अजय जी जौनपुर की गंगा-जमुनी तहजीब और समृद्ध परंपरा की जिंदा मिसाल थे

अजय जी ने इस फानी दुनिया से विदा ले ली है। अपना सब कुछ इसी दुनिया में छोड़कर सीखते समझते बूझते और लड़ते हुए उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। उनके बारे में कुछ कहते हुए मैं कई तरह के दबाव तनाव से गुजर रहा हूं। कैसे इस सहज सरल और बाल सुलभ निश्छल व्यक्तित्व को याद करूं।  यह सोचते हुए लगभग 1 महीने निकल गए और कलम नहीं उठी। आज अंदर से हिम्मत जुटाकर कुछ कहने की कोशिश कर‌ रहा हूं।

बात 1982 की फरवरी की है। जब मैं पहली बार अजय जी से मिलने के लिए डॉक्टर अवधेश प्रधान के साथ जौनपुर गया था। पहली मुलाकात में ही ऐसा लगा जैसे हमारा युगों पुराना रिश्ता हो। औपचारिकता नाम की कोई बात थी ही नहीं। मैं जिस परिवेश से निकल कर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन में दाखिल हुआ था। उसमें ढेर सारी झिझक सामंती नैतिकता और पिछड़े मूल्यों व आदर्शों की दीवारें मेरे व्यवहार और विचारों में भरी पड़ी थी। इसलिए जब मैं अजय जी के यहां पहुंचा और पहली ही मुलाकात में आशा जी और अजय जी के साथ जिस तरह की आत्मीयता और खुलापन का एहसास हुआ।

उससे मुझे कई तरह की ग्रंथियों से लड़ने में मदद मिली। मेरे संकोची स्वभाव में थोड़ा खुलापन आया। अजय जी साफ़-साफ़ अपनी बात कहते और बाल सुलभ जिज्ञासा के साथ सवाल पूछते। ढेर सारे सवाल उन्होंने मुझसे किया।अपने बारे में बताया मेरे बारे में और जानना चाहा। ऐसा लगता था कि वे इस मुलाकात में ही सब कुछ जान समझ लेना चाहते थे। ऐसे अनेक प्रश्न थे जिनका उत्तर उस समय मेरे पास भी नहीं था।

नक्सलबाड़ी के महान क्रांतिकारी विस्फोट से पैदा हुई विराट संभावना के बिखरने के एक दशक बाद पुनर्गठन की कोशिशों के बीच मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। ऐसा लगा कि इस दौरान वे भाकपा माले के किसी धारा के  संपर्क में नहीं थे। ऐसा भी कहा जा सकता है कि तब तक मुख्य धारा नाम की कोई संगठित राजनीतिक दिशा थी भी नहीं। जो कुछ उस समय दिखाई सुनाई दे रहा था। वह था आधे-अधूरे बलिदान व रोमांच से भरपूर कथाओं किंवदंती बन चुके शहीदों के वृतांत के घाल मेल से बना रहस्यमय आभामंडल। फिर भी मेरे लिए यह मुलाकात यादगार थी। मैं दो दिन वहां रहा। 

उस समय हम लोगों की जगह-जगह बिखरे हुए मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों के नेताओं समर्थकों और शुभचिंतकों से मिलने का खास मकसद था। उन्हें अप्रैल के आखिरी हफ्ते में दिल्ली में होने वाले तीन दिवसीय सम्मेलन में शामिल होने के लिए‌ तैयार करना। सम्मेलन का उद्देश्य था एक संयुक्त मोर्चे का गठन। जिससे इंदिरा निरंकुशता के खिलाफ चल रहे विभिन्न प्रवृत्तियों विचारों वाले जन आंदोलनों के नेताओं कार्यकर्ताओं को एक मंच पर संगठित किया जा‌ सके।  

