हाल ही में भारत और चीन के बीच रिश्तों में काफी सुधार देखने को मिल रहा है। इस बदलाव की शुरुआत एक खास चिट्ठी से हुई थी, जो मार्च में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजी थी। इस चिट्ठी में शी ने दोनों देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की इच्छा जताई थी। उस समय अमेरिका और चीन के बीच व्यापार को लेकर तनातनी बढ़ रही थी, और चीन चाहता था कि भारत भी किसी तरह से उसके साथ बेहतर तालमेल बनाए। यह चिट्ठी एक तरह से दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू करने की कोशिश थी।
शी जिनपिंग ने इस बातचीत को ‘ड्रैगन-एलीफैंट टैंगो’ कहा, जो चीन और भारत के प्रतीकात्मक जानवर हैं। इसका मतलब यह था कि दोनों देश एक साथ मिलकर खुशनुमा संबंध बनाएंगे। बाद में चीन के दूसरे बड़े नेता भी इस शब्द का इस्तेमाल करते दिखे, जिससे यह साफ पता चला कि दोनों देशों के रिश्ते में सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
जब अमेरिका ने व्यापार पर कड़े टैक्स लगाए, तो इसका असर चीन और भारत दोनों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। भारत को बड़े पैमाने पर अपने उत्पादों पर भारी टैक्स का सामना करना पड़ा। चीन पर भी अमेरिका की नकारात्मक नीतियों का असर था। इन आर्थिक दबावों ने दोनों देशों को सोचने पर मजबूर किया कि वे साथ मिलकर कैसे इस स्थिति का सामना करें।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो अगस्त 2025 के अंत में सात साल बाद चीन जाने वाले हैं, शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेंगे। इस मुलाकात को लेकर बहुत उम्मीदें हैं क्योंकि यह पहली बार होगा जब वे सीधे चीन जाएंगे। इस दौरे के दौरान दोनों नेता आर्थिक सहयोग और सीमा से जुड़े मुद्दों पर बात करेंगे। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच आम लोगों की आवाजाही और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए हवाई संबंधों को जल्द ही बहाल किया जा सकता है।
यह सब कुछ ऐसे समय में हो रहा है जब भारत को अमेरिका की तरफ से रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव भी है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूस के साथ इस तरह के समझौतों से दूर रहे। लेकिन इन सब तनावों के बीच भारत और चीन जैसे बड़े पड़ोसी देश अपने मतभेदों को कुछ हद तक भुलाकर सहयोग की नई राह पर चल सकते हैं।
यह बदलती स्थिति यह दर्शाती है कि भले ही देशों के बीच कुछ विवाद हों, लेकिन जब जरूरत आए तो वे एक साथ मिलकर आगे बढ़ सकते हैं। इस नए रिश्ते से उम्मीद है कि सीमा की समस्याएं कम होंगी और दोनों देशों के बीच व्यापार, संपर्क और सहयोग बढ़ेगा, जिससे दोनों की तरक्की में मदद मिलेगी। यह दोस्ताना कदम है जो एशिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में पहली बड़ी कोशिश माना जा सकता है।
भारत चीन सम्बन्धों में 1962 का भारत–चीन युद्ध अक्सर अचानक हुए हमले या विश्वासघात के रूप में याद किया जाता है, लेकिन अगर इतिहास की गहराई में जाएं तो यह घटना उस दौर की अंतरराष्ट्रीय राजनीति, औपनिवेशिक विरासत में मिले विवादों और दोनों देशों की आंतरिक कमजोरियों का सम्मिलित परिणाम था। इसे समझने के लिए केवल सैनिक मोर्चों पर हुई घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को भी देखना जरूरी है जिनसे होकर भारत और चीन उस मुकाम तक पहुंचे।
