सुप्रीम कोर्ट संक्षिप्त: एनआरसी के मसौदे में संशोधन की  याचिका पर सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा

एक महत्वपूर्ण कदम में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के मसौदे और रजिस्टर की पूरक सूची – जिसे 2019 में असम में अपडेट किया गया था – में संशोधन के लिए एक रिट याचिका विचारार्थ स्वीकार कर ली है। साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, असम में एनआरसी के कार्यान्वयन की देखरेख के लिए नियुक्त अधिकारी और भारत के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआई) को नोटिस जारी कर मामले पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी है।

दरअसल  असम के नागरिकों की तैयार अंतिम सूची यानी अपडेटेड एनआरसी 31 अगस्त, 2019 को जारी की गई थी, जिसमें 31,121,004 लोगों को शामिल किया गया था, जबकि 1,906,657 लोगों को इसके योग्य नहीं माना गया था। हालांकि, भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने इसे अधिसूचित नहीं किया है।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ द्वारा पारित सुप्रीम कोर्ट का 22 अगस्त का आदेश ऐसे समय में आया है जब असम में एक महत्वपूर्ण चुनाव होने में बस कुछ ही महीने बचे हैं।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा बहुसंख्यक असमिया समुदाय के वोटों को आकर्षित करने के लिए पहले से ही ‘अवैध अप्रवासी’ और ‘बांग्लादेशी’ का हौवा खड़ा कर रहे हैं।राज्य में विदेशी विरोधी आंदोलन में सबसे आगे रहने वाले अखिल असम छात्र संघ (एएएसयू) जैसे संगठनों ने पहले ही एनआरसी के मसौदे में खामियां निकालते हुए दावा किया था कि सीमावर्ती पूर्वोत्तर राज्य में रहने वाले संभावित ‘अवैध प्रवासियों’ का 19 लाख का आंकड़ा बहुत कम है।

 सुप्रीम कोर्ट ने असम के गोलाघाट ज़िले में बेदखली अभियान पर रोक लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने गौहाटी हाईकोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए राज्य के गोलाघाट ज़िले के उरियमघाट और आसपास के गांवों में असम सरकार द्वारा चलाए जा रहे बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान पर अंतरिम रोक लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 22 अगस्त के अपने आदेश में कहा, ‘नोटिस जारी करें… विशेष अनुमति याचिका के निपटारे तक पक्षकार यथास्थिति बनाए रखें।’जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ ने एक नागरिक अब्दुल खालिक और प्रभावित परिवारों द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर यह आदेश पारित किया।उक्त याचिका में हाईकोर्ट के 5 और 18 अगस्त के समवर्ती आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया गया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र उदय सिंह और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड आदील अहमद याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए और गौहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें उसने ‘लंबे समय से बसे निवासियों – जिनमें से कई सात दशकों से भी अधिक समय से राज्य द्वारा दस्तावेज़ी मान्यता के साथ निर्बाध रूप से काबिज हैं – को असम वन विनियमन, 1891, वन अधिकार अधिनियम, 2006 और बाध्यकारी संवैधानिक सुरक्षा उपायों के तहत अनिवार्य उचित प्रक्रिया, पुनर्वास या निपटान जांच के बिना जबरन बेदखली से बचाने से इनकार कर दिया था।’

याचिका में कहा गया है, ‘याचिकाकर्ता असम के गोलाघाट जिले में स्थित गांवों, अर्थात् नंबर 2 नेघेरिबिल, गेलजान, विद्यापुर, राजपुखुरी, उरियमघाट और आसपास के इलाकों के स्थायी निवासी हैं। उनके पूर्वज सात दशक से भी पहले वहां बस गए थे, और इन वर्षों में याचिकाकर्ताओं और उनके परिवारों ने स्थायी और अर्ध-स्थायी घर बनाए हैं, कृषि भूमि पर खेती की है।’इसमें यह भी कहा गया कि निवासियों को बिजली कनेक्शन, राशन कार्ड, आधार नंबर दिए गए हैं और उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में लगातार नामांकित किया गया है।

ज्ञात हो कि उरियमघाट स्थित रेंगमा रिजर्व फॉरेस्ट में बेदखली अभियान चलाया जा रहा है। स्थानीय खबरों के अनुसार, राज्य के अधिकारियों ने 29 जुलाई, 2025 से ‘करीब 700-800 पुलिस अधिकारियों, सीआरपीएफ इकाइयों और वन अधिकारियों को तैनात किया’ और ‘अनुमानित 11,000 बीघा वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर और उत्खनन मशीनों जैसी भारी मशीनरी’ तैनात कीं।

पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ कहना देशद्रोह नहीं, जब तक भारत की निंदा न की गई हो: हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 19 अगस्त को कहा कि भारत की निंदा किए बिना किसी दूसरे देश की प्रशंसा करना राजद्रोह नहीं है।बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने एक व्यक्ति को ज़मानत दे दी, जिन पर सोशल मीडिया पर एक ऐसी तस्वीर शेयर करने का आरोप था जो कथित तौर पर ‘भड़काऊ और राष्ट्रहित के खिलाफ’ थी।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के पांवटा साहिब गांव के निवासी सुलेमान ने कथित तौर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एआई-जनरेटेड तस्वीर को ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ शब्दों के साथ शेयर किया था।

इसके बाद, सुलेमान (जो एक फल विक्रेता है) के एक परिचित ने 27 मई को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 152 के तहत उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें उन पर ‘पाकिस्तान के पक्ष में’ और प्रधानमंत्री के ‘खिलाफ’ लिखने का आरोप लगाया गया। 8 जून को सुलेमान ने आत्मसमर्पण कर दिया और तब से हिरासत में है।

अपनी ज़मानत याचिका में सुलेमान ने दलील दी कि वह निर्दोष है और उन्हें झूठा फंसाया गया है। सुलेमान के वकील ने तर्क दिया कि ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ लिखना अपने आप में किसी भी तरह से नफ़रत भड़काने के बराबर नहीं है, और उन्होंने एक पुराने मामले का हवाला दिया जहां हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे बरकरार रखा था।हालांकि, राज्य के वकील ने तर्क दिया कि जब यह पोस्ट शेयर की गई थी, तब भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण थे और ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखना ‘राष्ट्र-विरोधी’ है।

 19 अगस्त को मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायाधीश राकेश कैंथला ने कहा कि सुलेमान के खिलाफ शिकायत से यह साबित नहीं होता कि ‘भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति नफ़रत या असंतोष फैलाया गया था।’

न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, ‘मातृभूमि की निंदा किए बिना किसी देश की प्रशंसा करना राजद्रोह का अपराध नहीं है, क्योंकि यह सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियों को नहीं भड़काता है या अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को प्रोत्साहित नहीं करता है।’न्यायाधीश ने फल विक्रेता को जमानत देते हुए कहा कि सुलेमान पर जिस अपराध का आरोप लगाया गया था, उससे उन्हें जोड़ने के लिए ‘अपर्याप्त सामग्री’ है।

(जनचौक की रिपोर्ट।)

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