आजमगढ़ की वो रात कभी नहीं भूली जाएगी। जब सनी कुमार की मौत की ख़बर उसके घरवालों तक पहुंची, तो जैसे पूरा गाँव सुलग उठा। सनी, 21 साल का दलित युवक, जिसकी आंखों में मोहब्बत के सपने थे, वो अब पुलिस थाने के अंधेरे कोने में झूल रहा था। परिवार को यकीन नहीं हुआ-क्या ये वही लड़का था, जो दो दिन पहले तक ज़िंदगी के सुनहरे ख्वाब बुन रहा था?
तरवां थाने के उमरी पट्टी गाँव का सनी, अपने ही गाँव की एक दलित लड़की से बेपनाह प्यार करता था। दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन समाज की जंजीरों ने उनके अरमानों को कैद कर दिया। लड़की के परिवार वालों को ये रिश्ता मंज़ूर नहीं था। 28 मार्च को लड़की के पिता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई कि सनी उनकी बेटी के साथ बदसलूकी करता है, उस पर फब्तियां कसता है, मोबाइल में अश्लील गाने बजाता है। ये इल्ज़ाम कितना सच था, ये कोई नहीं जानता, लेकिन उसके अगले ही दिन पुलिस ने सनी को घर से उठा लिया।

29 मार्च की रात 8 बजे सनी को पुलिस ने गिरफ़्तार किया और फिर वो घर वापस नहीं लौटा। घरवालों को उससे मिलने नहीं दिया गया। 30 मार्च की रात, थाने के भीतर क्या हुआ, कोई नहीं जानता। लेकिन 31 मार्च की सुबह टॉयलेट में 4 फीट ऊंची खिड़की से फंदे से लटका उसका शव मिला। पुलिस ने इसे आत्महत्या करार दिया। मगर सवाल उठता है-कैसे? चार फीट ऊंची खिड़की से सनी ने फांसी कैसे लगा ली? क्या कोई सच छुपाया जा रहा था?
गुस्से की लपटों में जल उठा गांव
सुबह होते ही सनी की मौत की ख़बर आग की तरह फैल गई। परिवार थाने दौड़ा, मगर वहां कुछ भी नहीं मिला। शव तो पहले ही पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया था। इस पर गुस्साए ग्रामीणों ने थाने को घेर लिया। पुलिस ने जैसे-तैसे हालात संभाले, लेकिन गुस्सा थमा नहीं। भीड़ सड़कों पर उतर आई, आज़मगढ़-चिरैयाकोट और वाराणसी रोड जाम कर दिए गए। दोपहर में पुलिस पर पत्थरबाज़ी हुई, गाड़ियां तोड़ी गईं। जवाब में पुलिस ने लाठियां बरसाईं, आंसू गैस के गोले छोड़े। मॉनिटरिंग सेल के इंस्पेक्टर अखिलेश मौर्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

शाम 6 बजे पुलिस ने सनी का शव उसके घर लाकर रख दिया, लेकिन परिवार वाले अंतिम संस्कार के लिए तैयार नहीं थे। वे अड़े थे कि सनी को वहीं दफन किया जाए, जहां से लड़की का परिवार था। घंटों तक पुलिस अफसर परिवार को मनाते रहे। आखिरकार, रात के अंधेरे में, 12 बजे के बाद, सनी को बाग में दफना दिया गया।
उधर, लड़की का परिवार फरार हो गया। लेकिन सवाल वहीं के वहीं हैं-क्या सनी को इंसाफ मिलेगा? क्या ये प्रेम की सज़ा थी, या जाति का अभिशाप? क्या पुलिस की हिरासत में कोई खुद को मार सकता है, या फिर ये वो सच है जिसे कोई सुनना नहीं चाहता?
इंसाफ की राह पर संघर्ष
पोस्टमॉर्टम के बाद जब पुलिस की गाड़ियों के साथ सनी का शव घर पहुंचा, तो पूरे माहौल में मातम घुल गया। करुण चीखें फिज़ाओं में गूंजने लगीं। मां का कलेजा चीरती हुई रुदन की आवाजें, बहनों की हिचकियां और पिता की बेबसी ने माहौल को और ग़मगीन बना दिया। इस बीच, नाराज़ भीड़ ने इंसाफ़ की मांग को लेकर प्रदर्शन तेज़ कर दिया। सनी के परिजनों की एक ही मांग थी-आख़िरी संस्कार उसके घर के सामने हो। लेकिन पुलिस अफ़सर उन्हें समझाने में नाकाम साबित हो रहे थे।
सनी के परिजनों का दावा था कि जिस बाथरूम में उसका शव मिला, वहां का दरवाज़ा खुला था। गले में पैजामे के नाड़े का फंदा कसा था। गार्ड इस पूरी घटना का चश्मदीद था। बावजूद इसके, पुलिस ने परिजनों को बिना सूचना दिए शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। रोते-बिलखते सनी के पिता ने आरोप लगाया कि उनकी मासूम औलाद को ज़बरदस्ती मौत के घाट उतारा गया है। उनका दावा था कि लड़की के पिता, जो एक शिक्षक हैं, उन्होंने पुलिस को घूस देकर सनी की हत्या कराई। पुलिसवालों ने उनके बेटे को बेरहमी से मारकर फांसी पर लटका दिया।

रात के 9:30 बज रहे थे, जब एसपी हेमराज मीणा तरवां थाने पहुंचे। करीब 20 मिनट बाद एडीजी पीयूष मोर्डिया भी वहां पहुंच गए। थाने के भीतर दो घंटे तक चली गहन बैठक के बाद अफ़सरों ने परिजनों से मुलाकात की और सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया। इंसाफ़ की उम्मीद में डूबे परिवार वालों ने भारी मन से अंतिम संस्कार के लिए सहमति दी।
रात के अंधेरे में पुलिस ने जल्दबाज़ी में जेसीबी मंगवाई। इस दौरान भाजपा के जिला अध्यक्ष ध्रुव कुमार सिंह और प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अखिलेश मिश्रा गुड़ू ने सनी को कंधा दिया। अंततः रात 12 बजे के बाद शव को गांव के बाग़ में दफ़ना दिया गया। मगर इंसाफ़ की इस लड़ाई का यह अंत नहीं था। एसएसपी हेमराज मीणा ने तरवां थाना प्रभारी कमलेश पटेल, एक दरोगा और एक सिपाही को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या यह काफ़ी था?