ब्रिटिश राज ने जब एशिया की सीमाओं को अपने हितों के अनुसार खींचा, तो उसने स्थानीय समाज, भूगोल और जातीय वास्तविकताओं की अनदेखी की। मैकमोहन रेखा इसका सबसे बड़ा उदाहरण थी, जिसे भारत ने अपनी पूर्वी सीमा माना लेकिन चीन ने कभी स्वीकार नहीं किया। पश्चिम में अक्साई चिन का इलाका भी इसी औपनिवेशिक धरोहर का हिस्सा था। यह क्षेत्र बंजर और बर्फीला था, लेकिन चीन के लिए शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाली जीवनरेखा था। भारत की तरफ से इसे जम्मू-कश्मीर का हिस्सा माना जाता था। यानी सीमा का विवाद शुरू से ही स्पष्ट था, सवाल केवल यह था कि इसे किस तरह हल किया जाएगा।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने आदर्शवादी रुख अपनाया। वह मानता था कि हाल ही में आज़ाद हुए एशियाई देशों के बीच आपसी सहयोग और भाईचारे से नए युग की नींव रखी जा सकती है। इसी सोच से पंचशील समझौता और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ जैसे नारे उभरे। 1950 के दशक के मध्य में चीन ने अक्साई चिन से होकर सड़क बनाना शुरू किया। यह सड़क उसकी सैन्य और प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए जरूरी थी।
भारत को इसकी जानकारी मिली तो उसने इसे अपनी संप्रभुता पर चोट माना। इसी के बाद भारत ने ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’ अपनाई, जिसके तहत उसने विवादित क्षेत्रों में छोटी-छोटी चौकियां स्थापित करनी शुरू कीं। ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’ भारत सरकार की नीति थी, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल की मृत्यु के बाद सुरक्षा मामलों को संभाल रहे वी.के. कृष्ण मेनन और सैन्य नेतृत्व की सलाह पर 1961 में अपनाया गया।
इस नीति के तहत भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के आसपास, खासकर लद्दाख और पूर्वोत्तर (नेफा/अब अरुणाचल प्रदेश) में, आगे बढ़कर छोटी-छोटी चौकियां स्थापित करने का निर्णय लिया। उद्देश्य था कि चीन को यह दिखाया जाए कि भारत इन क्षेत्रों पर अपनी संप्रभुता लागू कर रहा है। चीन इस नीति से असहज हो गया, क्योंकि वह इसे अपनी सीमाओं में घुसपैठ मान रहा था। वहीं भारत इसे अपनी ज़मीन पर अपनी मौजूदगी कहता था। इसी टकराव ने तनाव को और बढ़ाया और 1962 के युद्ध की पृष्ठभूमि बनी।
चीन खुद को क्रांतिकारी राष्ट्र के रूप में देख रहा था जो विदेशी शक्तियों की बनाई सीमाओं को अस्वीकार करता है। उसे लगता था कि भारत औपनिवेशिक नक्शों के आधार पर दावे कर रहा है, और तिब्बत में पनाह पाने वाले दलाई लामा को शरण देकर भारत उसकी आंतरिक स्थिरता में दखल दे रहा है। चीन की नजर में भारत केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी नीतियां चीन के लिए व्यापक चुनौती बन रही थीं।
जब 1959 में तिब्बत विद्रोह हुआ और दलाई लामा भागकर भारत आए, तब दोनों देशों के संबंध निर्णायक मोड़ पर पहुंच गए। चीन ने इसे सीधी शत्रुता के संकेत के रूप में लिया। भारत ने तिब्बती शरणार्थियों को जगह दी, लेकिन उनके राजनीतिक असर को रोकने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की। इस बीच दोनों देशों की सीमाओं पर छोटे-छोटे टकराव बढ़ते गए।
युद्ध की शुरुआत अक्टूबर 1962 में हुई। चीन ने अचानक दोनों मोर्चों पर हमला किया। पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम में लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र में उसकी सेना ने तेज़ी से बढ़त बनाई। भारतीय सेना संख्या में कम नहीं थी, लेकिन उसके पास आधुनिक हथियार, ठंडे मौसम के लिए पर्याप्त साधन और समन्वित रणनीति का अभाव था। सैनिकों ने साहस दिखाया, लेकिन उन्हें राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से स्पष्ट दिशा नहीं मिली। कई जगह चौकियां ऐसी थीं जिन्हें बचाव करना ही संभव नहीं था, फिर भी उन्हें खाली करने की अनुमति नहीं दी गई।