मेरे जौनपुर जाने का एक उद्देश्य और था। अजय जी और ओमप्रकाश मिश्र (जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए कुछ समय के लिए पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे और उस समय जौनपुर में होम्योपैथिक डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस कर रहे थे) के साथ मिलकर जौनपुर में पार्टी इकाई का गठन किया जा सके। 

दो दिन के प्रवास के दौरान अजय जी से उनके जीवन के बारे में बहुत सारी बातें हुईं। वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 60 के दशक के शुरुआत में ही पहुंच गए थे। यह समय युवा पीढ़ी में आजादी के प्रति मोहभंग का समय था।इसलिए 60 का दशक भविष्य में घटित होने वाले तूफानी राजनीतिक घटनाओं को आवेग देने वाले दशक में बदल रहा था। जिससे 70 के दशक में ठोस आकर लेने वाली घटनाओं के संकेत मिलने लगे थे। 

60 के दशक के मध्य में बनारस में वाम‌-राजनीति का विस्तार हो रहा था। कामरेड रुस्तम सैटिन शहर दक्षिणी से‌ विधायक और बनारस के क्रांतिकारी गांधी सत्यनारायण सिंह 1967 में बनारस लोकसभा से सांसद चुने गए थे। कॉ. सत्यनारायण सिंह नई-नई बनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तर प्रदेश के पहले सांसद चुने गए थे।

साहित्य जगत में युवा कवि सुदामा पांडे ‘धूमिल’ की धूम मची हुई थी। बनारस सोशलिस्ट नेता राज नारायण का गृह जिला था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय मे छात्रों युवाओं में विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को लेकर तीखा वैचारिक संघर्ष चल रहा था। छात्र आंदोलन की नई लहरें उठ रही थी। 1967 तक आते-आते “अंग्रेजी हटाओ ” के नाम पर छात्र युवा  आंदोलन शुरू हो गया। जिसके पीछे संसोपा और आरएसएस की तख्त लगी थी। वस्तुत: यह पहला दौर था।

जब छात्रों युवाओं के बुनियादी सवालों की जगह को उत्तर भारत में भाषा आंदोलन ने घेर लिया। डॉक्टर लोहिया के वैचारिक नेतृत्व में उत्तर भारत में नए तरह का राजनीतिक वातावरण बन रहा था। 67 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह कांग्रेस से बाहर आ गए और पहली बार उप्र में संविद सरकार का गठन हुआ। जिसकी बुनियाद गैर कांग्रेस वाद पर टिकी थी।

यह परिवर्तन तेजी से घटित हो रहा था। उत्तर भारत में करीब नौ राज्यों में कांग्रेस विधानसभा का चुनाव हार गई थी। बंगाल में भी संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी। जिसमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी बड़े घटक के रूप में शामिल थी। 

राजनीतिक तरलता के वातावरण में बंगाल में कम्युनिस्ट आंदोलन तेज हो गया। संयुक्त मोर्चे की सरकार आने से पैदा हुए नए उल्लास के वातावरण में उत्तरी बंगाल के सिलीगुड़ी जिले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में किसान विद्रोह शुरू हो गया। जिसे शुरुआत में ही संयुक्त मोर्चा सरकार का दमन झेलना पड़ा । इस किसान संघर्ष की बुनियादी चारित्रिक विशेषता थी कि इसकी अगुवाई समाज के सबसे कमजोर वर्गों जैसे आदिवासी दलित मजदूर भूमिहीन किसानों के हाथ में थी। इस आंदोलन के वर्ग चरित्र की बुनियादी विशिष्टता ने भारत के राजनीतिक वातावरण में भूचाल ला दिया ।     

जो युवा सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भाषाई क्षेत्रवाद की विचारधारा के प्रभाव में भाषा आंदोलन में शामिल हुए थे। उसका रेडिकल हिस्सा नक्सलबाड़ी के पक्ष में आ खड़ा हुआ। उस समय बंगाल के कॉलेज विश्वविद्यालय सड़कें गलियां युवाओं के नए जोश के कारण युद्ध के मैदान बन गए थे। घबराए हुए शासक वर्ग ने इन पर भीषण राज्य दमन ‌तेज कर दिया।

