हे गृहमंत्री जी! आरोप लगते ही सजा देना इंसाफ नहीं साजिश कहलाता है

पहले इन दो उदाहरणों पर गौर कीजिए। दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के कथित शराब घोटाला मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया और लम्बे समय तक जेल में रखा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को जमानत दी और वे जेल से बाहर निकले। केजरीवाल जब तक जेल में रहे जेल से ही दिल्ली की सरकार को चलाते रहे और जब जमानत पर आये तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लेकिन कहानी यही नहीं है कि केजरीवाल जेल गए और जमानत पर बाहर आ गए।

असली कहानी तो यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट केजरीवाल को जमानत दे रहा था तब ईडी पर उसने सख्त टिप्पणी की थी और कहा था – ”ईडी की गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। पीएमएलए की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी के लिए ठोस सबूत की जरूरत है, न कि केवल संदेह के आधार पर।” अदालत के सामने ईडी मौन रही। ऐसा लगा मानो उसका कोई अपना इकबाल ही नहीं है। वह इशारों पर चलती है और सरकार का जो आदेश होता है उसे पूरा करती है। 

केजरीवाल को जमानत देते समय शीर्ष अदालत ने सीबीआई पर भी टिप्पणी की थी और कहा था कि ”सीबीआई ने गिरफ्तारी के लिए कोई विशिष्ट कारण नहीं दिखाया है। केवल संदेह के आधार पर हिरासत सीआरपीसी और संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है।” यहाँ भी सीबीआई मौन रही। मानो उसे लकवा मार दिया हो। 

दूसरा उदाहरण झारखंड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जुड़ा है। हेमंत सोरेन को ईडी ने 31 जनवरी, 2024 को जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार किया था। तब हेमंत झारखंड के मुख्यमंत्री ही थे। जेल जाने से पहले उन्होंने इस्तीफा दिया था। तब झारखंड में चुनावी बिगुल भी बज चुका था। करीब 5 महीने तक जेल में रहने के बाद झारखंड हाई कोर्ट ने हेमंत को जमानत देते हुए ईडी को जमकर फटकार लगाई थी और कहा था कि ”ईडी के पास कोई ठोस सबूत नहीं है कि हेमंत सोरेन ने कोई कथित अपराध किया। बरामद दस्तावेज में न तो हेमंत सोरेन का नाम है और न ही उनके किसी परिवार का ही। ” 

यहाँ भी ईडी मुँह लटकाये सब कुछ सुनती रही। जुबान तक नहीं खुली। 

आजाद भारत के ये दो ऐसे ताजा उदाहरण हैं जिससे पता चलता है कि केंद्र की सरकार अपने हित साधने और सामने वाले को ख़त्म और बदनाम करने के लिए कुछ भी कर सकती है। उसे पद से हटा भी सकती है। जेल भी भेज सकती है और उसके खिलाफ एक बड़ा नैरेटिव भी खड़ा कर सकती है। 

ये उदाहरण यहाँ इसलिए रखे जा रहे हैं क्योंकि अभी दो दिन पहले ही संसद सत्र के अंतिम दौर में सरकार की तरफ से सदन में कुछ ऐसे संविधान संसोधन बिल 130 पेश किये गए हैं जिसे समझकर ही लगता है कि अभी भी सरकार विपक्षी दलों के साथ क्या कुछ करने को तैयार है?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को संविधान में 130वाँ संशोधन पेश किया, जिसके तहत गंभीर आरोपों में गिरफ्तार और 30 दिनों की जेल में बंद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्रियों को पद से हटाया जा सकता है। इस संशोधन बिल में प्रधानमंत्री का भी नाम जोड़ा गया है ताकि लोगों और देश को यह लगे कि अगर प्रधानमंत्री भी कुछ गलत करते हैं तो वे जेल जा सकते हैं। लेकिन कोई भी कल्पना कर सकता है कि क्या इस देश की हालिया कोई भी जांच एजेंसी मौजूदा प्रधानमंत्री को गिरफ्तार कर सकती है ? 