चीन की सेना संगठित और सुसज्जित थी। उसने स्पष्ट रूप से यह दिखाया कि उसकी प्राथमिकता विवादित क्षेत्रों पर त्वरित नियंत्रण पाना है, न कि भारत के भीतर गहराई तक कब्जा करना। यही कारण है कि युद्धविराम की घोषणा करते हुए चीन अरुणाचल से पीछे हट गया लेकिन अक्साई चिन पर नियंत्रण बनाए रखा। उसकी दृष्टि में यह इलाका उसकी रणनीतिक ज़रूरतों के लिए अपरिहार्य था।
भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संसद में 1959 में बयान दिया कि ‘भारत की सीमाएं इतिहास और भूगोल से तय हैं, इन्हें कोई बदल नहीं सकता।’ यह बयान भारत की दृढ़ता तो दिखाता था, लेकिन वास्तविकता यह थी कि सीमाओं पर प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत नहीं था। कई इलाकों में भारतीय सैनिक या अधिकारी कभी पहुंचे भी नहीं थे। चीन ने इस खालीपन को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया।
चीन की तरफ से भी बयान बेहद सख्त थे। 1960 में झोउ एनलाई ने भारत का दौरा किया और बातचीत में कहा कि मैकमोहन रेखा औपनिवेशिक षड्यंत्र है, जिसे चीन मान्यता नहीं देगा। उनका प्रस्ताव था कि पूर्व में भारत की मांग स्वीकार की जा सकती है, लेकिन पश्चिम में अक्साई चिन को चीन के नियंत्रण में माना जाए। भारत सरकार ने इस ‘गिव-एंड-टेक’ समाधान को पूरी तरह ठुकरा दिया। इस असहमति के बाद ही तनाव और गहराया।
जब दलाई लामा 1959 में भारत आए, तब चीन ने इसे भारत की सीधी चुनौती माना। बीजिंग से लगातार यह आरोप आने लगे कि भारत तिब्बती विद्रोहियों को संरक्षण दे रहा है। भारत ने भले ही इसे मानवीय शरण का मामला बताया, लेकिन चीन की नजर में यह उसकी संप्रभुता पर हमला था। यही वह बिंदु था जहां दोनों देशों का अविश्वास गहराई तक जम गया।
युद्ध के दौरान भारतीय सेना की हालत पर Henderson Brooks–Bhagat Report सबसे बड़ा साक्ष्य है। यह रिपोर्ट आज तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन इसके कुछ हिस्से सामने आए हैं। इसमें साफ लिखा गया है कि ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’ बिना किसी सैन्य तैयारी के लागू की गई थी। सैनिकों को आदेश थे कि विवादित इलाकों में चौकियां बनाओ, लेकिन उन्हें पीछे हटने की अनुमति नहीं थी। कई चौकियां दुर्गम पहाड़ियों पर थीं, जहां न तो रसद पहुंचाई जा सकती थी, न सर्दियों में ठहरना संभव था। इसका नतीजा यह हुआ कि जब चीनी सेना ने हमला किया, तो भारतीय सैनिक असहाय रह गए।
चीन की रणनीति का साक्ष्य खुद उसके युद्धविराम से मिलता है। 21 नवंबर 1962 को चीन ने घोषणा की कि वह युद्ध रोक रहा है और पूर्वी मोर्चे से पीछे हट जाएगा। अगर उसका लक्ष्य भारत को कब्जे में लेना होता, तो वह रुकता नहीं। लेकिन उसने अक्साई चिन पर कब्जा बनाए रखा, जो उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण था। यही इस बात का सबूत है कि उसकी प्राथमिकता रणनीतिक इलाका था, न कि भारत की धरती पर स्थायी आक्रमण।
इन तथ्यों को देखने के बाद साफ होता है कि भारत का यह मान लेना कि चीन अचानक विश्वासघात कर गया, अधूरी व्याख्या है। विवाद पहले से मौजूद था, चेतावनी भी थी, बातचीत भी हुई थी, लेकिन कोई हल नहीं निकला। भारत की नीति इस विश्वास पर आधारित थी कि चीन बड़े युद्ध में नहीं जाएगा, जबकि चीन ने यह मान लिया कि भारत दबाव में झुक जाएगा। दोनों ही अनुमान गलत साबित हुए।
सबसे गहरी बात यह है कि इस युद्ध ने दोनों देशों की जनता की वास्तविक समस्याओं को पीछे धकेल दिया। भारत में भूख, गरीबी और बेरोजगारी की समस्या थी, वहीं चीन अभी-अभी ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ की असफलता और अकाल से जूझ रहा था। लेकिन राज्य सत्ता ने इन सवालों को किनारे रखकर सीमा विवाद को प्राथमिकता दी। लाखों साधारण लोग, जिनका सीमा रेखाओं से कोई सीधा सरोकार नहीं था, इस टकराव के शिकार बने।