आंदोलन की चिंगारी राष्ट्रीय स्तर पर फैलने के क्रम मे वाराणसी पहुंची। बनारस में वाम आंदोलन उभार पर था। जिसके रेडिकल हिस्से ने नक्सलबाड़ी के राजनीतिक संदेश को समझने और आत्मसात करने कोशिश की और उसके साथ जुड़ गया। उस समय बनारस में प्रगतिशील वाम लेखकों राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी तादाद थी। नक्सलबाड़ी के संघर्ष प्रभाव‌ छात्रों युवाओं पर बढ़ना था। युवा अजय कुमार इस दौर में बनारस में पढ़ रहे थे और साठोत्तरी पीढ़ी के कवियों लेखकों के मध्य आना जाना था। 

जिसके केंद्र में धूमिल थे। उनके इर्द-गिर्द कंचन कुमार, विश्व चंद्र शर्मा, करुणा निधान, विभास दास और अफसर आदि अनेक युवा लेखकों, कवियों चित्रकारों, कलाकारों की नई पीढ़ी आ गई। यहीं से नक्सलबाड़ी के हिंदी भोजपुरी के साहित्यकारों की पहली पीढ़ी तैयार हुई। बाद में ‌नक्सलवादी के महान कवि लेखक चिंतक दार्शनिक संगठन कर्ता गौरव पांडे जुड़ गए। फिर बीएचयू में ‌महेश्वर, बलराज पांडे, अवधेश प्रधान सहित अनेक युवा लेखकों साहित्यकारों की नई पौध तैयार हो गयी। 

इस पीढ़ी के सबसे युवा लेखक कवि आलोचक डॉक्टर अवधेश प्रधान के साथ 1982 में ‌मैं अजय कुमार जी से मिलने जौनपुर गया था।

कहने का मतलब यह है कि 1960 का दशक भारतके समाज और राजनीति का संक्रमण काल था। अजय कुमार जी इस संक्रमण काल के सशक्त हस्ताक्षर थे। उनके व्यक्तित्व की  बहुआयामी समन्वयवादी क्रांतिकारी बुनियाद इसी दौर में पड़ी थी। जिस पर वह ताजिंदगी अमल करते रहे और उन्होंने उसे विकसित समृद्ध और जन पक्षधर बनाने में सम्पूर्ण जीवन खपा दिया।

अजय जी के निर्माण में उनके परिवार की आर्यसमाजी पृष्ठभूमि और स्वतंत्रता सेनानी पिताजी का बड़ा योगदान था। बचपन से ही घर में भारतीय नवजागरण की सशक्त तर्क वादी धारा आर्य समाज के प्रभाव के कारण अंधविश्वास मूर्ति पूजा पाखंड के लिए कोई जगह नहीं थी। पिता श्री रामेश्वर प्रसाद जौनपुर जिले के पहले कांग्रेसी थे। जिन्हें 1921 के कांग्रेस अधिवेशन  जौनपुर जिले के पहले प्रतिनिधि के बतौर भाग लेने का गौरव हासिल है।

वह “समय” नामक पत्रिका के संपादक और पत्रकार थे। उनके हिंदी प्रेम की मिसाल हिंदी भवन जौनपुर है। जो बरसों से साहित्य संस्कृति कला प्रेमियों का संगम स्थल है। हिंदी भवन सिर्फ जौनपुर ही नहीं बल्कि पूर्वांचल में हिंदी के प्रचार प्रसार का काम वर्षों से करता रहा है। जिसमें प्रकाश पुस्तकालय है। जहां अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां और पत्र पत्रिकाएं संरक्षित हैं। इसलिए हिंदी भवन आज भी शोधार्थियों के आकर्षण का केन्द्र है।