क्या इतना साहस और नैतिक बल किसी भी एजेंसी के पास बचा रह गया है?जाहिर है यह सब केवल दिखाने की एक कला भर है। असली खेल तो यही है कि विपक्षी सरकार को कैसे गिराया जा सकता है और कैसे विपक्षी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को जमींदोज किया जा सकता है। उसे कैसे तोड़ा जा सकता है और कैसे उसे बीजेपी में मिलाया जा सकता है। हालांकि इस बिल के विरोध में विपक्ष जब खड़ा हुआ तब इसे जेपीसी के पास भेजा गया है। आगे क्या होगा यह देखने की बात होगी। 

इधर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स  यानी एडीआर द्वारा चुनावी हलफनामों के विश्लेषण से प्राप्त आंकड़ों से पता चला है कि भारत के लगभग 42 प्रतिशत मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक आरोपों की घोषणा की है। यह जानकारी ऐसे समय में सामने आई है जब विपक्ष ने नरेंद्र मोदी सरकार पर गंभीर आरोपों में गिरफ्तार होने पर मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को पद से हटाने के लिए विधेयक पेश करके तानाशाही थोपने का आरोप लगाया है। उधर ,विपक्ष का कहना है कि यह संशोधन खतरनाक है क्योंकि यह आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए बिना भी निर्वाचित प्रतिनिधियों को हटाने का आधार प्रदान करता है।

एडीआर द्वारा दिसंबर, 2024 में मुख्यमंत्रियों द्वारा भारत के चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों की जानकारी के साथ तैयार की गई एक रिपोर्ट से पता चला है कि 31 में से 13 मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक आरोपों की घोषणा की है। इनमें से 10 मुख्यमंत्रियों पर हत्या के प्रयास, अपहरण, रिश्वतखोरी और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर आरोप हैं। इन 10 में से सात मुख्यमंत्री विपक्ष शासित राज्यों से हैं, दो भाजपा के सहयोगी दलों के हैं और एक भाजपा का है।

इन सब बातों के अलावा, यहाँ भारत के उन मुख्यमंत्रियों की सूची दी गई है जिन पर गंभीर आरोप हैं। एडीआर के अनुसार, ऐसे आरोपों में या तो अधिकतम पाँच साल या उससे अधिक की सज़ा हो सकती है; ये गैर-ज़मानती और संज्ञेय हैं; चुनावी अपराध हैं; राजकोषीय हानि से संबंधित अपराध हैं; हमला, हत्या, अपहरण, बलात्कार; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत उल्लिखित अपराध; भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अपराध; और महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध अपराध शामिल हैं।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमुला रेवंत रेड्डी हैं। रेड्डी तेलंगाना की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री हैं। लेकिन इनके खिलाफ राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर 89 मुक़दमे दर्ज हैं। इनमें गंभीर धाराओं के तहत 72 मुक़दमे दर्ज हैं। जाहिर है उनके खिलाफ कभी भी बड़ी कार्रवाई की जा सकती है और उन्हें जेल में डाला जा सकता है। जेल गए तो फिर इस्तीफा लिया जा सकता है और फिर सरकार का क्या होगा वह आप समझ सकते हैं। या तो सरकार ख़त्म होगी या फिर मंत्री विधायक टूट जायेंगे और सरकार गिर जाएगी। 

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  एम.के. स्टालिन पर भी 47 मुक़दमे दर्ज हैं। स्टालिन डीएमके पार्टी के प्रमुख भी हैं। इनके खिलाफ 11 गंभीर धाराओं में मुक़दमे दर्ज हैं। 

इसी तरह आँध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जिनके सहारे मौजूदा मोदी की सरकार चल रही है, उनके खिलाफ भी 19 मामले दर्ज हैं। इन मामलों में 32 गंभीर अपराध बताये जाते हैं। ये टीडीपी के प्रमुख हैं। जिस दिन सरकार के खिलाफ जाने की कोशिश करेंगे उसी समय इनके खिलाफ कोई मामला दर्ज हो सकता है और इनकी मुश्किलें बधाई जा सकती है। 

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और यहाँ के मुख्यमंत्री हैं सिद्धारमैया। इनके खिलाफ 13 मामले दर्ज हैं  जिनमें 6 मामले काफी संगीन बताये जाते हैं। इसी तरह झामुमो प्रमुख और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ 5 मामले दर्ज हैं जबकि 7 धाराओं में गंभीर आरोप लगे हुए हैं। हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के खिलाफ भी मामले दर्ज हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के खिलाफ भी दो मामले दर्ज हैं और सिक्किम के सीएम पीएस तमांग के खिलाफ भी मामले दर्ज हैं। 

जाहिर ये सभी मुख्यमंत्री गैर बीजेपी शासित राज्यों के हैं और इन राज्यों में बीजेपी पहुँचने की पूरी कोशिश भी कर रही है। अगर संसद में लाये गए विधेयक अगर सफल हो जाते हैं तो जाहिर है कि केंद्र सरकार जरूरत के मुताबिक़ बड़ा ऑपरेशन चलाकर इन सरकारों को डिस्टर्ब कर सकती है और इन मुख्यमंत्रियों के खिलाफ बड़ा एक्शन भी ले सकती है। जानकार मान रहे हैं कि ये सारे खेल इसलिए किये जा रहे हैं ताकि मोदी और शाह की सत्ता लम्बे समय तक अक्षुण्ण रह सके। 

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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