1962 के युद्ध को समझने के लिए एक और पहलू देखना जरूरी है—उस दौर की वैश्विक राजनीति। शीत युद्ध चल रहा था। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ही एशिया में प्रभाव बढ़ाने की होड़ में थे। चीन और सोवियत संघ के बीच भी वैचारिक मतभेद उभर रहे थे। भारत की कोशिश थी कि वह ‘गुटनिरपेक्ष’ बना रहे, लेकिन वास्तविकता यह थी कि उसे रक्षा और आर्थिक सहायता दोनों के लिए बाहरी ताकतों पर निर्भर होना पड़ता था। जब युद्ध छिड़ा तो भारत ने अमेरिका और ब्रिटेन से तुरंत सैन्य मदद मांगी। यह तथ्य चीन की नजर से भारत को ‘पश्चिम का साथी’ साबित करता था। बीजिंग पहले से ही भारत पर शंका करता था कि वह एशिया में पश्चिमी हितों का रक्षक है।
चीन की ओर से जारी किए गए आधिकारिक दस्तावेज़, जैसे कि 1962 में प्रकाशित ‘China’s Foreign Ministry Statement on Sino-Indian Boundary Question,’ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भारत की सीमा नीति औपनिवेशिक नक्शों पर आधारित है और ‘भारतीय सरकार ने वास्तविक नियंत्रण की स्थिति बदलने की कोशिश की है।’ इसमें साफ तौर पर भारत की फ़ॉरवर्ड पॉलिसी को आक्रामक बताया गया।
भारत की तरफ से भी संसद और प्रेस में बहुत सख्त माहौल था। नेहरू ने सितंबर 1962 में कहा था, ‘हम चीनियों को बाहर निकालेंगे।’ यह बयान राजनीतिक दबाव में दिया गया, लेकिन यह जनता की अपेक्षाओं को और बढ़ाने वाला साबित हुआ। दूसरी ओर, वास्तविक सैन्य तैयारी इस नारेबाज़ी के अनुकूल नहीं थी। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों में भी गहरे मतभेद थे। जनरल बी.एम. कौल जैसे नेताओं को राजनीतिक निकटता के कारण अहम जिम्मेदारी मिली, जबकि अन्य अधिकारी उनकी योग्यता पर सवाल उठाते थे। हेंडरसन-ब्रूक्स रिपोर्ट में इस बात की ओर संकेत है कि राजनीतिक हस्तक्षेप और गलत नियुक्तियों ने स्थिति को और खराब किया।
पूर्वोत्तर के मोर्चे पर तवांग और बोमडिला जैसे स्थानों का उदाहरण महत्वपूर्ण है। ये इलाके भौगोलिक दृष्टि से बेहद दुर्गम थे, लेकिन भारतीय सेना को इन्हें किसी भी कीमत पर बचाने का आदेश था। सैनिक बिना पर्याप्त आपूर्ति और हथियारों के बर्फ में डटे रहे। कई जगह उन्हें केवल थ्री-ओ-थ्री रायफलें मिली थीं, जबकि चीन की सेना स्वचालित हथियारों और बेहतर रसद से लैस थी। इसके बावजूद भारतीय सैनिकों ने जगह-जगह अद्भुत प्रतिरोध किया, जो दिखाता है कि हार का कारण साहस की कमी नहीं बल्कि योजना और संसाधन की कमी थी।
युद्ध में हताहतों की संख्या पर भी अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। भारतीय सरकार ने लगभग 1383 सैनिकों के शहीद होने और 1700 से अधिक के लापता या बंदी बनने की बात मानी। चीन की ओर से आधिकारिक आंकड़े कम बताए गए, लेकिन स्वतंत्र आकलनों में वहां भी हजारों सैनिकों के मारे जाने का अनुमान है। यानी यह केवल भारत की हार नहीं बल्कि दोनों समाजों के लिए भारी मानवीय त्रासदी थी।
युद्धविराम के बाद चीन ने एकतरफा पीछे हटने की घोषणा की। उसने पूर्वी मोर्चे से सेनाएं खींच लीं, लेकिन अक्साई चिन पर स्थायी नियंत्रण बनाए रखा। भारत ने इसे गहरी चोट के रूप में महसूस किया क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर का लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र था। आज तक यह चीन के नियंत्रण में है। भारत इस तथ्य को हमेशा अवैध कब्जा मानता है, जबकि चीन इसे अपनी ऐतिहासिक सीमा बताता है।