रासमंडल मुहल्ले में स्थित रामेश्वर प्रसाद जी का घर (जिसे बाबू साहब की हवेली कहा जाता है) स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था। जहां गांधी जी, पं नेहरु, सरदार पटेल के साथ अनेकों स्वतंत्रता सेनानी साहित्य प्रेमी आते रहते थे। आर्यसमाजी चौधरी चरण सिंह तो रामेश्वर बाबू के गहरे मित्र और समान विचारधारा के होने के कारण घनिष्ठ सहयोगी भी थे। इसलिए जब भी वो जौनपुर आते थे तो रामेश्वर बाबू के यहां जरूर पहुंचते थे। जौनपुर के सहकारिता आंदोलन में रामेश्वर प्रसाद जी का बड़ा योगदान है। वह जिला सहकारी बैंक के संस्थापक अध्यक्ष थे। वर्षों तक इस पद पर रहे।

इस तरह अजय जी जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते थे। उसमें स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्य, आर्य समाज का तर्कवाद और आजाद भारत के निर्माण की समाजवादी प्रगतिशील दिशा के साथ-साथ साहित्य संस्कृति के विभिन्न प्रगतिशील लोकतांत्रिक धाराएं एक साथ समाहित थीं।

आपको यह जानकार सुखद आश्चर्य होगा कि गांधी जी पं. नेहरू, चौधरी चरण से लेकर आधुनिक भारत के सबसे बड़े मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारक चिंतक स्वप्न द्रष्टा और भाकपा माले के महासचिव कॉमरेड विनोद मिश्र तक उस‌ घर में ठहर चुके हैं।

यही नहीं हिंदी उर्दू साहित्य के बड़े-बड़े हस्ताक्षर वामिक जौनपुरी नरेश सक्सेना, ठाकुर प्रसाद सिंह, त्रिलोचन शास्त्री तो आते ही थे। मुझे जैसी जानकारी मिली थी कि सज्जाद जहीर यानी बन्ने भाई भी वहां आ चुके थे। वह मूलतः जौनपुर के खेतासराय के बगल के गांव के रहने वाले थे। वामिक जौनपुरी के लिए तो हिंदी भवन और बाबू साहब की हवेली दूसरा घर था। मैं कई बार वामिक साहब से अजय जी के घर या हिंदी भवन में मिल चुका हूं और उन्हीं से नीला परचम सहित कई नज्म सुन चुका हूं। उस दौर के कई यादगार संस्मरण मेरे पास है।

इस तरह अजय जी का व्यक्तित्व स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों आदर्शों परंपराओं सामाजिक सुधार के तर्क वादी विचारों और आधुनिक भारत के निर्माण की वाम प्रगतिशील वामपंथी धारा के साथ टकराव के बीच में ही निर्मित और विकसित हुआ था। लेकिन उनकी वैचारिकी की जड़ें जौनपुर के सैकड़ों वर्ष पुराने इतिहास की गहराइयों तक जाती है। जो 14वीं शदी के शर्की सल्तनत की प्रेम समन्वय आपसी भाईचारे और मिली जुली सांस्कृतिक विरासत के साथ जुड़ी हुई है। जौनपुर शहर का मूल इतिहास शर्की सल्तनत (1394 -1479) से शुरू होता है। जिसे फिरोज शाह तुगलक ने चचेरे भाई मोहम्मद बिन तुगलक की याद में बसाया था। शर्की सल्तनत के समय ही जौनपुर स्वतंत्र रियासत बना। 

इसी कालखंड में जौनपुर भोजपुरी और अवधी के संगम स्थल पर स्थित होने के कारण शिक्षा संस्कृति वास्तु कला लोक संगीत (लावनी) के केन्द्र के बतौर विकसित हुआ। अवधी में भी कई गीत रचे गए। शर्की सल्तनत का समय जौनपुर का स्वर्ण काल था।जौनपुर में नृत्य नाटक संगीत की समृद्ध परंपराएं तभी से चली आ रही हैं। यह सब सूफी परंपरा की उच्च मानवीय मूल्यों (जैसे प्रेम करुणा और समन्वय भाईचारा) के साथ घुल मिलकर भारत की महान संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई। 

