहां पेटा, भारत की निदेशक पूर्वा जयपुरिया को उद्धृत करना उपयुक्त होगाः ‘चिड़ियाघर किसी के लिए भी ठीक नहीं है। उन जानवरों के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है जो यहां जन्म लेते हैं। यहां तक कि वे जानवर भी जो दूसरी दुनिया के बारे में जानते भी नहीं हैं, बहुधा उनकी मानसिक और शरीरिक स्थिति भी चिड़ियाघर के बंद घरों में बिगड़ जाती है। बहुत सारे असामान्य व्यवहार करते हैं जो उनके न्यूरोसिस की समस्या को दिखा रहे होते हैं, जैसे लगातार गोल घूमना, असामान्य गति, सिर को जोर जोर हिलाना, लहराना, लोटना-रगड़ना, उल्टी करना, आदि आदि।’ 

चिड़ियाघरों में जानवरों की देखभाल के लिए डाक्टर और विशेषज्ञ होते हैं और निश्चय ही उनकी देखभाल की जाती है। यहां यह ध्यान देने की बात है, यह सब इंसान की निगरानी और उसके सानिध्य में ही होता है। इन पर इंसान की छाप लगातार बनी हुई होती है। यहां मसला यही है कि क्या पर्यावरण को इंसान की छाप से बाहर रखा जा सकता है? और, क्या इस छाप को ‘अपराध’ के अंतर्गत ला देने वाले कानून संगत हैं? इसका जबाब बेहद कठिन है। आरिफ और सारस के बीच की ‘दोस्ती’ इन सवालों को सोचने लिए और एक नये दृष्टिकोण को अपनाने की ओर इशारा कर रही है।

हरेक जानवर, पक्षी आदि का अलग-अलग व्यवहार होता है। कुछ समूह में रहते हैं और कुछ दूसरे तरीके को अख्तियार करते हैं। और, इन सबके ऊपर इंसानों द्वारा उन पर लादा हुआ पर्यावरण होता है जिसके भीतर ही उन्हें जिंदगी बसर करनी होती है। मसलन, दिल्ली के प्रदूषित पर्यावरण में चीलें खुद को बदल रही हैं। गौरेया का जीना मुहाल हो रहा है और वे गायब होती जा रही हैं। गिद्ध अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि तेंदुएं नोएडा और गुड़गांव जैसी आधुनिकता से लैस अपार्टमेंट में घुसे चले आते हैं।

लोगों को यदि पर्यावरण के बारे में ठीक से बताया जाय और संरक्षित करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाये, स्वतस्फूर्त प्रयासों को ‘अपराध’ की श्रेणी में डाल देने की बजाय संरक्षण की नेतृत्वकारी भूमिका में ले आया जाय, तब स्थिति कहीं बेहतर बन सकती है।

आरिफ ने सारस को सुरक्षित किया, उसकी आजादी को उसने छीना नहीं और जब भी सारस उसके पास आया उसे प्यार और सुरक्षा दिया। आरिफ ने अपनी ही थाली में वही खाना उसे खिलाया जो वह खुद खाता था। यह भी उसका प्यार था। आरिफ को नहीं पता था, कि उसे इंसानी भोजन पर निर्भर नहीं बनाना है। इस शिक्षा की जिम्मेदारी निश्चित रूप से वन और पशु संरक्षण से जुड़े विभागों की है। यह पर्यावरण की शिक्षा से जुड़ा मसला है, जिसकी जिम्मेदारी इससे जुड़े विभाग को उठाना ही होगा।

(अंजनी कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं।) 

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