विपक्षी दलों ने इस घटना को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा नेताओं ने इसे दलितों पर अत्याचार करार देते हुए सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव भी पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे। उन्होंने इस घटना को सत्ता की मनमानी करार देते हुए कहा, “गरीबों, पिछड़ों और दलितों के साथ अन्याय हो रहा है। भाजपा सरकार भेदभाव कर रही है। यह युवक की सुनियोजित हत्या है। हथकड़ी में जकड़े व्यक्ति के लिए आत्महत्या संभव नहीं। गरीब, पिछड़ों और दलितों के साथ अन्याय हो रहा है। भाजपा सरकार भेदभाव कर रही है। युवक की हत्या सुनियोजित तरीके से की गई है। हथकड़ी के बाद युवक फांसी नहीं लगा सकता है। पुलिस मामले की गंभीरता से जांच करे।”
आज़ाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने इस अमानवीय घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा। उनका कहना था, “अब तक सामने आए तथ्यों से स्पष्ट है कि यह पुलिस हिरासत में मौत का मामला है। दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें तत्काल गिरफ़्तार किया जाए। पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा मिलना चाहिए।”
आजमगढ़ में बढ़ रहा तनाव
दलित युवक की इस रहस्यमयी मौत के बाद पूरे इलाके में भय और आक्रोश व्याप्त है। लोगों के ग़ुस्से को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए हैं। किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए कई थानों की पुलिस को अलर्ट कर दिया गया है। संवेदनशील इलाकों में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है, ताकि माहौल बिगड़ने से रोका जा सके।
इस मामले की गंभीरता को समझते हुए जिलाधिकारी नवनीत सिंह चहल ने पूरी घटना की मजिस्ट्रेटियल जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन किसी भी सूरत में दोषियों को बख्शेगा नहीं। हर पहलू की बारीकी से जांच होगी और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हेमराज मीणा ने दावा किया कि स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है और प्रशासन हर स्थिति पर पैनी नज़र बनाए हुए है। उन्होंने कहा, “घटना के हर पहलू की निष्पक्ष जांच कराई जा रही है। फिलहाल मृतक के शरीर पर किसी तरह के चोट के निशान नहीं मिले हैं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से स्पष्ट होगा कि मौत की असली वजह क्या थी।”
सूत्रों के अनुसार, दलित युवक को किसी मामले में पूछताछ के लिए पुलिस ने हिरासत में लिया था, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उसकी मौत की खबर आई। पुलिस ने शुरुआती तौर पर इसे स्वाभाविक मौत करार देने की कोशिश की, लेकिन परिजनों ने आरोप लगाया कि युवक की मौत पुलिस की पिटाई और प्रताड़ना के कारण हुई। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश है, वहीं प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई करते हुए तरवां थाना प्रभारी कमलेश कुमार पटेल, शाहिद और अन्य पुलिसकर्मियों पर हत्या, SC/ST ऐक्ट और शांतिभंग की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई।
पुलिस अधीक्षक नगर शैलेंद्र लाल ने बताया कि मृतक की मां द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर एडीजी वाराणसी जोन पियूष मोर्डिये के निर्देश पर मुकदमा दर्ज किया गया है। इस मामले की जांच फूलपुर क्षेत्राधिकारी को सौंपी गई है, जो हर पहलू की बारीकी से जांच करेंगे। मृतक के परिवार ने इस घटना को न्यायिक जांच के दायरे में लाने की मांग की है और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की अपील की है। घटना को लेकर किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि निष्पक्ष जांच होगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

लेकिन सवाल जस का तस बना हुआ है-क्या सनी को न्याय मिलेगा? या फिर यह भी एक ऐसा मामला बन जाएगा, जो धीरे-धीरे लोगों की यादों से मिट जाएगा? न्याय की इस लड़ाई में अब पूरा समाज सनी के परिवार के साथ खड़ा है, और वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक न्याय नहीं मिल जाता।क्या यह मुआवजा उस मां की सिसकियों को शांत कर पाएगा, जिसने अपने बेटे को कभी वापस न देखने की बददुआ तक न मांगी थी? क्या कानून सनी के बेकसूर होने की गवाही देगा? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
किसान नेता राजीव यादव कहते हैं कि, “न्याय की इस जंग में इंसाफ़ कितना और कब मिलेगा, यह तो वक़्त ही बताएगा, लेकिन इस रात की सिसकियां और चीखें शायद कभी खामोश न हों आजमगढ़ के इस काले अध्याय ने फिर एक बार हमारी व्यवस्था की उस क्रूर सच्चाई को सामने ला दिया, जहां दलित युवकों की ज़िंदगियां महज कुछ पन्नों पर दर्ज किए गए एफआईआर से ज्यादा कुछ नहीं होतीं। इंसाफ की उम्मीद अंधेरे में लटकी है-शायद उसी तरह, जैसे सनी की लाश थाने के टॉयलेट में लटकी पाई गई थी।“
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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