इसी काल में शानदार मस्जिद मकबरे और महल बने जिसमें अटाला मस्जिद शाही किला लाल दरवाजा मस्जिद जामा मस्जिद फिरोज शाह का मकबरा सहित अनेक पुरातात्त्विक महत्व की इमारतें हैं। क्लासिक इंडो इस्लामिक परंपरा की खूबसूरत इमारतें जौनपुर की आत्मा हैं। दूर-दूर से शोधार्थी इन इमारतों की स्थापत्य कला का अध्ययन करने के लिए आते हैं। सूफी मत की प्रेम और समन्वयवादी संस्कृति फलती फूलती आज तक जौनपुर के आत्मा में रची-बसी है।

यह बात दृढ़ता पूर्वक कहा जा सकता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में जौनपुर जैसा समन्वयवादी मिली जुली सभ्यता संस्कृति कोई अन्य नहीं दिखाई देता। इसलिए जौनपुर सबसे अलग है। यहां अवधी, उर्दू हिंदी भोजपुरी सभी भाषाएं एक साथ मिलकर एक रूप हो जाती हैं। इसी जौनपुर के सच्चे वारिस अजय जी थे। जो खुद में जौनपुर को जीते थे और जौनपुर उनमें उनकी सांसों व आत्मा में बसता और जीता था। 

16वीं सदी का अकबर द्वारा बनवाया हुआ शाही पुल जिस तरह से शहर को सदियों से जोड़े रखा है। वैसे ही अजय जी आज के समय में जौनपुर की साझी मिली-जुली संस्कृति समाज और परंपरा को जोड़ने वाले सेतु थे। वे तथाकथित प्रगतिशीलों लोकतंत्र वादियों व सामाजिक न्यायवादियों की तरह बनावटी आवरण नहीं ओढ़े हुए थे। समावेशी संस्कृति और जीवन प्रणाली उनकी अंतरात्मा में  इस तरह से प्रवाहित होता था। जैसे सदियों पुरानी  भारतीय जनसंस्कृति की अमृत धारा हमारे समाज में अदृश्य रूप से प्रवाहित होती चली आ रही है।

अजय जी के साथ शहर में निकलने पर ऐसा लगता था कि हम शहर की गलियों सड़कों से नहीं बल्कि अजय जी के अंदर बह रही जौनपुर की महान समन्वय वादी सरिता के तट पर विचरण कर रहे हों। वह गोमती की तरह से  सदा बहने वाली निर्मल जल धारा थे। वह जिस तरह तन्मय होकर जौनपुर की नदी इमारतें मोहल्ले सामाजिक जीवन खासियत को व्याख्यायित करते थे। वह हमारे जैसे लोगों को चमत्कृत कर नये ज्ञानालोक की यात्रा पर ले जाता था। 

अटाला मस्जिद की नक्काशी हो फिरोजशाह के मकबरे का मेहराब या गोमती की दाहिनी तरफ तीन गुंबदों वाली मस्जिद हो। (जिसे जौनपुर में बाबरी मस्जिद का जुड़वा भाई आज भी माना जाता है। जिसकी ऐतिहासिकता असंदिग्ध है। यह लेखक 6 वर्षों तक अयोध्या के रामकोट मुहल्ले में बाबरी मस्जिद के बगल में ही रह चुका था। इसलिए इस मस्जिद की बाबरी मस्जिद के साथ समानता को देखकर आश्चर्यचकित था।) यह अजय जी ही थे जिन्होंने पुरातात्विक महत्व की इमारतों की विशेषताओं को थोड़ा-थोड़ा समझने की दृष्टि दी। आज सोचता हूं कि मैं कला साहित्य की बारीकियों को उनसे सीखने से वंचित रह गया। जिसका मुझे बहुत अफसोस है।

