कभी भारतीय मुसलमानों को सिर्फ़ वोट बैंक समझा जाता था। चुनाव आने पर नेता आते, बाबरी मस्जिद या उर्दू की बात करते, “सुरक्षा” का वादा करते और वोट ले जाते। चुनाव ख़त्म होते ही मुसलमानों की चिंताएं भी ताले में बंद कर दी जातीं।
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। मुसलमान सिर्फ़ वोट बैंक नहीं रहे, वे अब व्यूज़ बैंक बन गए हैं। आज भारत की राजनीति में मुसलमानों के बिना कोई बहस पूरी नहीं होती। चाहे मुद्दा हो राष्ट्रवाद का, सेक्युलरिज़्म का, हिजाब का, बीफ़ का या फिर क्रिकेट का हर बहस में मुसलमान ज़रूर बीच में खड़े मिलते हैं।
व्यूज़ बैंक बनाने वाले कौन?
नेता
सत्ता पक्ष के नेता मुसलमानों को “दूसरा” बनाकर राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ते हैं।
विपक्ष के तथाकथित सेक्युलर नेता मुसलमानों को बस “चेकबॉक्स” की तरह इस्तेमाल करते हैं। उन्हें सिर्फ़ प्रतीक बनाकर रखा जाता है, असली सशक्तिकरण कभी नहीं।
दोनों मिलकर मुसलमानों को नागरिक नहीं, बल्कि राजनीतिक कच्चा माल बना देते हैं।
पत्रकार और मीडिया
यह असली फैक्ट्री है, जहां मुसलमानों को “व्यूज़ बैंक” में बदला गया।
टीवी एंकर
हर डिबेट में दो टोपीवाले मुसलमान और छह भगवाधारी पैनलिस्ट। बिना मुसलमान के डिबेट अधूरी लगती है। यहां मुसलमान सिर्फ़ टीआरपी का मास्कॉट है।
अख़बारी कॉलमिस्ट
कभी सहानुभूति के साथ मुसलमानों को “पीड़ित” लिखते हैं, कभी गेट्टो में रहने के लिए उन्हीं को दोषी ठहराते हैं। असली मुद्दे—शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य कहीं खो जाते हैं।
यूट्यूबर और इंस्टाग्रामर
एक हिजाब विवाद, एक लिंचिंग या एक विदेश नीति का मामला और उनके चैनलों पर लाखों व्यूज़। मुसलमान यहां कंटेंट की फ़सल हैं।
ट्विटर/X वाले पत्रकार
ये जानते हैं कि “मुसलमान” शब्द डालते ही एंगेजमेंट दोगुना हो जाएगा। वे ट्रेंड बनाते हैं, समाधान कभी नहीं।
मुसलमान ख़ुद
नई पीढ़ी अब चुप नहीं बैठती। शाहीन बाग़ से लेकर यूनिवर्सिटी कैंपस तक आवाज़ उठाती है।
सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं। तथ्य रखते हैं, संविधान की बातें करते हैं।
मगर यही सक्रियता उल्टा भी पड़ती है। हर बहस, हर प्रदर्शन, हर ट्वीट उन्हें फिर से सिर्फ़ प्रतीक बना देता है,जैसे कि भारतीय राजनीति के स्थायी किरदार हों।
जिम्मेदारी किसकी ज़्यादा?
नेताओं ने पहचान की राजनीति की मशीन तैयार की।
पत्रकारों ने प्लेटफ़ॉर्म पर इसे उद्योग बना दिया।
मुसलमान ख़ुद इस चक्रव्यूह में ऐसे फंस गए हैं कि निकल पाने की ख़ाहिश नज़र नहीं आती।
असली सच्चाई
वोट बैंक से व्यूज़ बैंक तक की यात्रा सुनने में बदलाव जैसी लगती है, लेकिन असल में यह नई क़ैद है। मुसलमानों को छात्र, मज़दूर या नागरिक की तरह नहीं देखा जाता। उन्हें सिर्फ़ नारा, हेडलाइन और हैशटैग बना दिया गया है।
जब तक राजनीति और मीडिया मुसलमानों को नागरिक की तरह नहीं देखेंगे, तब तक यह “व्यूज़ बैंक” सिर्फ़ दूसरों को फ़ायदा देगा—और खुद मुसलमानों को नुकसान पहुंचता रहेगा।
(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)