तंत्र की तानाशाही और पत्रकारिता पर अंकुश के विरूद्ध बुलंद आवाज थे नैयर साहब

देश के नामचीन पत्रकार-लेखक दिवंगत कुलदीप नैयर (14 अगस्त,1923- 23 अगस्त, 2018) का आज निर्वाण दिवस है। कई अच्छे मार्ग-दर्शक पत्रकारों की तरह वह अक्सर याद आते हैं। पर उन्हें आज खासतौर पर याद करने के दो कारण हैं-एक तो आज उनका निर्वाण दिवस है और दूसरा ये कि कुलदीप नैयर और उन जैसे पत्रकारों ने जिस इमरजेंसी और प्रेस पर पाबंदी का जमकर विरोध किया था; उसका और भी भयानक रूप आज हमारे देश में दिख रहा है! किसी औपचारिक घोषणा के बगैर आज की सत्ता इमरजेंसी के दौर की सत्ता से भी ज्यादा निरंकुश दिख रही है। निरंकुशता के साथ घनघोर सांप्रदायिकता, वंचितों-पिछड़ों की उपेक्षा और समाज को धर्म के नाम पर बांटने का विभाजनकारी पहलू भी आज सत्ता के चरित्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। 

नैयर साहब को मौजूदा सत्ता-पक्ष ने ही उनके निधन के कुछ समय बाद पद्मभूषण से नवाजा था। पर एक पत्रकार के तौर पर नैयर साहब ने मौजूदा सत्ताधारियों के इस केंद्रीयतावादी चरित्र की शिनाख्त पहले ही कर ली थी। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक नरेंद्र मोदी की सरकार पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने बीबीसी के लिए लिखा था कि “भाजपा की वर्तमान सरकार में किसी भी कैबिनेट मंत्री की कोई अहमियत नहीं रह गई है।” 

मीडिया की आज़ादी पर उन्होंने लिखा था, “आज लोग यह तेज़ी से महसूस कर रहे हैं कि अगर दशकों पहले इंदिरा गांधी का एकछत्र राज था तो आज की तारीख़ में यही राज नरेंद्र मोदी का है। ज़्यादातर अख़बारों और टेलीविज़न चैनलों ने उनके काम करने के तरीके को मान लिया है जैसा कि इंदिरा गांधी के वक़्त में कर लिया था। हालांकि नरेंद्र मोदी का एकछत्र राज इस मामले में और बदतर हो गया है कि बीजेपी सरकार के किसी भी कैबिनेट मंत्री की कोई अहमियत नहीं रह गई है और कैबिनेट की सहमति सिर्फ कागज़ी कार्रवाई बन कर रह गई है।”

अगर कुलदीप नैयर आज एक सक्रिय पत्रकार-लेखक के तौर पर जीवित होते निश्चय ही वह मौजूदा सत्ता के एकाधिकारवादी, निरंकुश, बहुजन-विरोधी और कम्युनल चरित्र के खिलाफ तमाम जोखिम के बावजूद आवाज ज़रूर उठाते। 

कुलदीप नैयर साहब से देखा-देखी और एक औपचारिक सी मुलाकात छात्र-जीवन में हुई थी। पर उनसे मेरी ठीक से जान-पहचान और थोड़ी-बहुत निकटता तब हुई, जब मैं भारत की संसद के उच्च सदन-राज्यसभा के टीवी चैनल का कार्यकारी संपादक बना। जब कभी मैं अनुरोध करता, वह चैनल पर संवाद के लिए तैयार हो जाते। कई बार तो वह ओबी वैन से जुड़ने की बजाय सीधे स्टूडियो आने को तैयार हो जाते। कुछेक बार वह मेरे अपने साप्ताहिक कार्यक्रम ‘मीडिया मंथन’ के पैनेलिस्ट बनकर आ जाते और इस तरह हमारे कार्यक्रम में ‘चार चांद’ लग जाता! एक बार मैंने कहा भी कि नैयर साहब आपके आने से हमारे ‘शो’ में ‘चार चांद’ लग गया! वह हंस पड़े! 

किसी खास काम से एक-दो बार उनके आवास पर भी जाना हुआ। बहुत अच्छे से मिलते और अच्छी चाय के साथ देर तक बतियाते। जम्मू-कश्मीर के आधुनिक इतिहास पर मेरी किताब: कश्मीर विरासत और सियासत(2006) का संशोधित संस्करण 2016 में आया। इस मौके पर एक चर्चा का आयोजन रफी मार्ग दिल्ली स्थित बिट्ठल भाई पटेल हाउस में हुआ। उसमें प्रेमशंकर झा, संजय काक, शुजात बुखारी (अब दिवंगत) और एमएम अंसारी के साथ कुलदीप नैयर भी आये और समारोह में दो घंटे बैठे रहे! मेरी किताब और कश्मीर पर अच्छा भाषण दिया। 

नैयर साहब साफ-साफ बोलने वाले आदमी थे। लिखने में भी उनका वही अंदाज था। निष्पक्षता के नाम पर ‘शब्दों की जलेबी’ बनाने में उनका यकीन नहीं था। मैंने कई मौकों पर देखा, कुछेक मुद्दों पर मत-भिन्नता उभरती तो उसे पाटने की भरपूर कोशिश करते। फिर भी वह नहीं पटती तो असहमति का आदर करते हुए उस मुद्दे को वहीं छोड़ भी देते। पर आमतौर पर वह अपनी बात से हटते नहीं। 

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को सामान्य और सहज बनाने की उन्होंने हर संभव कोशिश की। इसके लिए सिर्फ लिखा और बोला ही नहीं; एक्टिविज्म भी किया। अंग्रेजी के बहुत सारे पत्रकारों की तरह उनमें वर्गीय कुलीनता या भाषायी  श्रेष्ठताबोध तनिक भी नहीं था। वैसे भी उन्होंने अपने लेखन और पत्रकारिता की शुरुआत भाषायी (उर्दू) पत्रकारिता और लेखन से की। बाद में अंग्रेजी पत्रकार-लेखक बने।

नैयर साहब की स्मृति को जीवंत रखने के लिए उनके और उनके परिवार द्वारा प्रदत्त सहयोग से गांधी शांति प्रतिष्ठान ने कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान योजना शुरू की। संयोग और सौभाग्य देखिये कि 2023 का यह सम्मान मुझे दिया गया। 

नैयर साहब के स्मृति दिवस पर उन्हें सलाम और श्रद्धांजलि!

(उर्मिलेश लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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