Sunday, May 29, 2022

journalism

असली पत्रकारों के लिए खड़ा हो गया है अस्तित्व का संकट

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन और उत्तरोत्तर गिरती स्थिति पर चर्चा और विमर्श जारी है। हाल के दिनों में पत्रकारों के दमन और उत्पीड़न के समाचारों की आवृत्ति भी चिंताजनक रूप से बढ़ी है। पत्रकारों को...

सरोकारविहीन हो गयी है मौजूदा दौर की पत्रकारिता

दिनेशपुर, उत्तराखंड में अखिल भारतीय लघु पत्र-पत्रिका सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। कुछ समय पूर्व पलाश विश्वास ने पत्रकारिता और साहित्य के संपादन संबधों की चर्चा की थी जिसमें मूल बात यह थी कि रघुवीर सहाय और सव्यसाची...

पूर्व आईपीएस अधिकारी ने पत्र लिखकर मुकेश अंबानी से अपने चैनल पर लगाम की लगाई गुहार

नई दिल्ली। रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी विजय शंकर सिंह ने एक पत्र लिखकर मुकेश अंबानी को उनके चैनल न्यूज-18 द्वारा परोसे जा रही घृणा पर रोक लगाने की गुहार लगायी है। उन्होंने पत्र से पहले के अपने वक्तव्य में बताया...

सत्ता की पालकी ढो रही है मीडिया

आज के जमाने में भी ऐसे प्राणी/तत्व/चारण पाए जाते हैं, जो शासक वर्ग का गुणगान करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देते हैं। यूं तो राजे-रजवाड़ों का जमाना अब नहीं रहा और उनके बदले में भारत सहित अधिकांश देशों...

नहीं रहे पत्रकारिता के कमाल

वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान का शुक्रवार सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरी पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान की हृदयगति...

कहां लुप्त हो गयी खोजी पत्रकारिता: चीफ जस्टिस

देश के चीफ जस्टिस एनवी रमना ने बुधवार को कहा कि भारतीय मीडिया में खोजी पत्रकारिता गायब हो रही है। बुधवार को डिजिटल माध्यम से एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि पहले समाचार पत्रों...

डूब गया पत्रकारिता का नक्षत्र

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ का निधन हो गया है। विनोद दुआ 67 साल के थे और पिछले काफी समय से बीमार होने के चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था ।  विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ ने इंस्टाग्राम...

स्वर्णा और समृद्धि का अग्नि-बपतिस्मा!

सिर्फ़ एक वाक्य का संदेसा टेलीप्रिंटर के ज़रिए आया था। अंग्रेज़ी में लिखा था - “यू हैव गॉट योअर बैप्टिज़्म बाइ फ़ायर”- प्रभाष। जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी ने मेरी एक रिपोर्ट पर हुए हंगामे के बाद ये संदेसा मेरे...

1857 की क्रांति, उर्दू पत्रकारिता और भारतीय पत्रकारिता का पहला शहीद

सबसे पहले तो इस किताब के शीर्षक में ‘क्रांति’ शब्द पर ध्यान जाता है। अपने देश में सन् 1857 के ब्रिटिश हुकूमत-विरोधी जन-विद्रोह को तरह-तरह की संज्ञाओं और विशेषणों से नवाजा जाता है। तब भारत में ब्रिटिश कंपनी-ईस्ट इंडिया...

संघर्षों और बलिदानों से भरा पड़ा है हिंदी पत्रकारिता का इतिहास

1826 की 30 मई को कोलकाता की आमड़ातल्ला गली से प्रकाशित अल्पजीवी हिंदी पत्र उदन्त मार्तण्ड ने इतिहास रचा था। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी थी, जिसे पत्र के संपादकों ने “मध्यदेशीय भाषा” कहा था।...
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समान नागरिक संहिता के नाम पर ढकोसला कर रही है धामी सरकार

यह जानते हुये भी कि समान नागरिक संहिता राज्य सरकार या विधानसभा का विषय नहीं है, फिर भी उत्तराखण्ड...
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