अजय जी की कविताएं लेख रिपोर्ताज और संस्मरण बेजोड़ हुआ करते थे । ‘मुरादाबाद को देखकर” उनकी कविता ने मुझे हिला दिया था।कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की भाषा में बारीक संवेदनाओं के साथ लिखे गए रिपोर्ताज उत्तेजित करते थे। आईपीएफ स्थापना सम्मेलन के  समय फिरोज शाह कोटला मैदान में आए तूफान और वारिस का क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए मुकाबले पर लिखा गया उनका रिपोर्ताज’ आंधी और तूफान के खिलाफ एक मोर्चा’ आज भी याद है।

वामिक साहब की खानदानी हवेली के बारे में “लाल कोठी का सन्नाटा” नाम से लिखी गई पुस्तिका वस्तुत: जौनपुर की विरासत और ऐतिहासिक संदर्भों में सामाजिक जीवन की बारीकियां को अभिव्यक्त करती है। उनकी कविताएं दंगे सांप्रदायिक उन्माद और राज्य दमन द्वारा पैदा की गई पीड़ा से उपजी हुई चिंता और छटपटाहट की बेजोड़ अभिव्यक्ति हैं। जो डराती हैं ,परेशान करती हैं, लेकिन हमें अंधेरे के खिलाफ खड़ा होने की ताकत देती हैं।

वह हिंदी के थे या उर्दू के। इस सवाल का जवाब जौनपुर ही दे सकता है। उन्हें सब अपना मानते थे । उनकी मौत की खबर के बाद जब मैं जौनपुर पहुंचा। तो एक उर्दू के युवा साथी ने कहा अब हम लोग किसकी सरपरस्ती में आगे बढ़ेंगे। वे मेरी एक-एक शायरी की एक-एक लाइन के एक-एक हर्फ को ठीक करते और लिखने के लिए प्रेरित करते थे। अब तो हमारे सर की छाया ही चली गई। सीधे राजनीतिक नेता न होने के बावजूद जौनपुर के वाम दलों के साथी और अन्य लोकतांत्रिक लोगों कहना था कि हमारा स्वाभाविक संरक्षक नहीं रहा। जिनकी आड़ में हर बुरे वक्त में हम लोग खड़े हो जाते थे। उन्हें आगे कर सुरक्षित महसूस करते थे। 

उनके वैचारिक विरोधी भी उनके प्रशंसक और मुरीद थे। वह समाज के हर तबके यानी सड़क पर काम करने वाले मजदूर से लेकर उच्च मध्य वर्ग तक समान रूप से स्वीकार्य थे। 80 के दशक के शुरुआत में हाफ शर्ट और हाफ पैंट पहने हुए जब वह रासमंडल से किला होते हुए शाही पुल की तरफ जाते थे। तो उनके साथ चलते हुए मुझे भी गर्व महसूस होता था। ठेले वाले दुकान दार अध्यापक वकील हर वर्ग और हर समाज के लोगों का उनके साथ गहरा लगाव था।सबके दोस्त थे। सबके अपने थे ।सबके संरक्षक थे और सबके सम्मानित अजय जी थे।

अजय जी के बेटे अपल जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए। तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने पूछा  इलाहाबाद और बनारस को छोड़कर अपल को आपने अलीगढ़ क्यों भेजा। तो उनका उत्तर सुनकर मैं अजय जी की शख्सियत की खासियत को समझ सका। उनका कहना था कि आज के दौर में अलीगढ़ ही वह जगह है जहां से हम हिंदी पट्टी की आत्मा तक पहुंच सकते हैं। तहजीब संस्कृति साहित्य कला सभ्यता और इंसानियत के बुनियादी पाठ एएमयू ही जाकर पढ़े जा सकते हैं। अफसोस आज वही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हिंदुत्व वादियों के निशाने पर है। जिसने हिंदी उर्दू के तमाम अदीबों चिंतकों लेखकों शायरों विचारको को जन्म दिया और गढ़ा है। लेकिन आज का विध्वंसक हिंदुत्व “जो कुछ इस देश में सत्य सुंदर और कल्याण कारी है” उसे निगल जाना चाहता है।