इस युद्ध का असर केवल कूटनीति और सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। भारत के भीतर यह घटना उस दौर की राजनीति को भी बदल गई। नेहरू की नैतिक शक्ति टूट गई। 1964 में उनकी मृत्यु से पहले ही वे इस हार से गहरे आहत थे। भारतीय जनता में यह भावना गहरी हो गई कि आदर्शवादी नीतियों से काम नहीं चलेगा, ठोस तैयारी जरूरी है। यही कारण है कि 1965 और 1971 के युद्धों में भारत ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया, क्योंकि रक्षा ढांचा सुधारा गया था।
चीन के लिए भी 1962 की जीत आसान नहीं थी। उसी समय वह ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ की असफलता और भीषण अकाल से जूझ रहा था। लाखों लोग भूख से मर चुके थे। युद्ध ने उसकी जनता पर अतिरिक्त बोझ डाला। हालांकि सरकार ने इसे ‘राष्ट्र की प्रतिष्ठा’ और ‘सीमा सुरक्षा’ का मुद्दा बताकर समर्थन जुटाया, लेकिन असलियत यह थी कि वहां भी समाज की वास्तविक समस्याएं अनसुलझी रह गईं।
भारत के लिए यह हार केवल सैन्य पराजय नहीं थी, बल्कि आत्मविश्वास को तोड़ देने वाला अनुभव था। जो देश खुद को तीसरी दुनिया का नैतिक नेता मानता था, वह अचानक अपने ही घर में कमजोर साबित हुआ। नेहरू की छवि गंभीर रूप से प्रभावित हुई और भारतीय विदेश नीति की नींव हिल गई। इसके बाद भारत ने सैन्य आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ाया, अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से मदद ली, और अपनी रक्षा नीति को यथार्थवादी दिशा में मोड़ा।
इस पूरे घटनाक्रम को यदि गहराई से देखें तो यह केवल सीमा विवाद नहीं था। असल सवाल यह था कि नवगठित राष्ट्र अपनी सुरक्षा और विदेश नीति को कितनी यथार्थवादी दृष्टि से देखते हैं। भारत ने भावनात्मक और नैतिक अपीलों पर भरोसा किया, जबकि चीन ने अपनी भौगोलिक और सामरिक ज़रूरतों को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप दोनों रास्ते टकरा गए।
यह युद्ध हमें यह भी दिखाता है कि औपनिवेशिक काल में खींची गई सीमाएं कितनी खतरनाक विरासत छोड़ जाती हैं। वे केवल नक्शे पर बनी रेखाएं नहीं होतीं, बल्कि आने वाले दशकों तक राष्ट्रों के बीच अविश्वास और संघर्ष का कारण बनती हैं। भारत और चीन, दोनों ने अपने-अपने इतिहास की व्याख्या के आधार पर सीमा दावे किए, लेकिन कोई भी इस विवाद को बातचीत या आपसी समझौते से हल करने में गंभीर नहीं दिखा।
इस युद्ध का सबसे बड़ा सबक यही है कि अगर दो समाज अपने वास्तविक हितों और जरूरतों के आधार पर संबंध बनाएँ, तो विवाद को शांति से सुलझाया जा सकता है। लेकिन जब राज्य सत्ता अपनी रणनीतिक सोच और सत्ता-संतुलन को सर्वोपरि मानती है, तो टकराव लगभग तय हो जाता है। भारत और चीन दोनों ने उस समय यही गलती की। भारत ने बिना तैयारी के सीमा चौकियां स्थापित कीं और यह मान लिया कि दूसरी तरफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जाएगा। चीन ने यह मान लिया कि भारत की कमजोरियों का फायदा उठाकर वह विवाद को हमेशा के लिए अपने पक्ष में निपटा देगा। दोनों ही आकलन अंततः ऐसे युद्ध में बदल गए जिसकी कीमत सैनिकों और सीमावर्ती जनता को चुकानी पड़ी।
आज पीछे मुड़कर देखें तो 1962 की हार भारत के लिए अपमानजनक थी, लेकिन उसने देश को यह सिखाया कि केवल आदर्शवादी नारों से राष्ट्र की सुरक्षा नहीं की जा सकती। वहीं चीन के लिए यह जीत सीमित थी, क्योंकि उसने भले ही अक्साई चिन पर नियंत्रण पा लिया, लेकिन भारत के साथ उसका अविश्वास स्थायी हो गया। दोनों देशों के बीच जो भाईचारे की बात कभी की जाती थी, वह हमेशा के लिए टूट गई।
(सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और दार्शनिक विषयों पर लेखन करने वाले मनोज अभिज्ञान पेशे से अधिवक्ता हैं।)