अंत में आशा जी से अलग करके अजय जी को नहीं समझा जा सकता है। आशा जी छात्र जीवन से ही उनकी ‌दोस्त सहयोगी सहधर्मिणी और संरक्षक हैं। उनकी प्रबंध कुशलता व्यावहारिकता और सहज सरल मानवीयता अपनी जगह पर एक नई आभा खड़ा करती है। अजय जी ने छात्र जीवन में ही अपनी जिंदगी की बागडोर आशा जी के हाथ में सौंप कर सारे भौतिक तनाव से मुक्ति पा ली थी। आशा जी ने उनके विश्वास समर्पण और उनके सच्चे मित्र  सहयोगी के रूप को स्वीकार कर उसे और गढ़ा व्यवस्थित किया और एक ठोस शक्ल दी।अजय जी तो सूफी संत थे ।फक्कड़ और मस्त मौला इंसान ।

जिसे खुद की भी चिंता न थी। वे सच्चे दरवेश थे। लेकिन आशा जी ने उन्हें संभाला। बचाए रखा और समाज और मनुष्यता के लिए उनको समर्पित कर दिया। मैं जब अजय जी के बारे में सोचता हूं ।तो बार-बार बस आशा जी सामने आकर खड़ी हो जाती हैं और यह कहती हैं कि जेपी तुम अजय को समझाओ। यह एक भी बात को न गंभीरता से लेते हैं और ना समझते हैं। तब अजय जी की हा हा करके हंसती हुई निश्छल और मीठी आवाज फूट पड़ती थी। जेपी आशा तुम्हारी ही बात सुनती है और तुम्हें मुझसे ज्यादा सम्मान और मोहब्बत देती है।

आज अजय जी नहीं हैं। उनके साथ बिताए गए पल और इस परिवार के साथ गुजरे एक एक लमहे आंखों के सामने से गुजर रहे हैं। और मन को भारी बना दे रहे हैं।

अंत में जौनपुर को जब संघ और भाजपा ने हिंदुत्व की प्रयोग स्थली में बदलने का प्रयास किया। जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष राजा यादवेंद्र दत्त दुबे की रहनुमाई में जौनपुर को सांप्रदायिकता की प्रयोग स्थली बनाने के लिए अटाला मस्जिद सहित सभी पुरातात्विक महत्व की इमारतों को विवादास्पद  बनाने का प्रयास हुआ। तो मेरा मानना है कि 300 मीटर की दूरी में स्थित अजय जी का पैतृक आवास और हिंदी भवन की सांस्कृतिक सामाजिक साहित्यिक गतिविधियां उस षड्यंत्र के समक्ष‌ एक बड़ा अवरोधक बनकर खड़ा हो गईं।

जौनपुर आज भी अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता समन्वय वादी परंपरा प्रेम सद्भाव और गंगा जमुनी तहजीब के साथ बासबूत बचा है। बाबू साहब की हवेली हिंदी भवन तथा अजय जी की जैसे अनेकों लोगों के प्रयास भविष्य में भी अपनी लोकतांत्रिक भूमिका निभाते रहेंगे। इसी उम्मीद के साथ में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अपने प्रिय कामरेड अजय जी को- जिन्हें मैंने अपने हाथों से भाकपा माले का सदस्य बनाया था- गर्व के साथ याद करता हूं। लाल सलाम कामरेड अजय कुमार।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी कार्यकर्ता हैं।)

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